गोधूलि भाग 2, कक्षा 10 हिंदी गद्य पाठ 4 |नाखून क्यों बढ़ते हैं (निबंध) – हजारी प्रसाद द्विवेदी
प्रस्तावना (गोधूलि भाग 2, पाठ 4 – नाखून क्यों बढ़ते हैं)
“नाखून क्यों बढ़ते हैं” बिहार बोर्ड कक्षा 10 हिंदी की पाठ्यपुस्तक “गोधूलि भाग 2” के गद्य खंड का चौथा पाठ है। यह एक विचारपूर्ण निबंध है, जिसमें आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने एक साधारण-सी दिखने वाली बात – नाखूनों के बढ़ने – के माध्यम से मानव सभ्यता के विकास, आदिम बर्बरता और संस्कृति की गहन व्याख्या प्रस्तुत की है। यह निबंध पाठकों को यह सोचने पर विवश करता है कि सभ्यता वास्तव में स्वयं पर लगाए गए संयम और अनुशासन का ही दूसरा नाम है।
लेखक परिचय
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म 19 अगस्त 1907 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के “आरत दूबे का छपरा” नामक गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम अनमोल द्विवेदी और माता का नाम ज्योतिष्मती था। वे हिंदी साहित्य के महान निबंधकार, आलोचक, उपन्यासकार और विद्वान थे। उनका निधन 19 मई 1979 को हुआ। उनकी रचनाओं में गहन चिंतन, व्यापक ज्ञान और सरल भाषा-शैली का अद्भुत संगम मिलता है।
विस्तृत सारांश (गोधूलि भाग 2, पाठ 4)
निबंध की शुरुआत एक रोचक प्रसंग से होती है, जब लेखक की छोटी पुत्री उनसे प्रश्न पूछती है कि “पिताजी, नाखून क्यों बढ़ते हैं?” इस साधारण-से प्रश्न से लेखक के मन में गहन चिंतन आरंभ हो जाता है और वे इस विषय पर विस्तार से विचार करते हैं।
लेखक बताते हैं कि प्राचीन काल में मनुष्य पूर्णतः जंगली और आदिम अवस्था में था। उस समय वह “नख-दंतावलंबी” था, अर्थात अपने नाखूनों और दाँतों पर ही निर्भर रहता था। अपने शत्रुओं और प्रतिद्वंद्वियों से संघर्ष करने के लिए उसके पास नाखून ही एकमात्र शस्त्र थे। इसलिए मनुष्य अपने नाखूनों को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने के लिए उन्हें बढ़ाता रहता था।
समय के साथ जैसे-जैसे मनुष्य ने सभ्यता की ओर कदम बढ़ाया, उसने अस्त्र-शस्त्र बनाना सीखा और नाखूनों पर निर्भरता कम होती गई। परंतु प्रकृति ने आज भी मनुष्य के शरीर में नाखूनों को बढ़ने की प्रवृत्ति बनाए रखी है, मानो यह उसे उसके आदिम, पशु-सदृश अतीत की याद दिलाती हो। लेखक के अनुसार, नाखूनों का बढ़ना प्रकृति की ओर से मनुष्य को उसकी पाशविक वृत्ति की निरंतर याद दिलाने का माध्यम है।
इसके पश्चात लेखक सभ्यता और संस्कृति के मूल तत्व पर विचार करते हैं। उनके अनुसार, सभ्यता की सबसे बड़ी पहचान यह है कि मनुष्य अपनी आदिम, पशु-तुल्य प्रवृत्तियों पर नियंत्रण रखना सीख गया है। वह अपने नाखूनों को नियमित रूप से काटता है, यह इस बात का प्रतीक है कि उसने अपनी बर्बरता को त्यागकर सभ्य और सुसंस्कृत जीवन को अपनाया है।
लेखक भारतीय संस्कृति की विशेषता पर भी प्रकाश डालते हैं। उनके अनुसार, भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ मनुष्य स्वयं पर लगाए गए बंधनों को पराधीनता नहीं, बल्कि स्वाधीनता के रूप में देखता है। आत्म-नियंत्रण और संयम को भारतीय परंपरा में सदैव सम्मान की दृष्टि से देखा गया है। लेखक यह भी कहते हैं कि सभी पुरानी बातें अच्छी नहीं होतीं और सभी नई बातें बुरी नहीं होतीं – अर्थात परिवर्तन और परंपरा दोनों का विवेकपूर्ण संतुलन आवश्यक है।
केंद्रीय भाव (गोधूलि भाग 2, पाठ 4 – नाखून क्यों बढ़ते हैं)
इस निबंध का केंद्रीय भाव यह है कि सभ्यता का वास्तविक अर्थ है मनुष्य का अपनी आदिम, पशु-तुल्य प्रवृत्तियों पर आत्म-नियंत्रण करना। नाखूनों का बढ़ना प्रकृति की ओर से मनुष्य को उसके बर्बर अतीत की स्मृति दिलाने वाला प्रतीक है, जबकि नाखूनों को काटना सभ्यता और संयम का प्रतीक है। लेखक इस माध्यम से यह संदेश देते हैं कि सच्ची सभ्यता और संस्कृति आत्म-अनुशासन में निहित है।
शब्दार्थ (Word Meanings)
- नख-दंतावलंबी – नाखून और दाँतों पर निर्भर रहने वाला
- पाशविक वृत्ति – पशु जैसा स्वभाव
- प्रतिद्वंद्वी – विरोधी, प्रतिस्पर्धी
- बर्बरता – असभ्यता, जंगलीपन
- संयम – नियंत्रण, अनुशासन
- अनधीनता – पराधीनता, परतंत्रता
- स्वाधीनता – स्वतंत्रता
- वांछनीय – इच्छित, चाहा गया
व्याख्या (Explanation)
लेखक हजारी प्रसाद द्विवेदी इस निबंध में एक साधारण प्राकृतिक घटना – नाखूनों का बढ़ना – को गहन दार्शनिक चिंतन का विषय बना देते हैं। वे बताते हैं कि प्राचीन मानव अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए नाखूनों और दाँतों पर निर्भर था, परंतु सभ्यता के विकास के साथ मनुष्य ने अस्त्र-शस्त्र बनाना सीखा और नाखूनों की आवश्यकता समाप्त हो गई। फिर भी प्रकृति ने इस प्रवृत्ति को बनाए रखा, मानो यह मनुष्य को उसके पशु-सदृश अतीत की चेतावनी देती हो।
लेखक के अनुसार सभ्यता का सार आत्म-नियंत्रण में निहित है। नाखूनों को नियमित रूप से काटना इस बात का प्रतीक है कि मनुष्य ने अपनी बर्बर प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त कर ली है। भारतीय संस्कृति की विशेषता बताते हुए लेखक कहते हैं कि यहाँ आत्म-अनुशासन को पराधीनता नहीं, बल्कि सच्ची स्वतंत्रता माना जाता है, क्योंकि जो व्यक्ति स्वयं पर नियंत्रण रखता है, वही वास्तव में स्वतंत्र होता है।
महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न (गोधूलि भाग 2, पाठ 4)
- “नाखून क्यों बढ़ते हैं” निबंध के लेखक कौन हैं?
(a) मैक्समूलर (b) भीमराव अंबेडकर (c) हजारी प्रसाद द्विवेदी (d) नलिन विलोचन शर्मा
उत्तर: (c) हजारी प्रसाद द्विवेदी
- हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म किस वर्ष हुआ था?
(a) 1864 (b) 1874 (c) 1907 (d) 1964
उत्तर: (c) 1907
- नाखून क्यों बढ़ते हैं यह प्रश्न लेखक के सामने किसने उठाया?
(a) उनकी पत्नी ने (b) उनकी पुत्री ने (c) उनके मित्र ने (d) उनके छात्र ने
उत्तर: (b) उनकी पुत्री ने
- प्राचीन काल में मनुष्य किस प्रकार का था?
(a) सभ्य (b) नख-दंतावलंबी (c) शिक्षित (d) शांतिप्रिय
उत्तर: (b) नख-दंतावलंबी
अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Questions)
- प्रश्न: “नाखून क्यों बढ़ते हैं” गद्य की कौन-सी विधा है?
उत्तर: यह एक निबंध है।
- प्रश्न: हजारी प्रसाद द्विवेदी का निधन कब हुआ?
उत्तर: उनका निधन 19 मई 1979 को हुआ।
लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)
- प्रश्न: “नाखून क्यों बढ़ते हैं” यह प्रश्न लेखक के सामने कैसे उपस्थित हुआ?
उत्तर: यह प्रश्न लेखक के सामने उस समय उपस्थित हुआ जब उनकी छोटी पुत्री ने उनसे पूछा कि पिताजी नाखून क्यों बढ़ते हैं।
- प्रश्न: बढ़ते नाखूनों द्वारा प्रकृति मनुष्य को क्या याद दिलाती है?
उत्तर: बढ़ते नाखूनों द्वारा प्रकृति मनुष्य को उसकी पाशविक और आदिम वृत्ति की याद दिलाती है, जब वह नाखूनों को हथियार के रूप में प्रयोग करता था।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)
- प्रश्न: लेखक की दृष्टि में हमारी संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता क्या है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: लेखक हजारी प्रसाद द्विवेदी की दृष्टि में हमारी संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि भारतीय समाज स्वयं पर लगाए गए बंधनों को पराधीनता के रूप में नहीं, बल्कि स्वाधीनता के रूप में देखता है। आत्म-नियंत्रण और संयम को यहाँ सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। जो व्यक्ति अपनी इच्छाओं और प्रवृत्तियों पर नियंत्रण रखता है, वही वास्तव में स्वतंत्र और सभ्य माना जाता है। यही आत्म-अनुशासन भारतीय संस्कृति की मूल पहचान है।
- प्रश्न: “नाखून क्यों बढ़ते हैं” निबंध के माध्यम से लेखक ने सभ्यता और बर्बरता के बीच क्या संबंध स्थापित किया है?
उत्तर: लेखक ने नाखूनों के बढ़ने की साधारण प्राकृतिक घटना को सभ्यता और बर्बरता के बीच के अंतर को समझाने का माध्यम बनाया है। प्राचीन काल में मनुष्य नख-दंतावलंबी था और नाखूनों को अस्त्र की तरह उपयोग करता था, जो उसकी बर्बरता और पाशविक प्रवृत्ति का प्रतीक था। सभ्यता के विकास के साथ मनुष्य ने इन प्रवृत्तियों पर नियंत्रण पाना सीखा। आज नाखूनों को नियमित रूप से काटना यह दर्शाता है कि मनुष्य ने अपनी बर्बर प्रवृत्तियों को त्यागकर सभ्यता को अपनाया है। इस प्रकार लेखक यह सिद्ध करते हैं कि सभ्यता आत्म-नियंत्रण और संयम में निहित है।
महत्वपूर्ण परीक्षा प्रश्न (गोधूलि भाग 2, पाठ 4 – नाखून क्यों बढ़ते हैं)
- हजारी प्रसाद द्विवेदी के जीवन परिचय पर संक्षिप्त लेख लिखिए।
- “सब पुराने अच्छे नहीं होते, सब नए खराब नहीं होते” इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
- मनुष्य के आदिम जीवन और सभ्य जीवन में क्या अंतर है, निबंध के आधार पर बताइए।
- प्रकृति और मनुष्य के संबंध को इस निबंध के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
- प्रश्न: “नाखून क्यों बढ़ते हैं” किस पुस्तक और पाठ संख्या से संबंधित है?
उत्तर: यह पाठ “गोधूलि भाग 2” पुस्तक के गद्य खंड का पाठ 4 है।
- प्रश्न: हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म कहाँ हुआ था?
उत्तर: उनका जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के “आरत दूबे का छपरा” गाँव में हुआ था।
- प्रश्न: इस निबंध से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर: इस निबंध से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सच्ची सभ्यता आत्म-नियंत्रण और संयम में निहित है, और मनुष्य को अपनी आदिम प्रवृत्तियों पर विजय पाकर सुसंस्कृत जीवन अपनाना चाहिए।
निष्कर्ष (गोधूलि भाग 2, पाठ 4 – नाखून क्यों बढ़ते हैं)
“नाखून क्यों बढ़ते हैं” निबंध आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की गहन चिंतनशीलता और सूक्ष्म दृष्टि का उत्कृष्ट उदाहरण है। एक साधारण-सी दिखने वाली प्राकृतिक घटना के माध्यम से उन्होंने मानव सभ्यता के विकास, आत्म-नियंत्रण और भारतीय संस्कृति के मूल्यों की गहन व्याख्या प्रस्तुत की है। यह निबंध हमें सिखाता है कि सभ्यता का वास्तविक अर्थ है अपनी बर्बर प्रवृत्तियों पर नियंत्रण पाना, और आत्म-अनुशासन ही सच्ची स्वतंत्रता का मार्ग है।
यह लेख केवल शैक्षणिक उद्देश्य से BSEB कक्षा 10 पाठ्यक्रम (गोधूलि भाग 2) के आधार पर तैयार किया गया है।
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