Bihar Board Class 11 Hindi Chapter 1 – रहीम के दोहे
Bihar Board Class 11 Hindi Chapter 1 – रहीम के दोहे में कवि रहीम ने छोटे-छोटे दोहों के माध्यम से जीवन से जुड़ी बहुत बड़ी बातें समझाई हैं। इन दोहों में आत्मसम्मान, दानशीलता, वाणी का संयम, अच्छे-बुरे स्वभाव की पहचान, उपयोगिता, नेतृत्व, पारिवारिक प्रतिष्ठा और मन की पीड़ा जैसे विषयों को बहुत सहज ढंग से रखा गया है।
रहीम की खासियत यह है कि वे किसी कठिन सिद्धांत को सीधे उपदेश के रूप में नहीं रखते। वे मोती, पानी, चंद्रमा, सूर्य, दीपक, समुद्र और शतरंज के प्यादे जैसे सामान्य उदाहरणों से जीवन की बात समझाते हैं। इसी कारण उनके दोहे आज भी विद्यार्थियों और सामान्य पाठकों के लिए उतने ही उपयोगी हैं।
रहीम के दोहे – कवि परिचय
रहीम का पूरा नाम अब्दुर्रहीम खानखाना था। उनका जन्म 1556 ई. में हुआ था। वे मुगल सम्राट अकबर के प्रसिद्ध सेनापति और संरक्षक बैरम खाँ के पुत्र थे। आगे चलकर रहीम स्वयं भी मुगल दरबार में महत्वपूर्ण पदों पर रहे और एक सफल सेनानायक के रूप में अपनी पहचान बनाई। साहित्य के क्षेत्र में उनकी पहचान विशेष रूप से नीति और जीवन-अनुभव से जुड़े दोहों के कारण बनी।
रहीम बहुभाषी और विद्वान व्यक्ति थे। हिंदी के साथ उन्हें संस्कृत, फारसी, अरबी और तुर्की जैसी भाषाओं का भी ज्ञान था। उनके व्यक्तित्व में दरबारी वैभव और लोकजीवन के अनुभव दोनों दिखाई देते हैं। यही कारण है कि उनके दोहों में राजदरबार से लेकर सामान्य मनुष्य के व्यवहार तक, जीवन के अनेक पक्ष सहज रूप से आ जाते हैं। उनके जीवन और साहित्य के संबंध में Hindwi भी उन्हें भक्तिकाल के प्रमुख कवि के रूप में प्रस्तुत करता है, जिनकी कविता में नीति, भक्ति, प्रेम और श्रृंगार का सुंदर मेल मिलता है। 2
रहीम की प्रमुख रचनाएँ
रहीम की प्रमुख रचनाओं में दोहावली, नगर शोभा, बरवै नायिका-भेद, श्रृंगार सोरठा, मदनाष्टक और रास पंचाध्यायी आदि का उल्लेख मिलता है। उनके दोहे विशेष रूप से लोकप्रिय हुए और लोकजीवन में कहावत की तरह इस्तेमाल होने लगे। Reference chapter में भी उनकी कई रचनाओं का उल्लेख किया गया है। 3
रहीम के दोहों की विशेषता
रहीम के दोहों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी संक्षिप्तता में गहराई है। दो पंक्तियों में वे ऐसी बात कह देते हैं जिसे समझने के लिए पूरा जीवन भी कम पड़ सकता है। उनकी भाषा सामान्य बोलचाल के करीब है और उदाहरण ऐसे हैं जिन्हें विद्यार्थी आसानी से समझ सकते हैं।
इन दोहों में नीति के साथ मानवीय संवेदना भी है। रहीम केवल यह नहीं बताते कि क्या करना चाहिए, बल्कि यह भी समझाते हैं कि गलत व्यवहार का परिणाम क्या हो सकता है। कहीं वे आत्मसम्मान बचाने की बात करते हैं, तो कहीं जरूरतमंद की सहायता न करने वाले व्यक्ति को भी कठघरे में खड़ा करते हैं।
रहीम के दोहों का मुख्य भाव
इस पाठ में संकलित दोहे जीवन को बेहतर ढंग से जीने की सीख देते हैं। कवि का मानना है कि मनुष्य को अपना सम्मान बनाए रखना चाहिए, वाणी पर नियंत्रण रखना चाहिए, जरूरतमंद की मदद करनी चाहिए और थोड़ी-सी सफलता मिलने पर अहंकार नहीं करना चाहिए।
रहीम बाहरी आकार या पद को ही श्रेष्ठता का आधार नहीं मानते। उनके अनुसार वही बड़ा है जो दूसरों के लिए उपयोगी और सुखद हो। इसी प्रकार परिवार में जन्म लेने वाला व्यक्ति तभी सम्मान का कारण बनता है जब उसका आचरण अच्छा हो।
रहीम के दोहे – अर्थ और भावार्थ
1. आत्मसम्मान और सहायता का संदेश
“रहिमन वे नर मर चुके, जे कहुँ माँगन जाहिं।
उनते पहले वे मुए, जिन मुख निकसत नाहिं॥”
इस दोहे में रहीम ने याचना और दान—दोनों पक्षों को सामने रखा है। कवि के अनुसार किसी के सामने जाकर माँगना व्यक्ति के आत्मसम्मान को कमजोर करता है। लेकिन इससे भी अधिक दुखद स्थिति उस व्यक्ति की है जिसके पास किसी जरूरतमंद की सहायता करने की क्षमता होते हुए भी उसके मुँह से सहायता के लिए एक सकारात्मक शब्द नहीं निकलता।
अर्थात् रहीम केवल माँगने वाले को दोष नहीं देते। वे संपन्न व्यक्ति को भी याद दिलाते हैं कि किसी जरूरतमंद की सहायता करना मानवीय कर्तव्य है। इस दोहे का संदेश आत्मसम्मान के साथ दया और सहयोग की भावना को बनाए रखना है।
2. ‘पानी’ का महत्व
“रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून॥”
यह रहीम का सबसे प्रसिद्ध दोहा है। यहाँ ‘पानी’ शब्द के अलग-अलग अर्थों का सुंदर प्रयोग हुआ है। मोती के लिए पानी का अर्थ उसकी चमक है, मनुष्य के लिए प्रतिष्ठा और चूने के लिए जल।
यदि मोती की चमक चली जाए तो उसका आकर्षण समाप्त हो जाता है। मनुष्य की प्रतिष्ठा समाप्त हो जाए तो उसका सामाजिक सम्मान कम हो जाता है। इसी तरह चूने की उपयोगिता भी पानी के बिना समाप्त हो जाती है। इसलिए कवि समझाते हैं कि जीवन में जिन चीजों से किसी वस्तु या व्यक्ति की पहचान और उपयोगिता बनी रहती है, उनकी रक्षा करना जरूरी है।
एक ही शब्द से कई अर्थ निकलने के कारण यहाँ श्लेष अलंकार का सुंदर उदाहरण मिलता है। Reference explanation में भी ‘पानी’ के इन तीन अर्थों को स्पष्ट किया गया है। 4
3. वाणी पर नियंत्रण
“रहिमन, जिह्वा बावरी, कहि गयी सरग-पतार।
आपु तो कहि भीतर गयी, जूती खात कपार॥”
कवि ने इस दोहे में जीभ को ‘बावरी’ कहकर उसकी चंचलता पर संकेत किया है। मनुष्य कई बार बिना सोचे ऐसी बात बोल देता है जिससे सामने वाला नाराज हो जाता है। शब्द निकल जाने के बाद उन्हें वापस लेना आसान नहीं होता।
इसलिए रहीम की सीख है कि बोलने से पहले सोचना चाहिए। मीठी और उचित वाणी व्यक्ति को सम्मान दिलाती है, जबकि कटु और अपमानजनक शब्द परेशानी और अपमान का कारण बन सकते हैं।
4. कंजूसी और धनलोलुपता पर व्यंग्य
“नाद रीझि जन देत मृग, नर धन हेतु-समेत।
ते रहीम पसु ते अधिक, रीझेहु कछू न देत॥”
इस दोहे में रहीम उस व्यक्ति की आलोचना करते हैं जो धन से अत्यधिक चिपका रहता है और किसी को कुछ देना नहीं चाहता। कवि हिरण का उदाहरण देते हैं। मधुर संगीत सुनकर हिरण तक मोहित हो जाता है और अपने प्राण तक देने को तैयार हो जाता है, लेकिन धनवान मनुष्य प्रसन्न होकर भी दूसरों के लिए कुछ नहीं करता।
रहीम के अनुसार ऐसी धनलोलुपता मनुष्य को पशु से भी नीचे गिरा देती है। धन तभी सार्थक है जब उसका उपयोग उचित कार्य और दूसरों की सहायता में किया जाए।
5. उपयोगिता आकार से बड़ी है
“धनि रहीम जल पंक को, लघु जिय पियत अघाई।
उदधि बड़ाई कौन है, जगत पियासो जाई॥”
कवि छोटे से गड्ढे या कीचड़युक्त स्थान में जमा पानी और विशाल समुद्र की तुलना करते हैं। छोटा जलस्रोत होने पर भी उसमें मौजूद पानी छोटे जीव-जंतुओं की प्यास बुझा देता है। इसके विपरीत समुद्र में पानी बहुत अधिक है, लेकिन खारा होने के कारण सामान्य मनुष्य उसकी प्यास नहीं बुझा सकता।
इससे रहीम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि केवल बड़ा होना पर्याप्त नहीं है। असली महत्व उपयोगी होने में है। जो दूसरों के काम आए, उसका महत्व उसके आकार से नहीं मापा जाना चाहिए।
6. आदर्श राजा कैसा हो?
“रहिमन, राज सराहिये, ससि सम सुखद जो होई।
कहा बापुरो भानु है, तपै तरैयनि खोई॥”
रहीम के अनुसार ऐसा राजा प्रशंसा के योग्य है जो चंद्रमा की तरह शीतल और सुखद हो। राजा का काम केवल शासन करना नहीं, बल्कि अपनी प्रजा को सुरक्षा, न्याय और सुख देना भी है।
सूर्य बहुत बड़ा और शक्तिशाली है, लेकिन उसकी गर्मी लोगों को परेशान करती है। इसके विपरीत चंद्रमा की शीतलता सुख देती है। इसी तुलना से कवि बताते हैं कि पद और शक्ति तभी सार्थक हैं जब उनका उपयोग लोककल्याण के लिए किया जाए।
7. कुपुत्र और दीपक की तुलना
“ज्यों रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय।
बारे उजियारो करै, बड़े अंधेरो होय॥”
दीपक जलने के बाद प्रकाश देता है, लेकिन जब उसकी लौ समाप्त होने की स्थिति आती है तो आसपास अंधकार भी दिखाई देता है। कवि इसी उदाहरण से कुपुत्र की तुलना करते हैं। संतान के जन्म से परिवार खुश होता है, लेकिन यदि वही संतान बड़े होकर गलत आचरण करने लगे तो परिवार की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचा सकती है।
इसलिए किसी परिवार के लिए केवल संतान का होना महत्वपूर्ण नहीं है। उससे भी अधिक महत्वपूर्ण उसका चरित्र और व्यवहार है।
8. माँगने से प्रतिष्ठा घटती है
“माँगे घटत रहीम पद, कितौ करौ बड़ काम।
तीन पैर बसुधा करी, तऊ बावनै नाम॥”
इस दोहे में रहीम फिर से याचना के कारण प्रतिष्ठा कम होने की बात करते हैं। कवि भगवान विष्णु के वामन रूप का उदाहरण देते हैं। उन्होंने तीन पग में पूरी पृथ्वी को नाप लिया, फिर भी उनका नाम ‘वामन’ अर्थात् छोटा रूप धारण करने वाले के रूप में जुड़ा रहा।
कवि का संकेत यह है कि व्यक्ति चाहे कितने बड़े कार्य कर ले, बार-बार किसी से माँगने की प्रवृत्ति उसके मान-सम्मान को कम कर सकती है। इसलिए आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान जीवन में बहुत महत्वपूर्ण हैं।
9. अपनी पीड़ा हर किसी से न कहें
“रहिमन, निज मन की व्यथा, मन ही राखो गोय।
सुन अठिलैहैं लोग सब, बाँटि न लैहैं कोय॥”
मनुष्य के जीवन में दुख और परेशानी आती रहती है। रहीम सलाह देते हैं कि अपनी निजी पीड़ा हर व्यक्ति के सामने नहीं रखनी चाहिए। संसार में हर व्यक्ति इतना संवेदनशील नहीं होता कि दूसरे के दुख को समझ सके। कई लोग दूसरों की परेशानी जानकर उसका मजाक भी बना सकते हैं।
इस दोहे का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य को हर परिस्थिति में अकेले ही रहना चाहिए। इसका व्यावहारिक संदेश यह है कि अपनी निजी कमजोरी और दुख किस व्यक्ति के सामने साझा करना है, इसका निर्णय समझदारी से करना चाहिए।
10. छोटी सफलता पर अहंकार
“जो रहीम ओछौ बढ़े, तो अति ही इतराइ।
प्यादा सों फरजी भयो, टेढ़ो-टेढ़ो जाइ॥”
शतरंज का प्यादा जब आगे बढ़ते हुए दूसरी स्थिति प्राप्त करता है तो उसकी चाल बदल जाती है। रहीम इसी उदाहरण से उन छोटे सोच वाले लोगों पर व्यंग्य करते हैं जो थोड़ी-सी सफलता या पद मिलते ही अपने व्यवहार में अकड़ ले आते हैं।
कवि की सीख है कि उन्नति मिलने पर व्यक्ति को और विनम्र होना चाहिए। पद या संपत्ति बढ़ने से यदि व्यवहार खराब हो जाए तो ऐसी उन्नति वास्तविक महानता नहीं है।
रहीम के दोहे – अति लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. रहीम का पूरा नाम क्या था?
उत्तर: रहीम का पूरा नाम अब्दुर्रहीम खानखाना था।
प्रश्न 2. रहीम के पिता का नाम क्या था?
उत्तर: उनके पिता का नाम बैरम खाँ था।
प्रश्न 3. अकबर ने रहीम को किस स्थान की जागीर दी थी?
उत्तर: अकबर ने रहीम को पाटन की जागीर दी थी।
प्रश्न 4. रहीम के कितने ग्रंथ उपलब्ध माने जाते हैं?
उत्तर: पाठ्य सामग्री के अनुसार रहीम के कुल ग्यारह ग्रंथों का उल्लेख मिलता है।
प्रश्न 5. रहीम की दोहावली में कितने दोहे बताए जाते हैं?
उत्तर: दोहावली में लगभग तीन सौ दोहों का संग्रह बताया गया है।
प्रश्न 6. रहीम के अनुसार भीख माँगना कैसा कार्य है?
उत्तर: रहीम के अनुसार किसी से माँगना आत्मसम्मान को कम करने वाला और अपमानजनक कार्य है।
प्रश्न 7. ‘पानी’ शब्द के तीन अर्थ क्या हैं?
उत्तर: मोती के लिए चमक, मनुष्य के लिए प्रतिष्ठा और चूने के लिए जल।
प्रश्न 8. धन के पीछे अत्यधिक भागने वाले व्यक्ति के बारे में रहीम क्या कहते हैं?
उत्तर: वे ऐसे व्यक्ति को पशु से भी अधिक निकृष्ट मानते हैं, क्योंकि वह धन होते हुए भी किसी के काम नहीं आता।
प्रश्न 9. रहीम का जन्म किस वर्ष हुआ था?
उत्तर: रहीम का जन्म 1556 ई. में हुआ था।
प्रश्न 10. रहीम की उपाधि क्या थी?
उत्तर: उनकी प्रसिद्ध उपाधि खानखाना थी।
प्रश्न 11. रहीम के दोहों में कौन-सी प्रमुख भावना दिखाई देती है?
उत्तर: उनके दोहों में नीति, मानवीय व्यवहार, भक्ति और जीवन-अनुभव की भावना प्रमुख रूप से दिखाई देती है।
प्रश्न 12. रहीम के दोहों में ‘पानी’ किस अलंकार का उदाहरण है?
उत्तर: ‘पानी’ के एक से अधिक अर्थ होने के कारण यहाँ श्लेष अलंकार का उदाहरण मिलता है।
प्रश्न 13. ‘नगर शोभा’ किसकी रचना है?
उत्तर: ‘नगर शोभा’ रहीम की रचना है।
प्रश्न 14. ‘बरवै नायिका-भेद’ किसकी रचना है?
उत्तर: ‘बरवै नायिका-भेद’ रहीम की रचना है।
प्रश्न 15. रहीम के दोहों की भाषा की प्रमुख विशेषता क्या है?
उत्तर: उनकी भाषा सहज, सरल, प्रभावशाली और लोकजीवन से जुड़ी हुई है।
रहीम के दोहे – लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. ‘रहिमन वे नर मर चुके’ का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: इस दोहे में रहीम आत्मसम्मान और दानशीलता दोनों को महत्व देते हैं। कवि कहते हैं कि किसी के सामने जाकर माँगना व्यक्ति के मान-सम्मान को कम करता है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति मजबूरी में किसी से सहायता माँगता है और सामने वाला समर्थ होते हुए भी उसकी सहायता नहीं करता, तो यह भी बहुत बड़ी मानवीय कमी है।
इसलिए दोहे की सीख दोतरफा है—मनुष्य को यथासंभव आत्मनिर्भर रहना चाहिए और जिसके पास सहायता करने की क्षमता हो, उसे जरूरतमंद की मदद करने से पीछे नहीं हटना चाहिए।
प्रश्न 2. ‘रहिमन पानी राखिए’ का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: इस दोहे में ‘पानी’ शब्द के तीन अलग अर्थ सामने आते हैं। मोती का पानी उसकी चमक है, मनुष्य का पानी उसकी प्रतिष्ठा है और चूने का पानी उसका उपयोगी रूप बनाए रखने वाला जल है। इन तीनों में पानी की उपस्थिति उनकी उपयोगिता बनाए रखती है।
कवि का व्यापक संदेश यह है कि मनुष्य को अपनी प्रतिष्ठा, अपनी उपयोगिता और अपनी पहचान को बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। एक बार सम्मान समाप्त हो जाए तो उसे वापस पाना कठिन होता है।
प्रश्न 3. ‘रहिमन निज मन की व्यथा’ का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: रहीम कहते हैं कि अपनी निजी पीड़ा हर किसी के सामने प्रकट करना उचित नहीं है। सभी लोग दूसरे के दुख को समझने वाले नहीं होते। कुछ लोग दुख कम करने के बजाय उसका मजाक बनाते हैं। इसलिए व्यक्ति को अपने मन की बात कहने से पहले सामने वाले की संवेदनशीलता और विश्वास को समझना चाहिए।
रहीम के दोहे – दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. ‘रहीम के दोहे’ का सारांश लिखिए।
उत्तर: ‘रहीम के दोहे’ जीवन के व्यावहारिक अनुभवों से निकली नीति-शिक्षाओं का सुंदर संग्रह है। इन दोहों में रहीम ने मानव व्यवहार के अनेक पक्षों पर विचार किया है। वे मनुष्य को आत्मसम्मान बनाए रखने, जरूरतमंद की सहायता करने और अपनी वाणी पर नियंत्रण रखने की सीख देते हैं।
कवि बताते हैं कि केवल धन या बड़ा पद किसी व्यक्ति को महान नहीं बनाता। व्यक्ति की वास्तविक महानता इस बात में है कि वह दूसरों के लिए कितना उपयोगी है। छोटे जलस्रोत और विशाल समुद्र का उदाहरण इसी बात को स्पष्ट करता है। इसी तरह राजा के लिए भी केवल शक्ति पर्याप्त नहीं है; उसे अपनी प्रजा के लिए सुखद और न्यायपूर्ण होना चाहिए।
रहीम कुपुत्र की तुलना दीपक से करते हुए बताते हैं कि गलत आचरण करने वाला व्यक्ति परिवार की प्रतिष्ठा को नष्ट कर सकता है। वे छोटी सफलता पर अहंकार करने वालों को भी शतरंज के प्यादे का उदाहरण देकर समझाते हैं। इस प्रकार पूरे पाठ में आत्मसम्मान, संयम, परोपकार, विनम्रता और विवेक की शिक्षा मिलती है।
प्रश्न 2. कवि रहीम के जीवन और व्यक्तित्व का परिचय दीजिए।
उत्तर: अब्दुर्रहीम खानखाना, जिन्हें हिंदी साहित्य में रहीम के नाम से जाना जाता है, 16वीं शताब्दी के प्रमुख कवियों में गिने जाते हैं। उनका जन्म 1556 ई. में हुआ था। वे बैरम खाँ के पुत्र थे और मुगल सम्राट अकबर के संरक्षण में पले-बढ़े। आगे चलकर वे स्वयं एक प्रभावशाली सेनानायक, दरबारी और विद्वान बने।
रहीम का व्यक्तित्व केवल राजनीतिक या सैनिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं था। उन्हें साहित्य और विभिन्न भाषाओं का अच्छा ज्ञान था। उनकी कविता में हिंदी लोकजीवन, भारतीय सांस्कृतिक अनुभव, नीति और मानवीय संवेदना का सुंदर मेल दिखाई देता है। Hindwi के अनुसार रहीम की रचनात्मक पहचान भक्ति, नीति, प्रेम और श्रृंगार के समन्वय से बनी। 5
उनकी प्रमुख रचनाओं में दोहावली, नगर शोभा, बरवै नायिका-भेद, श्रृंगार सोरठा, मदनाष्टक और रास पंचाध्यायी आदि का उल्लेख मिलता है। उनके नीति-प्रधान दोहे आज भी इसलिए लोकप्रिय हैं क्योंकि उनमें कही गई बातें केवल उनके समय तक सीमित नहीं हैं; वे सामान्य मानवीय व्यवहार से जुड़ी हुई हैं।
प्रश्न 3. रहीम के दोहों की वर्तमान समय में उपयोगिता स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: रहीम के दोहे कई सदियों पुराने होते हुए भी आज के जीवन में पूरी तरह प्रासंगिक हैं। आज भी व्यक्ति को आत्मसम्मान की जरूरत है, आज भी बिना सोचे बोलने से संबंध खराब होते हैं और आज भी धन या पद मिलने पर अहंकार करने वाले लोग दिखाई देते हैं। इसलिए रहीम की नीतियाँ केवल पुराने समय की बातें नहीं हैं।
‘पानी’ वाला दोहा आज हमें अपनी प्रतिष्ठा और गरिमा की रक्षा करना सिखाता है। ‘जिह्वा बावरी’ वाला दोहा सोशल मीडिया और सार्वजनिक संवाद के वर्तमान दौर में और भी महत्वपूर्ण लगता है, जहाँ एक बार कही गई बात बहुत दूर तक जा सकती है। इसी तरह उपयोगिता को आकार से बड़ा मानने वाला दोहा हमें यह समझाता है कि किसी व्यक्ति या संस्था का महत्व केवल उसकी बाहरी विशालता से नहीं, बल्कि समाज के लिए उसके वास्तविक योगदान से तय होना चाहिए।
इस दृष्टि से रहीम के दोहे विद्यार्थियों को केवल परीक्षा के लिए उत्तर याद कराने वाले पाठ नहीं हैं। वे व्यवहार, संबंध और निर्णय लेने की समझ विकसित करने वाले जीवन-पाठ भी हैं।
रहीम के दोहों में प्रमुख जीवन-मूल्य
- आत्मसम्मान: बिना आवश्यकता किसी के सामने हाथ फैलाने से बचना।
- परोपकार: जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता करना।
- वाणी-संयम: बोलने से पहले शब्दों के परिणाम पर विचार करना।
- उपयोगिता: बड़ा होने से अधिक महत्वपूर्ण उपयोगी होना है।
- लोककल्याण: शासक या शक्तिशाली व्यक्ति का उद्देश्य दूसरों का हित होना चाहिए।
- चरित्र: व्यक्ति के व्यवहार से परिवार की प्रतिष्ठा प्रभावित होती है।
- विनम्रता: सफलता मिलने के बाद अहंकार नहीं करना चाहिए।
- विवेक: निजी दुख हर व्यक्ति के सामने प्रकट नहीं करना चाहिए।
भाषा-शैली की विशेषताएँ
रहीम के दोहों की भाषा सहज और प्रभावशाली है। उन्होंने कठिन दार्शनिक विचारों को सामान्य जीवन के उदाहरणों से समझाया है। उनकी शैली में लोकानुभव, व्यंग्य, नीति और दृष्टांत का सुंदर मेल मिलता है।
मोती, पानी, हिरण, समुद्र, चंद्रमा, सूर्य, दीपक और शतरंज जैसे उदाहरण दोहों को चित्रात्मक बना देते हैं। इस कारण पाठक को केवल उपदेश नहीं मिलता, बल्कि उसके सामने पूरा दृश्य भी बन जाता है।
काव्यगत विशेषताएँ
- दोहा प्रमुख काव्य रूप है।
- नीति और जीवन-दर्शन प्रमुख विषय हैं।
- लोकजीवन से लिए गए उदाहरणों का प्रभावी प्रयोग है।
- ‘पानी’ वाले दोहे में श्लेष अलंकार का सुंदर प्रयोग है।
- भाषा सहज, संक्षिप्त और अर्थपूर्ण है।
- व्यंग्य और दृष्टांत के माध्यम से सामाजिक व्यवहार पर टिप्पणी की गई है।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु
- पाठ – रहीम के दोहे
- अध्याय – Chapter 1
- कवि – अब्दुर्रहीम खानखाना
- जन्म – 1556 ई.
- पिता – बैरम खाँ
- प्रमुख उपाधि – खानखाना
- मुख्य विषय – नीति और मानवीय जीवन-मूल्य
- ‘पानी’ के अर्थ – चमक, प्रतिष्ठा और जल
- प्रमुख अलंकार – श्लेष
- मुख्य संदेश – आत्मसम्मान, परोपकार, संयम, विनम्रता और विवेक
Quick Revision
रहीम के दोहे को एक लाइन में समझना हो तो कहा जा सकता है कि यह पाठ हमें सिखाता है—सम्मान बनाए रखो, जरूरतमंद की मदद करो, सोचकर बोलो, उपयोगी बनो और सफलता मिलने पर अहंकार मत करो।
अगला अध्याय
Bihar Board Class 11 Hindi Chapter 2 – जीवन संदेश
Conclusion
Bihar Board Class 11 Hindi Chapter 1 – रहीम के दोहे केवल नीति के कुछ दोहों का संग्रह नहीं है। यह मनुष्य के व्यवहार को समझने और बेहतर जीवन जीने की दृष्टि देता है। रहीम ने सामान्य जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं और वस्तुओं से ऐसे सिद्धांत निकाले हैं जो आज भी हमारे व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में उपयोगी हैं। यही उनके दोहों की सबसे बड़ी शक्ति है।
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