राम बिनु बिरथे जगि जनमा / जो नर दुख में दुख नहिं मानै (पद) – गुरु नानक | गोधूलि भाग 2, कक्षा 10 हिंदी पद्य पाठ 1
प्रस्तावना (गोधूलि भाग 2, पद्य पाठ 1)
“राम बिनु बिरथे जगि जनमा” और “जो नर दुख में दुख नहिं मानै” बिहार बोर्ड कक्षा 10 हिंदी की पाठ्यपुस्तक “गोधूलि भाग 2” के पद्य खंड का पहला पाठ है। यह पाठ सिख धर्म के प्रवर्तक और निर्गुण-निराकार ईश्वर के उपासक गुरु नानक द्वारा रचित दो पदों का संकलन है। इन पदों में गुरु नानक ने सच्ची भक्ति, ईश्वर-स्मरण और मानव-जीवन के वास्तविक उद्देश्य पर गहन विचार प्रस्तुत किए हैं।
कवि परिचय
गुरु नानक का जन्म 15 अप्रैल 1469 ई. को पंजाब प्रांत (वर्तमान पाकिस्तान) के तलवंडी नामक गाँव में हुआ था, जो आज “नानकाना साहिब” के नाम से जाना जाता है। उनके पिता का नाम कालूचंद खत्री और माता का नाम तृप्ता था। बचपन से ही उनका मन सांसारिक कार्यों में नहीं लगता था, यद्यपि उनके पिता ने उन्हें व्यवसाय में लगाने का काफी प्रयास किया। अंततः उन्होंने भक्ति का मार्ग अपनाया और सिख धर्म की स्थापना की। उनका निधन 22 सितंबर 1539 ई. को करतारपुर (पाकिस्तान) में हुआ। गुरु नानक निर्गुण-निराकार ईश्वर के उपासक थे और उनकी वाणी में कबीरदास के विचारों की गहरी झलक मिलती है।
पदों का सारांश (गोधूलि भाग 2, पद्य पाठ 1)
पहले पद “राम बिनु बिरथे जगि जनमा” में गुरु नानक यह प्रतिपादित करते हैं कि राम-नाम अर्थात ईश्वर के स्मरण के बिना मनुष्य का यह संसार में जन्म लेना पूर्णतः व्यर्थ है। जो जीवन ईश्वर-भक्ति और सच्चे नाम-स्मरण से रहित होता है, वह केवल दुःख और विषय-वासनाओं में डूबा रहता है, उसे सच्चा सुख और शांति कभी प्राप्त नहीं होती। कवि सच्चे हृदय से ईश्वर का जप करने की सलाह देते हैं, क्योंकि यही मानव-जीवन की सार्थकता है।
दूसरे पद “जो नर दुख में दुख नहिं मानै” में गुरु नानक सच्चे मनुष्य के लक्षणों का वर्णन करते हैं। उनके अनुसार वही व्यक्ति सच्चा मनुष्य है, जो जीवन में आए दुःख को दुःख मानकर विचलित नहीं होता, बल्कि धैर्यपूर्वक उसका सामना करता है। जिसे सुख, स्नेह और भय तीनों ही स्थितियों में विकार नहीं होता, जो सोने को भी मिट्टी के समान समझता है, वही सच्चा साधक और ईश्वर के निकट माना जाता है। ऐसा व्यक्ति मायावी संसार के मोह-बंधनों से मुक्त रहकर धरती के कल्याण का माध्यम बनता है।
केंद्रीय भाव (गोधूलि भाग 2, पद्य पाठ 1)
इन पदों का केंद्रीय भाव यह है कि मनुष्य-जीवन की सार्थकता ईश्वर-भक्ति और सच्चे नाम-स्मरण में निहित है। गुरु नानक के अनुसार सच्चा मनुष्य वह है जो सुख-दुःख, हानि-लाभ में समभाव रखे, मोह-माया से दूर रहे और निर्लिप्त भाव से जीवन जिए। यही सच्ची भक्ति और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग है।
शब्दार्थ (Word Meanings)
- बिरथे – व्यर्थ, निरर्थक
- जगि – जगत में, संसार में
- जनमा – जन्म लेना
- सनेह – स्नेह, प्रेम
- कंचन – सोना
- माटी – मिट्टी
- निर्लिप्त – जिस पर मोह-माया का प्रभाव न हो
- विकार – दोष, मन का विचलन
व्याख्या (Explanation)
पद 1 – राम बिनु बिरथे जगि जनमा: गुरु नानक के अनुसार राम-नाम अर्थात ईश्वर के स्मरण के बिना मनुष्य का यह संसार में जन्म लेना बिल्कुल व्यर्थ है। जो व्यक्ति ईश्वर-भक्ति से दूर रहता है, वह जीवनभर दुःख और विषय-वासनाओं के जाल में उलझा रहता है और उसे सच्चा सुख कभी प्राप्त नहीं होता। इसलिए जीवन की सार्थकता सच्चे हृदय से ईश्वर के नाम का स्मरण करने में है।
पद 2 – जो नर दुख में दुख नहिं मानै: इस पद में कवि सच्चे मनुष्य की पहचान बताते हैं। वही व्यक्ति सच्चा मनुष्य और सच्चा भक्त है, जो दुःख के समय भी धैर्य नहीं खोता और उसे दुःख मानकर विचलित नहीं होता। जो सुख, स्नेह और भय की स्थितियों में भी समभाव रखे तथा सोने और मिट्टी में कोई भेद न समझे, वही ईश्वर के निकट है और मायावी संसार से मुक्त है। ऐसा व्यक्ति ही धरती के लिए कल्याणकारी सिद्ध होता है।
महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न (गोधूलि भाग 2, पद्य पाठ 1)
- “राम बिनु बिरथे जगि जनमा” पद के रचयिता कौन हैं?
(a) कबीरदास (b) गुरु नानक (c) सूरदास (d) रविदास
उत्तर: (b) गुरु नानक
- गुरु नानक का जन्म कहाँ हुआ था?
(a) अमृतसर (b) तलवंडी (नानकाना साहिब) (c) लाहौर (d) दिल्ली
उत्तर: (b) तलवंडी (नानकाना साहिब)
- गुरु नानक का निधन किस वर्ष हुआ?
(a) 1540 ई. (b) 1560 ई. (c) 1539 ई. (d) 1565 ई.
उत्तर: (c) 1539 ई.
- गुरु नानक का कथन किस अन्य कवि के विचारों से मेल खाता है?
(a) कबीरदास (b) कालिदास (c) सूरदास (d) रविदास
उत्तर: (a) कबीरदास
- “जो नर दुख में दुख नहिं मानै” पद के अनुसार सच्चा मनुष्य कैसा होता है?
(a) सुख-दुःख में विचलित होने वाला (b) समभाव रखने वाला (c) धन का लोभी (d) भयभीत रहने वाला
उत्तर: (b) समभाव रखने वाला
अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Questions)
- प्रश्न: गुरु नानक के माता-पिता का नाम क्या था?
उत्तर: उनके पिता का नाम कालूचंद खत्री और माता का नाम तृप्ता था।
- प्रश्न: गुरु नानक के अनुसार सच्चा साधक किसे और मिट्टी को एक समान समझता है?
उत्तर: गुरु नानक के अनुसार सच्चा साधक सोने (कंचन) और मिट्टी (माटी) को एक समान समझता है।
लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)
- प्रश्न: “राम बिनु बिरथे जगि जनमा” पद के अनुसार मनुष्य-जीवन की सार्थकता किसमें है?
उत्तर: गुरु नानक के अनुसार मनुष्य-जीवन की सार्थकता सच्चे हृदय से राम-नाम अर्थात ईश्वर का स्मरण करने में है। इसके बिना जीवन व्यर्थ है और मनुष्य केवल दुःख तथा विषय-वासनाओं में उलझा रहता है।
- प्रश्न: गुरु नानक के अनुसार सच्चा मनुष्य कौन है?
उत्तर: गुरु नानक के अनुसार सच्चा मनुष्य वह है जो दुःख में विचलित न हो, सुख, स्नेह और भय में समभाव रखे, तथा सोने और मिट्टी में कोई भेद न समझे।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)
- प्रश्न: गुरु नानक के इन दोनों पदों के माध्यम से भक्ति और मानव-जीवन के संबंध को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: गुरु नानक के इन दोनों पदों में भक्ति और मानव-जीवन के गहरे संबंध को दर्शाया गया है। पहले पद में वे बताते हैं कि राम-नाम के स्मरण के बिना मनुष्य का जीवन व्यर्थ है, क्योंकि ऐसा जीवन दुःख और विषय-वासनाओं से भरा रहता है। दूसरे पद में वे सच्चे मनुष्य की पहचान बताते हुए कहते हैं कि जो व्यक्ति सुख-दुःख में समभाव रखे, मोह-माया से दूर रहे और निर्लिप्त भाव से जीवन जिए, वही सच्चा भक्त और ईश्वर के निकट है। इस प्रकार गुरु नानक यह संदेश देते हैं कि सच्ची भक्ति और आध्यात्मिक जीवन ही मानव-जन्म को सार्थक बनाते हैं।
- प्रश्न: “जो नर दुख में दुख नहिं मानै” पद के आधार पर सच्चे साधक के गुणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर: इस पद में गुरु नानक सच्चे साधक के अनेक गुणों का वर्णन करते हैं। सबसे पहले, वह दुःख के समय धैर्य नहीं खोता और विचलित नहीं होता। दूसरा, वह सुख, स्नेह और भय तीनों ही परिस्थितियों में समभाव बनाए रखता है और किसी भी विकार से प्रभावित नहीं होता। तीसरा, वह सोने और मिट्टी में कोई भेद नहीं समझता, अर्थात वह भौतिक वस्तुओं के प्रति निर्मोही रहता है। ऐसा व्यक्ति मायावी संसार के बंधनों से मुक्त होकर ईश्वर के निकट पहुँचता है और अपने आचरण से संपूर्ण धरती के कल्याण का माध्यम बनता है।
महत्वपूर्ण परीक्षा प्रश्न (गोधूलि भाग 2, पद्य पाठ 1)
- गुरु नानक के जीवन परिचय पर संक्षिप्त लेख लिखिए।
- गुरु नानक और कबीरदास के विचारों की समानता स्पष्ट कीजिए।
- निर्गुण भक्ति परंपरा में गुरु नानक का क्या स्थान है?
- “कंचन माटी जान” पंक्ति का भावार्थ स्पष्ट कीजिए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
- प्रश्न: यह पद्य पाठ किस पुस्तक और पाठ संख्या से संबंधित है?
उत्तर: यह पाठ “गोधूलि भाग 2” पुस्तक के पद्य खंड का पाठ 1 है।
- प्रश्न: गुरु नानक किस भक्ति-परंपरा से संबंधित हैं?
उत्तर: गुरु नानक निर्गुण-निराकार भक्ति परंपरा के प्रमुख कवि और सिख धर्म के प्रवर्तक हैं।
- प्रश्न: इन पदों से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर: इन पदों से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सच्ची भक्ति, धैर्य और समभाव के साथ जीवन जीना ही मानव-जन्म को सार्थक बनाता है।
निष्कर्ष (गोधूलि भाग 2, पद्य पाठ 1)
“राम बिनु बिरथे जगि जनमा” और “जो नर दुख में दुख नहिं मानै” गुरु नानक की गहन आध्यात्मिक चेतना और सरल किंतु प्रभावशाली भक्ति-भावना का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। ये पद हमें सिखाते हैं कि सच्चा मानव जीवन ईश्वर-भक्ति, धैर्य और समभाव में निहित है। यह पाठ छात्रों में आध्यात्मिकता, संतुलन और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने में सहायक है।
यह लेख केवल शैक्षणिक उद्देश्य से BSEB कक्षा 10 पाठ्यक्रम (गोधूलि भाग 2) के आधार पर तैयार किया गया है।
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