गोधूलि भाग 2, कक्षा 10 हिंदी गद्य पाठ 5 |नागरी लिपि (निबंध) – गुणाकर मुले
प्रस्तावना (गोधूलि भाग 2, पाठ 5 – नागरी लिपि)
“नागरी लिपि” बिहार बोर्ड कक्षा 10 हिंदी की पाठ्यपुस्तक “गोधूलि भाग 2” के गद्य खंड का पाँचवाँ पाठ है। यह एक ज्ञानवर्धक निबंध है, जिसमें प्रसिद्ध विज्ञान-लेखक और इतिहासकार गुणाकर मुले ने भारत की प्रमुख लिपि – नागरी लिपि (देवनागरी) – की उत्पत्ति, विकास और ऐतिहासिक यात्रा का विस्तृत वर्णन किया है। यह पाठ छात्रों को भारतीय लिपियों के इतिहास और उनके सांस्कृतिक महत्व को समझने में सहायक है।
लेखक परिचय
गुणाकर मुले का जन्म 3 जनवरी 1935 को महाराष्ट्र के अमरावती जिले में हुआ था। वे हिंदी के प्रसिद्ध विज्ञान-लेखक, इतिहासकार और निबंधकार थे, जिन्होंने विज्ञान, इतिहास और भाषा-लिपि जैसे विषयों पर गहन शोधपरक लेखन किया। उनका निधन 16 अक्टूबर 2009 को हुआ। “नागरी लिपि” उनकी शोधपूर्ण और तथ्यपरक लेखन-शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है।
विस्तृत सारांश (गोधूलि भाग 2, पाठ 5)
निबंध की शुरुआत में लेखक नागरी लिपि की उत्पत्ति से संबंधित विभिन्न विद्वानों के मतों पर प्रकाश डालते हैं। वे बताते हैं कि नागरी लिपि प्राचीन ब्राह्मी और सिद्धम लिपियों से विकसित हुई है। दक्षिण भारत में नागरी लिपि का सबसे प्राचीन उपलब्ध लेख राष्ट्रकूट राजा दंतिदुर्ग का सामांगड दानपत्र माना जाता है, जो 745 ईस्वी का है। लेखक राष्ट्रकूट वंश की उत्पत्ति, उनके शासन क्षेत्र और उनकी मातृभाषा के विषय में भी जानकारी देते हैं।
इसके पश्चात लेखक उत्तर भारत में नागरी लिपि के प्रसार का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि मेवाड़ के गुहिल वंश, सांभर-अजमेर के चौहान वंश, कन्नौज के गाहड़वाल वंश, काठियावाड़-गुजरात के सोलंकी वंश, आबू के परमार वंश, जेजाकभुक्ति (बुंदेलखंड) के चंदेल वंश तथा त्रिपुरी के कलचुरि वंश के शासकों के अनेक शिलालेख नागरी लिपि में प्राप्त होते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि नागरी लिपि का प्रयोग भारत के विभिन्न भागों में व्यापक रूप से होता था।
लेखक यह भी बताते हैं कि केरल के शासकों द्वारा जारी सिक्कों पर “वीर केरलस्य” जैसे शब्द भी नागरी लिपि में अंकित मिलते हैं, जो यह सिद्ध करता है कि नागरी लिपि का प्रभाव दक्षिण भारत के दूरस्थ क्षेत्रों तक भी पहुँचा था। लेखक नागरी को “देवनागरी” कहे जाने के कारणों पर भी विचार करते हैं और इस नामकरण से जुड़ी विभिन्न मान्यताओं का उल्लेख करते हैं।
निबंध के अंत में लेखक देवनागरी लिपि के अक्षरों की स्थिरता पर प्रकाश डालते हैं। वे बताते हैं कि लगभग दो सौ वर्ष पूर्व जब इस लिपि के टाइप (मुद्रण-अक्षर) पहली बार तैयार हुए और पुस्तकों की छपाई प्रारंभ हुई, तब से देवनागरी लिपि के अक्षरों के स्वरूप में स्थिरता आई है। इस प्रकार लेखक नागरी लिपि की सुदीर्घ ऐतिहासिक यात्रा को प्रमाणों और तथ्यों के आधार पर सुव्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करते हैं।
केंद्रीय भाव (गोधूलि भाग 2, पाठ 5 – नागरी लिपि)
इस निबंध का केंद्रीय भाव यह है कि नागरी (देवनागरी) लिपि भारत की एक अत्यंत प्राचीन, समृद्ध और व्यापक रूप से प्रयुक्त होने वाली लिपि रही है, जिसका प्रयोग उत्तर से दक्षिण भारत तक विभिन्न राजवंशों के शासनकाल में मिलता है। लेखक ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर इस लिपि के विकास-क्रम को प्रस्तुत करते हुए इसके सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित करते हैं।
शब्दार्थ (Word Meanings)
- दानपत्र – दान से संबंधित लेख वाला ताम्रपत्र या शिलालेख
- शिलालेख – पत्थर पर खुदा हुआ लेख
- वंश – कुल, राजपरिवार की परंपरा
- प्राचीनतम – सबसे पुराना
- मातृभाषा – जन्म से सीखी गई भाषा
- अंकित – लिखा हुआ, चिह्नित
- नामकरण – नाम रखने की प्रक्रिया
- मुद्रण – छपाई
व्याख्या (Explanation)
लेखक गुणाकर मुले इस निबंध में ऐतिहासिक तथ्यों और शिलालेखों के आधार पर नागरी लिपि की उत्पत्ति और विकास को प्रमाणिक ढंग से प्रस्तुत करते हैं। वे बताते हैं कि नागरी लिपि केवल किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रही, बल्कि उत्तर भारत के अनेक राजवंशों – जैसे मेवाड़ के गुहिल, अजमेर के चौहान, कन्नौज के गाहड़वाल आदि – के शासनकाल में इसका व्यापक प्रयोग हुआ। साथ ही दक्षिण भारत के राष्ट्रकूट वंश के शिलालेखों में भी इसके प्राचीनतम प्रमाण मिलते हैं।
लेखक यह भी स्पष्ट करते हैं कि नागरी लिपि का प्रभाव केवल उत्तर भारत तक सीमित न रहकर केरल जैसे दूरस्थ दक्षिणी क्षेत्र तक भी पहुँचा, जहाँ के सिक्कों पर भी नागरी लिपि में शब्द अंकित मिलते हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि नागरी लिपि भारतीय उपमहाद्वीप की एक समान और सर्वग्राह्य लिपि के रूप में विकसित हुई। मुद्रण-तकनीक के आगमन के बाद इस लिपि के अक्षरों में जो स्थिरता आई, वह आज तक कायम है।
महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न (गोधूलि भाग 2, पाठ 5)
- “नागरी लिपि” निबंध के लेखक कौन हैं?
(a) गुणाकर मुले (b) रामचंद्र शुक्ल (c) डॉ. भोलानाथ तिवारी (d) बाबूराम सक्सेना
उत्तर: (a) गुणाकर मुले
- दक्षिण भारत में नागरी लिपि का प्राचीनतम लेख किस राजा से संबंधित है?
(a) दंतिदुर्ग (b) अशोक (c) समुद्रगुप्त (d) हर्षवर्धन
उत्तर: (a) दंतिदुर्ग
- राष्ट्रकूट राजा दंतिदुर्ग का सामांगड दानपत्र किस वर्ष का है?
(a) 645 ई. (b) 745 ई. (c) 845 ई. (d) 945 ई.
उत्तर: (b) 745 ई.
- गुणाकर मुले का जन्म किस राज्य में हुआ था?
(a) महाराष्ट्र (b) बिहार (c) उत्तर प्रदेश (d) राजस्थान
उत्तर: (a) महाराष्ट्र
अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Questions)
- प्रश्न: “नागरी लिपि” गद्य की कौन-सी विधा है?
उत्तर: यह एक निबंध है।
- प्रश्न: गुणाकर मुले का निधन कब हुआ?
उत्तर: उनका निधन 16 अक्टूबर 2009 को हुआ।
लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)
- प्रश्न: राष्ट्रकूट शासन की नींव किसने डाली थी और वे मूलतः कहाँ के रहने वाले थे?
उत्तर: राष्ट्रकूट शासन की नींव दंतिदुर्ग ने डाली थी। लेखक के अनुसार राष्ट्रकूट शासक मूलतः दक्षिण भारत के क्षेत्रों से संबंधित थे और उनके शिलालेखों में नागरी लिपि के प्राचीनतम प्रमाण मिलते हैं।
- प्रश्न: उत्तर भारत में किन राजवंशों के शासकों के लेख नागरी लिपि में प्राप्त होते हैं?
उत्तर: उत्तर भारत में मेवाड़ के गुहिल, सांभर-अजमेर के चौहान, कन्नौज के गाहड़वाल, काठियावाड़-गुजरात के सोलंकी, आबू के परमार, जेजाकभुक्ति (बुंदेलखंड) के चंदेल तथा त्रिपुरी के कलचुरि शासकों के लेख नागरी लिपि में प्राप्त होते हैं।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)
- प्रश्न: नागरी लिपि की उत्पत्ति और विकास पर निबंध के आधार पर विस्तार से चर्चा कीजिए।
उत्तर: लेखक गुणाकर मुले के अनुसार नागरी लिपि की उत्पत्ति प्राचीन ब्राह्मी और सिद्धम लिपियों से हुई मानी जाती है। दक्षिण भारत में इस लिपि का सबसे प्राचीन उपलब्ध प्रमाण राष्ट्रकूट राजा दंतिदुर्ग का सामांगड दानपत्र है, जो 745 ईस्वी का है। इसके बाद उत्तर भारत में मेवाड़ के गुहिल, अजमेर के चौहान, कन्नौज के गाहड़वाल, गुजरात के सोलंकी, आबू के परमार, बुंदेलखंड के चंदेल तथा त्रिपुरी के कलचुरि जैसे अनेक राजवंशों के शासनकाल में नागरी लिपि का व्यापक प्रयोग हुआ। यहाँ तक कि केरल के शासकों के सिक्कों पर भी नागरी लिपि में शब्द अंकित मिलते हैं। मुद्रण-तकनीक के आगमन के बाद इस लिपि के अक्षरों में स्थिरता आई, जो आज तक बनी हुई है। इस प्रकार नागरी लिपि सदियों की एक सतत विकास-यात्रा से गुजरकर आज के देवनागरी स्वरूप तक पहुँची है।
- प्रश्न: नागरी लिपि को “देवनागरी” क्यों कहा जाता है? लेखक के विचारों के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: लेखक के अनुसार नागरी लिपि को “देवनागरी” कहे जाने के पीछे विभिन्न विद्वानों के अलग-अलग मत हैं। कुछ विद्वान मानते हैं कि यह नाम इसकी पवित्रता और धार्मिक ग्रंथों में प्रयोग के कारण पड़ा, जबकि कुछ अन्य इसे नगरों में प्रचलित होने के कारण “नागरी” तथा देवताओं से संबंधित मानकर “देवनागरी” कहते हैं। लेखक इन विभिन्न मान्यताओं का उल्लेख करते हुए यह स्पष्ट करते हैं कि यह लिपि भारतीय संस्कृति और साहित्य की एक अभिन्न और सम्मानित पहचान बन चुकी है।
महत्वपूर्ण परीक्षा प्रश्न (गोधूलि भाग 2, पाठ 5 – नागरी लिपि)
- गुणाकर मुले के जीवन परिचय पर संक्षिप्त लेख लिखिए।
- दक्षिण भारत और उत्तर भारत में नागरी लिपि के प्रसार की तुलना कीजिए।
- देवनागरी लिपि के अक्षरों में स्थिरता कैसे आई?
- ब्राह्मी और सिद्धम लिपि की तुलना में नागरी लिपि की मुख्य पहचान क्या है?
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
- प्रश्न: “नागरी लिपि” किस पुस्तक और पाठ संख्या से संबंधित है?
उत्तर: यह पाठ “गोधूलि भाग 2” पुस्तक के गद्य खंड का पाठ 5 है।
- प्रश्न: गुणाकर मुले का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उत्तर: उनका जन्म 3 जनवरी 1935 को महाराष्ट्र के अमरावती जिले में हुआ था।
- प्रश्न: नागरी लिपि का सबसे प्राचीन प्रमाण कहाँ से मिलता है?
उत्तर: दक्षिण भारत में नागरी लिपि का सबसे प्राचीन प्रमाण राष्ट्रकूट राजा दंतिदुर्ग के 745 ईस्वी के सामांगड दानपत्र से मिलता है।
निष्कर्ष (गोधूलि भाग 2, पाठ 5 – नागरी लिपि)
“नागरी लिपि” निबंध के माध्यम से गुणाकर मुले ने भारत की समृद्ध लिपि-परंपरा और उसके ऐतिहासिक विकास को बड़ी प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत किया है। यह निबंध हमें बताता है कि नागरी लिपि केवल एक क्षेत्र या राजवंश तक सीमित न रहकर संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप में फैली और आज देवनागरी के रूप में हिंदी सहित अनेक भाषाओं की लिपि बन चुकी है। यह पाठ छात्रों में अपनी भाषा और लिपि के प्रति गर्व तथा जागरूकता उत्पन्न करता है।
यह लेख केवल शैक्षणिक उद्देश्य से BSEB कक्षा 10 पाठ्यक्रम (गोधूलि भाग 2) के आधार पर तैयार किया गया है।
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