गोधूलि भाग 2, कक्षा 10 हिंदी गद्य पाठ 7 |परंपरा का मूल्यांकन (निबंध) – रामविलास शर्मा
प्रस्तावना (गोधूलि भाग 2, पाठ 7 – परंपरा का मूल्यांकन)
“परंपरा का मूल्यांकन” बिहार बोर्ड कक्षा 10 हिंदी की पाठ्यपुस्तक “गोधूलि भाग 2” के गद्य खंड का सातवाँ पाठ है। यह प्रख्यात आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा द्वारा रचित एक विचारोत्तेजक निबंध है, जिसमें साहित्यिक परंपरा, प्रगतिशील आलोचना, जातीय अस्मिता और समाजवादी व्यवस्था जैसे गूढ़ विषयों का वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। यह पाठ छात्रों को साहित्य और समाज के अंतर्संबंध को गहराई से समझने में सहायक है।
लेखक परिचय
डॉ. रामविलास शर्मा का जन्म 10 अक्टूबर 1912 को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के ऊँचा गाँव सानी में हुआ था। उन्होंने 1932 ई. में बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। वे हिंदी साहित्य के सर्वाधिक प्रतिष्ठित आलोचकों में से एक थे। उनकी प्रमुख रचनाओं में “निराला की साहित्य साधना” (बहु-खंडीय आलोचनात्मक कृति) और “प्रेमचंद और उनका युग” शामिल हैं। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। उनका निधन 30 मई 2000 को हुआ।
विस्तृत सारांश (गोधूलि भाग 2, पाठ 7)
निबंध की शुरुआत में लेखक साहित्य और परंपरा के संबंध पर विचार करते हैं। उनके अनुसार, प्रगतिशील आलोचना का विकास साहित्य की परंपरा के गहन ज्ञान से ही संभव है। जो आलोचक अपने साहित्यिक इतिहास और परंपरा को नहीं समझता, वह सही अर्थों में साहित्य का सम्यक मूल्यांकन नहीं कर सकता। लेखक स्पष्ट करते हैं कि साहित्य एक सापेक्ष वस्तु है, जिसे समय, समाज और ऐतिहासिक परिस्थितियों के संदर्भ में ही समझा जा सकता है।
लेखक के अनुसार, साहित्य की परंपरा का पूर्ण और वैज्ञानिक ज्ञान समाजवादी व्यवस्था में ही संभव है, क्योंकि पूँजीवादी व्यवस्था में साहित्य का मूल्यांकन प्रायः वर्ग-हितों से प्रभावित होता है। लेखक यह मानते हैं कि समाजवादी समाज-व्यवस्था भारत की एक राष्ट्रीय आवश्यकता है, जिसमें साहित्यिक परंपरा का निष्पक्ष और वैज्ञानिक मूल्यांकन हो सकेगा।
निबंध में लेखक एक ऐतिहासिक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं – जब हिटलर ने सोवियत रूस पर आक्रमण किया था, तब रूसी जनता ने बार-बार अपनी साहित्यिक परंपरा का स्मरण करके आत्मबल प्राप्त किया। इस संदर्भ में लेखक टॉल्स्टॉय का उल्लेख करते हैं, जो न केवल सोवियत समाज में पढ़े जाने वाले महान साहित्यकार हैं, बल्कि रूसी जाति की अस्मिता को सुदृढ़ और पुष्ट करने वाले साहित्यकार भी माने जाते हैं। इस उदाहरण के माध्यम से लेखक यह सिद्ध करते हैं कि साहित्यिक परंपरा किसी राष्ट्र या जाति की पहचान और आत्मबल को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
लेखक यह भी बताते हैं कि सभ्यता का हर स्तर एक समान नहीं होता – समय के साथ समाज और साहित्य दोनों में परिवर्तन आता है, परंतु परंपरा की सही समझ रखने वाला आलोचक ही यह तय कर सकता है कि किस साहित्यिक कृति या परंपरा का कितना महत्व है। इस प्रकार लेखक साहित्यिक मूल्यांकन को एक वैज्ञानिक और ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जो समाज की प्रगति के साथ जुड़ी हुई है।
केंद्रीय भाव (गोधूलि भाग 2, पाठ 7 – परंपरा का मूल्यांकन)
इस निबंध का केंद्रीय भाव यह है कि साहित्य की परंपरा का सम्यक और वैज्ञानिक मूल्यांकन तभी संभव है जब समाज में समानता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण हो। लेखक के अनुसार साहित्यिक परंपरा किसी राष्ट्र या जाति की अस्मिता और आत्मबल का महत्वपूर्ण स्रोत है, तथा प्रगतिशील आलोचना साहित्यिक परंपरा के गहन ज्ञान पर ही आधारित हो सकती है।
शब्दार्थ (Word Meanings)
- प्रगतिशील – आगे बढ़ने वाला, उन्नतिशील
- अस्मिता – पहचान, अस्तित्व
- सापेक्ष – परिस्थिति पर निर्भर, तुलनात्मक
- समाजवादी – समानता पर आधारित समाज-व्यवस्था से संबंधित
- पूँजीवादी – धन और पूँजी पर आधारित व्यवस्था से संबंधित
- सुदृढ़ – मजबूत, दृढ़
- पुष्ट – पुष्टि किया हुआ, बलवान
- मूल्यांकन – गुण-दोष का आकलन
व्याख्या (Explanation)
लेखक रामविलास शर्मा इस निबंध में साहित्य और समाज के गहरे संबंध को उजागर करते हैं। उनके अनुसार, साहित्य कभी भी समाज से पृथक होकर नहीं देखा जा सकता, क्योंकि यह अपने समय की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों से प्रभावित होता है। इसीलिए साहित्यिक परंपरा का मूल्यांकन करते समय ऐतिहासिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।
रूसी उदाहरण के माध्यम से लेखक यह स्पष्ट करते हैं कि संकट के समय में साहित्यिक परंपरा किसी राष्ट्र को आत्मबल और एकता प्रदान करती है। टॉल्स्टॉय जैसे साहित्यकार न केवल श्रेष्ठ रचनाकार थे, बल्कि उन्होंने रूसी जनता की राष्ट्रीय अस्मिता को भी मजबूत किया। इस प्रकार लेखक साहित्य को केवल मनोरंजन का साधन न मानकर राष्ट्र-निर्माण और सामाजिक चेतना के एक सशक्त माध्यम के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न (गोधूलि भाग 2, पाठ 7)
- “परंपरा का मूल्यांकन” निबंध के लेखक कौन हैं?
(a) अमरकांत (b) रघुवीर सहाय (c) रामविलास शर्मा (d) हजारी प्रसाद द्विवेदी
उत्तर: (c) रामविलास शर्मा
- “परंपरा का मूल्यांकन” किस विधा की रचना है?
(a) कहानी (b) निबंध (c) संस्मरण (d) लघुकथा
उत्तर: (b) निबंध
- रामविलास शर्मा का जन्म कब हुआ था?
(a) 10 अक्टूबर 1912 (b) 20 सितंबर 1913 (c) 25 नवंबर 1914 (d) 10 अक्टूबर 1911
उत्तर: (a) 10 अक्टूबर 1912
- साहित्य की परंपरा का पूर्ण ज्ञान किस व्यवस्था में संभव है?
(a) पूँजीवादी व्यवस्था में (b) जातिवादी व्यवस्था में (c) समाजवादी व्यवस्था में (d) भौतिकवादी व्यवस्था में
उत्तर: (c) समाजवादी व्यवस्था में
- “प्रेमचंद और उनका युग” किनकी रचना है?
(a) प्रेमचंद की (b) मुरली मनोहर जोशी की (c) दिनकर की (d) डॉ. रामविलास शर्मा की
उत्तर: (d) डॉ. रामविलास शर्मा की
अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Questions)
- प्रश्न: “परंपरा का मूल्यांकन” किस पुस्तक से लिया गया है?
उत्तर: यह पाठ “गोधूलि भाग 2” पुस्तक से लिया गया है।
- प्रश्न: रामविलास शर्मा का निधन कब हुआ?
उत्तर: उनका निधन 30 मई 2000 को हुआ।
लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)
- प्रश्न: प्रगतिशील आलोचना का विकास किस आधार पर होता है?
उत्तर: लेखक के अनुसार प्रगतिशील आलोचना का विकास साहित्य की परंपरा के गहन ज्ञान से होता है।
- प्रश्न: रूसी जाति ने हिटलर के आक्रमण के समय क्या किया था?
उत्तर: हिटलर के आक्रमण के समय रूसी जाति ने बार-बार अपनी साहित्यिक परंपरा का स्मरण किया, जिससे उन्हें आत्मबल प्राप्त हुआ।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)
- प्रश्न: लेखक के अनुसार साहित्यिक परंपरा और समाज के बीच क्या संबंध है? विस्तार से समझाइए।
उत्तर: लेखक रामविलास शर्मा के अनुसार साहित्य कभी भी समाज से पृथक होकर अस्तित्व में नहीं रह सकता। यह अपने समय की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों से गहराई से जुड़ा रहता है। साहित्यिक परंपरा का सही मूल्यांकन करने के लिए वैज्ञानिक और ऐतिहासिक दृष्टिकोण आवश्यक है, जो केवल समाजवादी व्यवस्था में ही संभव है, क्योंकि पूँजीवादी समाज में साहित्य का मूल्यांकन अक्सर वर्ग-हितों से प्रभावित होता है। लेखक रूसी उदाहरण के माध्यम से यह भी बताते हैं कि साहित्यिक परंपरा संकट के समय किसी राष्ट्र को एकजुट करने और आत्मबल प्रदान करने में सहायक होती है।
- प्रश्न: टॉल्स्टॉय के उदाहरण के माध्यम से लेखक क्या सिद्ध करना चाहते हैं?
उत्तर: लेखक टॉल्स्टॉय के उदाहरण के माध्यम से यह सिद्ध करना चाहते हैं कि महान साहित्यकार केवल उत्कृष्ट रचनाएँ ही नहीं देते, बल्कि वे अपने राष्ट्र की सांस्कृतिक अस्मिता को भी मजबूत करते हैं। टॉल्स्टॉय सोवियत समाज के प्रिय साहित्यकार तो थे ही, साथ ही उन्होंने रूसी जनता की राष्ट्रीय पहचान और आत्मगौरव को भी सुदृढ़ किया। हिटलर के आक्रमण के समय रूसी जनता ने इसी साहित्यिक परंपरा का स्मरण करके संकट का सामना करने का साहस जुटाया। इससे स्पष्ट होता है कि साहित्य और राष्ट्रीय अस्मिता का गहरा संबंध होता है।
महत्वपूर्ण परीक्षा प्रश्न (गोधूलि भाग 2, पाठ 7 – परंपरा का मूल्यांकन)
- रामविलास शर्मा के जीवन परिचय और उनकी प्रमुख रचनाओं पर संक्षिप्त लेख लिखिए।
- साहित्यिक परंपरा और जातीय अस्मिता के संबंध को स्पष्ट कीजिए।
- समाजवादी और पूँजीवादी व्यवस्था में साहित्य-मूल्यांकन के अंतर को समझाइए।
- प्रगतिशील आलोचना से आप क्या समझते हैं?
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
- प्रश्न: “परंपरा का मूल्यांकन” किस पुस्तक और पाठ संख्या से संबंधित है?
उत्तर: यह पाठ “गोधूलि भाग 2” पुस्तक के गद्य खंड का पाठ 7 है।
- प्रश्न: रामविलास शर्मा का जन्म कहाँ हुआ था?
उत्तर: उनका जन्म उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के ऊँचा गाँव सानी में हुआ था।
- प्रश्न: इस निबंध से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर: इस निबंध से हमें यह शिक्षा मिलती है कि साहित्यिक परंपरा किसी राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान और आत्मबल का स्रोत होती है, और इसका मूल्यांकन वैज्ञानिक तथा निष्पक्ष दृष्टिकोण से करना आवश्यक है।
निष्कर्ष (गोधूलि भाग 2, पाठ 7 – परंपरा का मूल्यांकन)
“परंपरा का मूल्यांकन” निबंध डॉ. रामविलास शर्मा की गहन वैचारिक दृष्टि और आलोचनात्मक क्षमता का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह निबंध हमें सिखाता है कि साहित्य को समाज और इतिहास से अलग करके नहीं देखा जा सकता, और साहित्यिक परंपरा किसी राष्ट्र की अस्मिता और आत्मबल को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह पाठ छात्रों में साहित्य के प्रति वैज्ञानिक और गंभीर दृष्टिकोण विकसित करता है।
यह लेख केवल शैक्षणिक उद्देश्य से BSEB कक्षा 10 पाठ्यक्रम (गोधूलि भाग 2) के आधार पर तैयार किया गया है।
Leave a Reply