अलसकथा – कक्षा 10 संस्कृत पाठ 3 सम्पूर्ण व्याख्या, शब्दार्थ एवं प्रश्न-उत्तर

12 August 2026  |  By Ramnivas KT

बिहार बोर्ड (BSEB) कक्षा 10 संस्कृत पाठ्यक्रम का तीसरा पाठ ‘अलसकथा’ एक रोचक और शिक्षाप्रद कथा है, जो आलस्य नामक मानवीय दुर्गुण पर करारा व्यंग्य करती है। यह कथा प्रसिद्ध मैथिली कवि विद्यापति द्वारा रचित ग्रंथ ‘पुरुषपरीक्षा’ से संकलित है। इस लेख में हम पाठ का सारांश, केंद्रीय भाव, शब्दार्थ, व्याख्या तथा परीक्षा-उपयोगी वस्तुनिष्ठ एवं विषयनिष्ठ प्रश्न-उत्तर विस्तार से पढ़ेंगे।

पाठ का परिचय

‘अलसकथा’ पाठ के रचयिता विद्यापति हैं, जो मिथिला के प्रसिद्ध कवि थे और ‘मैथिल कोकिल’ की उपाधि से विभूषित थे। यह कथा उनके संस्कृत ग्रंथ ‘पुरुषपरीक्षा’ से ली गई है, जिसमें अनेक नैतिक और शिक्षाप्रद कथाएँ संकलित हैं। ‘अलसकथा’ में आलस्य को मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु (रिपु) बताया गया है और इस बात को एक रोचक कथा के माध्यम से दर्शाया गया है।

सारांश (Summary)

कथा के अनुसार मिथिला में वीरेश्वर नामक एक अत्यंत दयालु मंत्री रहते थे। वे प्रतिदिन गरीबों, अनाथों तथा आलसी व्यक्तियों को अन्न और वस्त्र प्रदान करते थे। इसी उदारता के कारण उन्होंने एक ‘अलसशाला’ (आलसियों के लिए आश्रयस्थल) बनवाई थी, जहाँ वास्तविक आलसी लोगों के साथ-साथ कुछ धूर्त लोग भी कृत्रिम आलस्य दिखाकर मुफ्त भोजन प्राप्त करने लगे।

कथा के अनुसार यह मानव स्वभाव है कि प्राणी अपने सजातीय प्राणियों को सुखी देखकर उनके पास दौड़े चले आते हैं। यही कारण था कि कुछ धूर्त व्यक्ति भी आलस्य का ढोंग करके अलसशाला में भोजन ग्रहण करने लगे। एक बार मंत्री वीरेश्वर के अधिकारियों (नियोगिपुरुषों) ने वास्तविक आलसियों की परीक्षा लेने के उद्देश्य से अलसशाला में आग लगा दी।

आग की लपटें देखते ही सभी धूर्त व्यक्ति तुरंत भाग खड़े हुए, क्योंकि वे वास्तव में आलसी नहीं थे। परंतु उस अलसशाला में सोए हुए चार वास्तविक आलसी पुरुष आग देखकर भी अपने स्थान से नहीं हिले। इस प्रकार उनकी परीक्षा में यह सिद्ध हो गया कि सच्चा आलसी व्यक्ति भीषण भूख लगने पर भी और प्राणों पर संकट आने पर भी कुछ करने में असमर्थ रहता है।

कथा के अंत में यह नीति-वाक्य प्रस्तुत किया गया है कि जिस प्रकार स्त्री की गति (सहारा) पति है और बालकों की गति माता (जननी) है, उसी प्रकार आलसी व्यक्तियों की गति केवल कारुणिक (दयालु) व्यक्ति ही होता है। इसी कारण नीतिकार आलस्य को मनुष्य का शत्रु (रिपु) मानते हैं।

केंद्रीय भाव (Central Idea)

इस पाठ का केंद्रीय भाव यह है कि आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। यह मनुष्य को इतना निष्क्रिय बना देता है कि संकट की घड़ी में भी वह अपनी रक्षा नहीं कर पाता। कथा के माध्यम से यह शिक्षा दी गई है कि मनुष्य को सदैव कर्मशील और उद्यमी रहना चाहिए, क्योंकि आलस्य विनाश का कारण बनता है।

महत्वपूर्ण शब्दार्थ

शब्दअर्थ
अलसः/अलसाःआलसी व्यक्ति
कारुणिकःदयालु, करुणा करने वाला
धूर्तःचालाक, छली व्यक्ति
कृत्रिमालस्यम्बनावटी/नकली आलस्य
नियोगिपुरुषाःनियुक्त अधिकारी, कर्मचारी
प्रवृद्धमग्निम्बढ़ती हुई आग
बुभुक्षाभूख
सजातीयअपनी ही जाति/वर्ग के
रिपुःशत्रु
गतिःसहारा, आश्रय

पाठ की व्याख्या

‘अलसकथा’ एक ऐसी नीति-कथा है जो हास्य और व्यंग्य के माध्यम से मनुष्य के भीतर छिपे आलस्य नामक दोष को उजागर करती है। मंत्री वीरेश्वर का चरित्र दया और परोपकार का प्रतीक है, जो बिना किसी भेदभाव के जरूरतमंदों की सहायता करते हैं। परंतु उनकी इसी उदारता का लाभ उठाकर कुछ धूर्त लोग बनावटी आलस्य दिखाकर स्वार्थ सिद्ध करने लगते हैं।

कथा का सबसे रोचक भाग वह है जब अलसशाला में आग लगाकर वास्तविक और नकली आलसियों के बीच अंतर स्पष्ट किया जाता है। धूर्त लोग आग देखते ही तुरंत भाग जाते हैं, क्योंकि उनका आलस्य केवल दिखावा था। परंतु चार वास्तविक आलसी व्यक्ति प्राण-संकट की स्थिति में भी अपने स्थान से नहीं हिलते। इस प्रसंग से यह स्पष्ट होता है कि सच्चा आलस्य मनुष्य को इतना निष्क्रिय बना देता है कि वह अपनी जान बचाने का प्रयास भी नहीं कर पाता।

कथा के अंत में विद्यापति एक सुंदर नीति-वाक्य प्रस्तुत करते हैं – जिस प्रकार स्त्री का सहारा पति और बालक का सहारा माता होती है, उसी प्रकार आलसी व्यक्ति का एकमात्र सहारा कोई दयालु व्यक्ति ही हो सकता है। इस प्रकार यह पाठ आलस्य के दुष्परिणामों को दर्शाते हुए कर्मशीलता की प्रेरणा देता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Questions)

नीचे दिए गए वस्तुनिष्ठ प्रश्न पाठ में आए सभी महत्वपूर्ण तथ्यों को कवर करते हैं:

  1. ‘अलसकथा’ पाठ किस ग्रंथ से संकलित है? — पुरुषपरीक्षा
  2. ‘अलसकथा’ पाठ के लेखक कौन हैं? — विद्यापति
  3. ‘पुरुषपरीक्षा’ के रचनाकार कौन हैं? — विद्यापति
  4. मिथिला के मंत्री का नाम क्या था? — वीरेश्वर
  5. विद्यापति किस भाषा के प्रसिद्ध कवि थे? — मैथिली
  6. विद्यापति किस उपाधि से प्रसिद्ध थे? — मैथिल कोकिल
  7. कारुणिक के बिना किनकी गति नहीं होती? — आलसियों की
  8. अलसशाला में कुल कितने पुरुष सोए हुए थे? — चार (चत्वारः)
  9. इस कथा में किसका महत्व वर्णित है? — मानव गुणों का (आलस्य दोष के संदर्भ में)
  10. वीरेश्वर मंत्री कहाँ रहते थे? — मिथिला में
  11. आलसियों को अन्न और वस्त्र कौन देते थे? — मंत्री वीरेश्वर
  12. गरीबों और अनाथों को प्रतिदिन भोजन कौन कराते थे? — वीरेश्वर
  13. मनुष्य को कौन-सा दोष नष्ट कर देता है? — आलस्य
  14. अलसशाला में आग क्यों लगाई गई? — आलसियों की वास्तविकता जानने/परीक्षा लेने के लिए
  15. आग लगने पर कौन भाग गए? — धूर्त (नकली आलसी) लोग
  16. आग लगने पर भी कितने लोग नहीं भागे? — चार वास्तविक आलसी
  17. भीषण भूख लगने पर भी कौन कुछ नहीं कर पाता? — आलसी व्यक्ति
  18. चार आलसियों को किसने बाहर निकाला (बहिष्कृत किया)? — नियोगिपुरुषों (अधिकारियों) ने
  19. कौन कृत्रिम आलस्य दिखाकर भोजन प्राप्त करते थे? — धूर्त लोग
  20. आग को देखकर कौन भाग गए? — धूर्त लोग
  21. प्राणी किन्हें सुखी देखकर उनकी ओर दौड़ते हैं? — अपने सजातीय प्राणियों को
  22. नीतिकार आलस्य को क्या मानते हैं? — शत्रु (रिपु)
  23. स्त्रियों की गति (सहारा) कौन है? — पति
  24. बालकों की गति (सहारा) कौन है? — जननी (माता)
  25. वीरेश्वर मंत्री का चरित्र किस गुण को दर्शाता है? — दया और परोपकार

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न: मंत्री वीरेश्वर के चरित्र की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर: मंत्री वीरेश्वर मिथिला के अत्यंत दयालु और परोपकारी मंत्री थे। वे प्रतिदिन गरीबों, अनाथों तथा आलसी व्यक्तियों को अन्न और वस्त्र प्रदान करते थे। उन्होंने आलसियों के लिए एक विशेष आश्रयस्थल (अलसशाला) भी बनवाया था, जिससे उनकी करुणा और उदारता स्पष्ट होती है।

प्रश्न: धूर्त लोग वास्तविक आलसियों से किस प्रकार भिन्न सिद्ध हुए?
उत्तर: जब अलसशाला में आग लगाई गई, तब धूर्त लोग तुरंत भाग खड़े हुए क्योंकि उनका आलस्य केवल दिखावा था। परंतु चार वास्तविक आलसी व्यक्ति आग लगने पर भी अपने स्थान से नहीं हिले, जिससे उनका सच्चा आलस्य सिद्ध हुआ।

प्रश्न: कथा के अनुसार आलसियों की गति (सहारा) किसे बताया गया है और क्यों?
उत्तर: कथा के अनुसार आलसियों की गति (सहारा) केवल कारुणिक अर्थात् दयालु व्यक्ति होता है, क्योंकि आलसी व्यक्ति स्वयं अपने लिए कुछ भी करने में असमर्थ होता है। जिस प्रकार स्त्री का सहारा पति और बालक का सहारा माता है, उसी प्रकार आलसी का सहारा केवल करुणाशील व्यक्ति ही हो सकता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न: ‘अलसकथा’ पाठ के आधार पर आलस्य के दुष्परिणामों का वर्णन कीजिए।
उत्तर: ‘अलसकथा’ पाठ में आलस्य को मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु बताया गया है। कथा में दिखाया गया है कि अलसशाला में सोए हुए चार वास्तविक आलसी व्यक्ति आग लगने के बावजूद अपनी जान बचाने के लिए भी हिल-डुल नहीं पाए। यह दर्शाता है कि आलस्य मनुष्य को इतना निष्क्रिय बना देता है कि वह भीषण संकट की स्थिति में भी अपनी रक्षा नहीं कर पाता। भूख लगने पर भी आलसी व्यक्ति भोजन जुटाने के लिए कोई प्रयास नहीं करता। इस प्रकार आलस्य न केवल मनुष्य की उन्नति में बाधक बनता है, बल्कि उसके जीवन के लिए भी खतरा उत्पन्न कर सकता है। इसीलिए नीतिकारों ने आलस्य को रिपु (शत्रु) की संज्ञा दी है।

प्रश्न: ‘अलसकथा’ के माध्यम से विद्यापति ने क्या शिक्षा दी है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: विद्यापति ने ‘अलसकथा’ के माध्यम से यह शिक्षा दी है कि मनुष्य को सदैव कर्मशील और उद्यमी रहना चाहिए। कथा में दिखाया गया है कि आलस्य के कारण मनुष्य अपनी उन्नति तो दूर, अपने प्राणों की रक्षा भी नहीं कर पाता। साथ ही यह भी संदेश दिया गया है कि दयालु व्यक्ति समाज के कमजोर और असहाय वर्ग के लिए सच्चा सहारा बनते हैं, जैसे मंत्री वीरेश्वर ने आलसियों के लिए किया। परंतु इस उदारता का दुरुपयोग करने वाले धूर्त लोग भी समाज में होते हैं, इसलिए सच्चाई की पहचान आवश्यक है। इस प्रकार यह कथा कर्मशीलता, करुणा और सच्चाई की पहचान – तीनों की शिक्षा एक साथ देती है।

महत्वपूर्ण परीक्षा प्रश्न (Important Exam Questions)

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: ‘अलसकथा’ पाठ किस प्रकार की रचना है?
उत्तर: ‘अलसकथा’ एक नीतिकथा (शिक्षाप्रद कहानी) है, जो आलस्य नामक मानवीय दुर्गुण पर व्यंग्य करती है।

प्रश्न 2: विद्यापति को ‘मैथिल कोकिल’ क्यों कहा जाता है?
उत्तर: विद्यापति मिथिला क्षेत्र के प्रसिद्ध कवि थे और उनकी काव्य-रचनाओं की मधुरता के कारण उन्हें ‘मैथिल कोकिल’ की उपाधि दी गई।

प्रश्न 3: ‘अलसकथा’ पाठ से कितने अंकों के प्रश्न पूछे जाते हैं?
उत्तर: अंकों का निर्धारण बोर्ड द्वारा जारी नवीनतम प्रश्न-पत्र प्रारूप के अनुसार होता है, इसलिए विद्यार्थियों को नवीनतम आधिकारिक BSEB मॉडल पेपर अवश्य देखना चाहिए।

निष्कर्ष

‘अलसकथा’ पाठ आलस्य नामक दुर्गुण पर एक सशक्त और रोचक व्यंग्य है। यह पाठ हमें सिखाता है कि आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है, जो न केवल उसकी उन्नति में बाधक बनता है, बल्कि संकट के समय उसकी सुरक्षा में भी बाधा उत्पन्न करता है। विद्यार्थियों को चाहिए कि वे इस पाठ के तथ्यों और नीति-संदेश को भली-भाँति समझें, क्योंकि परीक्षा में इससे वस्तुनिष्ठ और विषयनिष्ठ दोनों प्रकार के प्रश्न पूछे जाते हैं। नियमित अभ्यास से यह पाठ आसानी से समझ में आ जाता है और परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त किए जा सकते हैं।

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