मङ्गलम् (उपनिषद्-मन्त्राः) – कक्षा 10 संस्कृत गद्य/पद्य पाठ 1 सम्पूर्ण व्याख्या

12 August 2026  |  By Ramnivas KT

प्रस्तावना

“मङ्गलम्” बिहार बोर्ड कक्षा 10 संस्कृत पाठ्यपुस्तक का प्रथम पाठ है। यह कोई मौलिक रचना न होकर विभिन्न उपनिषदों — ईशावास्योपनिषद्, कठोपनिषद्, मुण्डकोपनिषद् तथा श्वेताश्वतरोपनिषद् — से संकलित पाँच मन्त्रों (श्लोकों) का संग्रह है। इन मन्त्रों को मंगलाचरण के रूप में पढ़ा जाता है, अतः इस पाठ का नाम “मङ्गलम्” रखा गया है। इस पाठ के माध्यम से परमात्मा (सत्य) की महिमा, सत्य की सर्वोच्चता तथा आत्म-ज्ञान के महत्व का प्रतिपादन किया गया है।

पाठ का स्रोत एवं परिचय

उपनिषद् वैदिक साहित्य के अंतिम भाग हैं, जिन्हें “वेदान्त” भी कहा जाता है। ये दर्शनशास्त्र के गूढ़ सिद्धान्तों को प्रकट करते हैं। परम्परा के अनुसार उपनिषदों की कुल संख्या 108 मानी जाती है। “मङ्गलम्” पाठ में संकलित पाँचों मन्त्रों में परमपुरुष परमात्मा की महिमा का प्रधान रूप से गायन हुआ है। उन्हीं परमात्मा से यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त और अनुशासित है, तथा उन्हीं की प्राप्ति सभी तपस्वियों और ऋषियों का परम लक्ष्य है।

क्रममन्त्र संख्यास्रोत उपनिषद्मुख्य विषय
1प्रथम मन्त्रईशावास्योपनिषद्सत्य का आवरण हटाने की प्रार्थना
2द्वितीय मन्त्रमुण्डकोपनिषद्सत्य की सर्वोच्चता (सत्यमेव जयते)
3तृतीय मन्त्रकठोपनिषद्आत्मा का सूक्ष्म व महान स्वरूप
4चतुर्थ मन्त्रमुण्डकोपनिषद्नदी-समुद्र दृष्टान्त द्वारा आत्मा-परमात्मा का ऐक्य
5पञ्चम मन्त्रश्वेताश्वतरोपनिषद्परमात्मा को जानकर मृत्यु से मुक्ति

पाँचों मन्त्रों का मूल पाठ, हिंदी अर्थ एवं व्याख्या

प्रथम मन्त्र (ईशावास्योपनिषद्)

मूल श्लोक:
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।
तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये॥

हिंदी अर्थ: सत्य का मुख (स्वरूप) सोने के समान चमकीले पात्र (आवरण) से ढका हुआ है। हे पूषन् (हे सूर्यदेव, हे पोषणकर्ता परमात्मा)! सत्यधर्म के दर्शन के लिए आप उस आवरण को हटा दीजिए।

व्याख्या: इस मन्त्र में साधक परमात्मा से प्रार्थना करता है कि सत्य (परम तत्त्व) माया रूपी सुनहरे आवरण से ढका हुआ है, जिसके कारण साधारण मनुष्य उसे नहीं देख पाता। साधक चाहता है कि परमात्मा कृपा करके उस आवरण को हटा दें, ताकि उसे सच्चे धर्म और सत्य का दर्शन प्राप्त हो सके।

द्वितीय मन्त्र (मुण्डकोपनिषद्)

मूल श्लोक:
सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः।
येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत् सत्यस्य परमं निधानम्॥

हिंदी अर्थ: सत्य की ही सदैव जय होती है, असत्य की नहीं। सत्य से ही देवताओं तक पहुँचने का मार्ग प्रशस्त होता है, जिस मार्ग से चलकर आप्तकाम (जिनकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो चुकी हैं) ऋषिजन उस स्थान तक पहुँचते हैं, जहाँ सत्य का परम भण्डार स्थित है।

व्याख्या: यह मन्त्र भारत के राष्ट्रीय आदर्श-वाक्य “सत्यमेव जयते” का मूल स्रोत है। इसमें बताया गया है कि सत्य ही जीवन का सर्वोच्च आदर्श है और सत्य के मार्ग पर चलकर ही ऋषि-मुनि परम पद को प्राप्त करते हैं। असत्य क्षणिक रूप से भले ही प्रभावी दिखे, परंतु अंततः विजय सदैव सत्य की ही होती है।

तृतीय मन्त्र (कठोपनिषद्)

मूल श्लोक:
अणोरणीयान्महतो महीयानात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम्।
तमक्रतुं पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान्महिमानमीशम्॥

हिंदी अर्थ: यह आत्मा अणु से भी अधिक सूक्ष्म और महान से भी अधिक महान है, तथा प्रत्येक प्राणी के हृदय रूपी गुफा में स्थित है। जो व्यक्ति इच्छा-रहित (अक्रतु) होकर, शोक से मुक्त होकर, परमात्मा की कृपा से उस ईश्वर की महिमा को देख पाता है, वही सच्चे सुख को प्राप्त करता है।

व्याख्या: इस मन्त्र में आत्मा के अद्भुत, विरोधाभासी किंतु गहन स्वरूप को दर्शाया गया है — वह इतनी सूक्ष्म है कि अणु से भी छोटी है, और साथ ही इतनी विराट है कि महान से भी महान है। यह आत्मा प्रत्येक जीव के हृदय में विद्यमान रहती है, परंतु इसे देखने के लिए इच्छाओं और शोक से मुक्त होना आवश्यक है।

चतुर्थ मन्त्र (मुण्डकोपनिषद्)

मूल श्लोक:
यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय।
तथा विद्वान्नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम्॥

हिंदी अर्थ: जिस प्रकार बहती हुई नदियाँ अपने नाम और रूप को त्यागकर समुद्र में विलीन हो जाती हैं, उसी प्रकार विद्वान पुरुष नाम-रूप के बंधन से मुक्त होकर उस दिव्य, परात्पर (सबसे श्रेष्ठ) परमपुरुष परमात्मा को प्राप्त करता है।

व्याख्या: इस मन्त्र में सुंदर दृष्टान्त के माध्यम से आत्मा और परमात्मा के ऐक्य को समझाया गया है। जैसे गंगा, यमुना जैसी अलग-अलग नदियाँ समुद्र में मिलकर अपनी पृथक पहचान खो देती हैं और समुद्र-रूप हो जाती हैं, वैसे ही ज्ञानी पुरुष अहंकार और नाम-रूप के भेद को त्यागकर परमात्मा में लीन हो जाता है।

पञ्चम मन्त्र (श्वेताश्वतरोपनिषद्)

मूल श्लोक (भावांश):
तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय।

हिंदी अर्थ: उसी परमात्मा को जानकर मनुष्य मृत्यु को पार कर जाता है (अर्थात मोक्ष प्राप्त करता है); मोक्ष-प्राप्ति के लिए इसके अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं है।

व्याख्या: यह मन्त्र स्पष्ट करता है कि आत्म-ज्ञान अथवा ब्रह्म-ज्ञान ही मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति (मोक्ष) पाने का एकमात्र साधन है। परमात्मा को जाने बिना कोई अन्य मार्ग मोक्ष तक नहीं पहुँचा सकता।

केंद्रीय भाव

“मङ्गलम्” पाठ का केंद्रीय भाव यह है कि सत्य ही परम सत्ता है और सत्य की सदैव विजय होती है। आत्मा अणु से सूक्ष्म और महान से महान, दोनों रूपों में विद्यमान है, और वह प्रत्येक प्राणी के हृदय में स्थित है। परमात्मा को जानने और उसमें लीन होने से ही मनुष्य मृत्यु के भय से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त कर सकता है।

शब्दार्थ (Word Meanings)

महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न (मङ्गलम्)

  1. उपनिषदस्य रचनाकारः कः अस्ति?

    (A) महात्मा विदुरः (B) महर्षिः वेदव्यासः (C) भर्तृहरिः (D) चाणक्यः

    उत्तर: (B) महर्षिः वेदव्यासः

  2. उपनिषदः कान् प्रकटयन्ति?

    (A) बौद्धसिद्धान्तान् (B) जैनसिद्धान्तान् (C) दर्शनशास्त्रसिद्धान्तान् (D) सांख्यसिद्धान्तान्

    उत्तर: (C) दर्शनशास्त्रसिद्धान्तान्

  3. ‘मङ्गलम्’ पाठस्य रचनाकारः कः अस्ति?

    (A) चाणक्यः (B) भवभूतिः (C) महर्षिः वेदव्यासः (D) महर्षिः वाल्मीकिः

    उत्तर: (C) महर्षिः वेदव्यासः

  4. उपनिषदः कस्य अन्तिमभागे अस्ति?

    (A) रामायणस्य (B) लौकिकसाहित्यस्य (C) वैदिकवाङ्मयस्य (D) आधुनिकसाहित्यस्य

    उत्तर: (C) वैदिकवाङ्मयस्य

  5. उपनिषदे कस्य महिमा प्रधानतया गीयते?

    (A) स्वविषयस्य (B) परपुरुषस्य (C) देवपुरुषस्य (D) परमपुरुषस्य

    उत्तर: (D) परमपुरुषस्य

  6. ‘मङ्गलम्’ पाठे कति मन्त्राः संकलिताः सन्ति?

    (A) दश (B) अष्ट (C) पञ्च (D) त्रयोदश

    उत्तर: (C) पञ्च

  7. ब्रह्मणः/सत्यस्य मुखं केन आच्छादितम् अस्ति?

    (A) पात्रेण (B) सरोवरे (C) समुद्रे (D) तडागे

    उत्तर: (A) पात्रेण

  8. महतो महीयात् कः?

    (A) तत्त्वम्/आत्मा (B) ब्रह्मः (C) देवः (D) राक्षसम्

    उत्तर: (A) तत्त्वम् (आत्मा)

  9. अणोः अणीयान् कः?

    (A) आत्मा (B) राक्षसम् (C) देवः (D) ब्रह्मः

    उत्तर: (A) आत्मा

  10. किं जयं प्राप्नोति / जयते?

    (A) सत्यम् (B) असत्यम् (C) क्रोधम् (D) मोहः

    उत्तर: (A) सत्यम्

  11. स्यन्दमानाः नद्यः कुत्र मिलन्ति?

    (A) नद्याम् (B) सरोवरे (C) समुद्रे (D) तडागे

    उत्तर: (C) समुद्रे

  12. जन्तोः गुहायां कः निहितः?

    (A) तत्त्वम् (B) शरीरम् (C) देवः (D) राक्षसम्

    उत्तर: (A) तत्त्वम्

  13. रिक्त स्थान पूरयत — ……… सत्यस्यापिहितं मुखम्।

    (A) हिरण्मयेन पात्रेण (B) पात्रेण (C) हरण्य (D) हिरण्यमेण

    उत्तर: (A) हिरण्मयेन पात्रेण

  14. रिक्त स्थान पूरयत — ……… नानृतम्।

    (A) असत्यमेव (B) असत्यमेव जयते (C) सत्यमेव जयते (D) जयते

    उत्तर: (C) सत्यमेव जयते

  15. रिक्त स्थान पूरयत — तमेव ……… मृत्युमेति।

    (A) विदित्वा (B) आत्मा (C) मृत्यु (D) विदित

    उत्तर: (A) विदित्वा

  16. ‘मङ्गलम्’ कहाँ से संकलित है?

    (A) वेद से (B) पुराण से (C) उपनिषद् से (D) वेदाङ्ग से

    उत्तर: (C) उपनिषद् से

  17. उपनिषदों की कुल संख्या कितनी मानी जाती है?

    (A) 109 (B) 108 (C) 105 (D) 111

    उत्तर: (B) 108

  18. सत्य से क्या प्राप्त होता है?

    (A) पृथ्वीलोक (B) नरकलोक (C) देवलोक (D) कोई नहीं

    उत्तर: (C) देवलोक

  19. मृत्यु को कौन जीत लेते हैं (पार कर जाते हैं)?

    (A) मूर्ख (B) अज्ञानी (C) विद्वान् (D) कोई नहीं

    उत्तर: (C) विद्वान्

  20. परमात्मा की महिमा का वर्णन मुख्यतः किस उपनिषद् में मिलता है?

    (A) कठोपनिषद् (B) ईशावास्योपनिषद् (C) श्वेताश्वतरोपनिषद् (D) मुण्डकोपनिषद्

    उत्तर: (B) ईशावास्योपनिषद्

अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Questions)

  1. प्रश्न: ‘मङ्गलम्’ पाठ किन उपनिषदों से संकलित है?

    उत्तर: ‘मङ्गलम्’ पाठ ईशावास्योपनिषद्, कठोपनिषद्, मुण्डकोपनिषद् तथा श्वेताश्वतरोपनिषद् से संकलित है।

  2. प्रश्न: प्रथम मन्त्र में साधक परमात्मा से क्या प्रार्थना करता है?

    उत्तर: साधक प्रार्थना करता है कि परमात्मा सत्य के मुख पर पड़े सुनहरे आवरण को हटाकर उसे सत्यधर्म का दर्शन कराएँ।

  3. प्रश्न: “सत्यमेव जयते” वाक्य किस मन्त्र और किस उपनिषद् से लिया गया है?

    उत्तर: यह वाक्य द्वितीय मन्त्र से लिया गया है, जो मुण्डकोपनिषद् से संकलित है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)

  1. प्रश्न: तृतीय मन्त्र में आत्मा के स्वरूप का वर्णन किस प्रकार किया गया है?

    उत्तर: तृतीय मन्त्र में आत्मा को अणु से भी सूक्ष्म तथा महान से भी महान बताया गया है। यह प्रत्येक प्राणी के हृदय रूपी गुफा में स्थित है, और जो इच्छा-रहित तथा शोक-मुक्त होकर परमात्मा की कृपा से इसकी महिमा को देखता है, वही सच्चा सुख पाता है।

  2. प्रश्न: नदी और समुद्र के दृष्टान्त द्वारा चतुर्थ मन्त्र में क्या समझाया गया है?

    उत्तर: जैसे बहती हुई नदियाँ अपना नाम-रूप त्यागकर समुद्र में विलीन हो जाती हैं, वैसे ही ज्ञानी पुरुष अपने अहंकार और भेद-भाव को त्यागकर परात्पर परमात्मा में लीन हो जाता है। इस दृष्टान्त से आत्मा और परमात्मा के अंततः एक हो जाने का भाव स्पष्ट होता है।

  3. प्रश्न: “सत्यमेव जयते” मन्त्र का क्या संदेश है?

    उत्तर: इस मन्त्र का संदेश यह है कि सत्य की सदैव जीत होती है, असत्य की कभी नहीं। सत्य के मार्ग पर चलकर ही ऋषिजन देवलोक और परम सत्य के भंडार तक पहुँचते हैं। यही वाक्य भारत के राष्ट्रीय आदर्श-वाक्य के रूप में भी अपनाया गया है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)

  1. प्रश्न: ‘मङ्गलम्’ पाठ का सार पाँच वाक्यों में लिखिए तथा इसके स्रोत उपनिषदों का उल्लेख कीजिए।

    उत्तर: ‘मङ्गलम्’ पाठ वैदिक वाङ्मय के अंतिम भाग उपनिषदों से संकलित दर्शनशास्त्र के सिद्धान्तों पर आधारित है। इस पाठ में सर्वत्र परमपुरुष परमात्मा की महिमा का प्रधान रूप से गायन हुआ है, और उन्हीं से यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त तथा अनुशासित है। सभी तपस्वियों और ऋषियों का परम लक्ष्य उसी परमात्मा की प्राप्ति है। इस पाठ में उसी परमात्मा की प्राप्ति हेतु उपनिषदों से पाँच मन्त्र श्लोक के रूप में संकलित किए गए हैं। ये पाँचों मन्त्र क्रमशः ईशावास्य, मुण्डक, कठ, मुण्डक तथा श्वेताश्वतर उपनिषदों से लिए गए हैं, और इन्हें मंगलाचरण के रूप में पढ़ा जाता है।

  2. प्रश्न: “मङ्गलम्” पाठ के पाँचों मन्त्रों के केंद्रीय भाव को विस्तार से समझाइए।

    उत्तर: “मङ्गलम्” पाठ के पाँचों मन्त्र मिलकर परमात्मा और सत्य की महिमा का प्रतिपादन करते हैं। प्रथम मन्त्र में साधक सत्य के मुख पर पड़े सुनहरे आवरण को हटाने की प्रार्थना करता है, ताकि उसे सत्यधर्म का दर्शन हो सके। द्वितीय मन्त्र में “सत्यमेव जयते” के माध्यम से यह स्थापित किया गया है कि सत्य की ही सदैव विजय होती है और सत्य के मार्ग से ही देवलोक की प्राप्ति होती है। तृतीय मन्त्र में आत्मा को अणु से सूक्ष्म और महान से महान बताते हुए यह कहा गया है कि वह प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित है। चतुर्थ मन्त्र में नदी-समुद्र के दृष्टान्त द्वारा यह दिखाया गया है कि ज्ञानी पुरुष अपना भेद-भाव त्यागकर परमात्मा में लीन हो जाता है। पञ्चम मन्त्र में यह स्पष्ट किया गया है कि परमात्मा को जानकर ही मनुष्य मृत्यु से मुक्त होता है और मोक्ष-प्राप्ति का इसके अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं है। इस प्रकार सम्पूर्ण पाठ सत्य, आत्म-ज्ञान और मोक्ष के गहन दार्शनिक सिद्धान्तों को अत्यंत संक्षिप्त परंतु प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है।

महत्वपूर्ण परीक्षा प्रश्न

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

  1. प्रश्न: ‘मङ्गलम्’ पाठ किस कक्षा और पाठ संख्या से संबंधित है?

    उत्तर: यह कक्षा 10 की संस्कृत पाठ्यपुस्तक का प्रथम पाठ है।

  2. प्रश्न: ‘मङ्गलम्’ पाठ में कुल कितने मन्त्र संकलित हैं?

    उत्तर: इस पाठ में उपनिषदों से कुल पाँच (5) मन्त्र संकलित हैं।

  3. प्रश्न: “सत्यमेव जयते” वाक्य कहाँ से लिया गया है और इसका क्या महत्व है?

    उत्तर: यह वाक्य मुण्डकोपनिषद् से लिया गया है और भारत के राष्ट्रीय आदर्श-वाक्य के रूप में अपनाया गया है, जो सत्य की सर्वोच्चता को दर्शाता है।

निष्कर्ष

“मङ्गलम्” पाठ उपनिषदों के गहन दार्शनिक ज्ञान का संक्षिप्त परंतु प्रभावशाली परिचय देता है। यह पाठ सत्य की सर्वोच्चता, आत्मा के अद्भुत सूक्ष्म-महान स्वरूप तथा परमात्म-ज्ञान द्वारा मोक्ष-प्राप्ति जैसे गूढ़ विषयों को सरल संस्कृत मन्त्रों के माध्यम से समझाता है। यह पाठ विद्यार्थियों में सत्य-निष्ठा, आत्म-चिंतन और आध्यात्मिक जिज्ञासा विकसित करने में सहायक है।

यह लेख केवल शैक्षणिक उद्देश्य से BSEB कक्षा 10 संस्कृत पाठ्यक्रम के आधार पर तैयार किया गया है।

Leave a Reply