गोधूलि भाग 2, कक्षा 10 हिंदी गद्य पाठ 11 |नौबतखाने में इबादत (व्यक्तिचित्र) – यतीन्द्र मिश्र

30 July 2026  |  By Ramnivas KT

प्रस्तावना (गोधूलि भाग 2, पाठ 11 – नौबतखाने में इबादत)

“नौबतखाने में इबादत” बिहार बोर्ड कक्षा 10 हिंदी की पाठ्यपुस्तक “गोधूलि भाग 2” के गद्य खंड का ग्यारहवाँ पाठ है। यह पाठ प्रसिद्ध लेखक यतीन्द्र मिश्र द्वारा रचित एक संवेदनशील व्यक्तिचित्र है, जो भारत रत्न से सम्मानित मशहूर शहनाईवादक उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ के जीवन, संगीत-साधना और उनकी काशी के प्रति गहरी आस्था पर आधारित है। यह पाठ छात्रों को भारतीय शास्त्रीय संगीत की समृद्ध परंपरा और एक महान कलाकार के जीवन-दर्शन से परिचित कराता है।

लेखक परिचय

यतीन्द्र मिश्र का जन्म 12 अप्रैल 1977 को उत्तर प्रदेश के अयोध्या नगर में हुआ था। वे हिंदी के प्रतिष्ठित कवि और लेखक हैं, जिनके तीन काव्य-संग्रह प्रकाशित हुए हैं – “यदा-कदा”, “अयोध्या तथा अन्य कविताएँ” और “ड्योढ़ी का आलाप”। उन्होंने प्रख्यात शास्त्रीय गायिका गिरिजा देवी के जीवन और संगीत-साधना पर “गिरिजा” नामक पुस्तक भी लिखी है। उन्हें भारत भूषण अग्रवाल कविता सम्मान, हेमंत स्मृति कविता पुरस्कार और ऋतुराज सम्मान जैसे अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। वे 1999 ई. से एक न्यास का संचालन भी कर रहे हैं।

विस्तृत सारांश (गोधूलि भाग 2, पाठ 11)

यह पाठ प्रसिद्ध शहनाईवादक उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ के जीवन पर आधारित एक रोचक व्यक्तिचित्र है। लेखक ने बिस्मिल्ला खाँ के बचपन, उनकी रुचियों, अंतर्मन की बुनावट और संगीत के प्रति उनकी अटूट आस्था का बड़ी संवेदनशीलता से वर्णन किया है। बिस्मिल्ला खाँ ने अपने बचपन के कई वर्ष डुमराँव में बिताए, इसके पश्चात वे काशी (वाराणसी) में रहने के लिए आ गए, जहाँ उनका संपूर्ण जीवन संगीत-साधना को समर्पित हो गया।

लेखक के अनुसार संगीत एक आराधना है, जिसका अपना शास्त्र और विधि-विधान है। इसे केवल जानना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि निरंतर अभ्यास आवश्यक है, और इस अभ्यास के लिए गुरु-शिष्य परंपरा का पालन अनिवार्य है। बिस्मिल्ला खाँ का संपूर्ण जीवन इसी परंपरा और साधना का उदाहरण है।

पाठ में काशी नगरी के प्रति बिस्मिल्ला खाँ के गहरे प्रेम को भी दर्शाया गया है। जब उनसे काशी छोड़ने की बात कही जाती, तो वे कहते – “क्या करें मियाँ, काशी छोड़कर कहाँ जाएँ, गंगा मइया यहाँ, बाबा विश्वनाथ यहाँ, बालाजी का मंदिर यहाँ।” यह कथन काशी के प्रति उनके अटूट लगाव और श्रद्धा को दर्शाता है। काशी को संगीत, नृत्य और संस्कृति की पाठशाला माना जाता है, और बिस्मिल्ला खाँ इसी परंपरा के महान प्रतिनिधि थे।

पाठ में काशी के संकटमोचन मंदिर में हनुमान जयंती के अवसर पर आयोजित होने वाली शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत की पाँच दिवसीय सभा का भी उल्लेख है, जिसमें बिस्मिल्ला खाँ का शहनाई-वादन अनिवार्य रूप से होता था। यह आयोजन काशी की प्राचीन और विचित्र संगीत-परंपरा का प्रतीक है। लेखक शहनाई वाद्य-यंत्र के विषय में भी जानकारी देते हैं – शहनाई को “सुषिर वाद्यों में शाह” (सुषिर अर्थात फूँककर बजाए जाने वाले वाद्ययंत्रों में सर्वश्रेष्ठ) की उपाधि प्राप्त है, और इसकी रीड (जिह्वा) एक विशेष प्रकार के पौधे से तैयार की जाती है।

पाठ के माध्यम से यह भी स्पष्ट होता है कि बिस्मिल्ला खाँ के लिए संगीत केवल कला नहीं, बल्कि एक इबादत (आराधना) थी। “नौबतखाने में इबादत” शीर्षक इसी भाव को व्यक्त करता है – नौबतखाना, जहाँ शहनाई और अन्य मांगलिक वाद्य बजाए जाते हैं, वहाँ बिस्मिल्ला खाँ के लिए संगीत साधना ही सच्ची इबादत थी।

केंद्रीय भाव (गोधूलि भाग 2, पाठ 11 – नौबतखाने में इबादत)

इस व्यक्तिचित्र का केंद्रीय भाव यह है कि सच्चा संगीत-साधक अपनी कला को आराधना और इबादत के समान मानकर जीवन भर उसकी साधना करता है। उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ का जीवन यह दर्शाता है कि संगीत, संस्कृति और आस्था का गहरा संबंध है, और काशी जैसी नगरी इस समृद्ध परंपरा की संवाहक है।

शब्दार्थ (Word Meanings)

व्याख्या (Explanation)

लेखक यतीन्द्र मिश्र इस व्यक्तिचित्र में उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ के जीवन को केवल एक संगीतकार के रूप में नहीं, बल्कि एक सच्चे साधक के रूप में प्रस्तुत करते हैं। उनके लिए शहनाई-वादन केवल कला-प्रदर्शन नहीं था, बल्कि यह ईश्वर की आराधना का माध्यम था। काशी के प्रति उनका गहरा लगाव यह दर्शाता है कि वे अपनी जन्मभूमि और उसकी सांस्कृतिक परंपरा से आत्मिक रूप से जुड़े हुए थे।

लेखक यह भी स्पष्ट करते हैं कि संगीत की साधना के लिए गुरु-शिष्य परंपरा का पालन और निरंतर अभ्यास आवश्यक है। बिस्मिल्ला खाँ का संकटमोचन मंदिर में नियमित रूप से शहनाई बजाना यह दर्शाता है कि उनके लिए संगीत और आध्यात्मिकता एक-दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़े हुए थे। इस प्रकार लेखक संगीत को केवल मनोरंजन का साधन न मानकर उसे जीवन-दर्शन और आस्था के स्तर पर प्रस्तुत करते हैं।

महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न (गोधूलि भाग 2, पाठ 11)

  1. “नौबतखाने में इबादत” पाठ किस विधा में रचित है?

    (a) ललित रचना (b) साक्षात्कार (c) निबंध (d) व्यक्तिचित्र

    उत्तर: (d) व्यक्तिचित्र

  2. “नौबतखाने में इबादत” पाठ के लेखक कौन हैं?

    (a) यतीन्द्र मिश्र (b) अशोक वाजपेयी (c) रामविलास शर्मा (d) विनोद कुमार शुक्ल

    उत्तर: (a) यतीन्द्र मिश्र

  3. “सुषिर वाद्यों में शाह” की उपाधि किसे प्राप्त है?

    (a) तबला (b) बाँसुरी (c) ढोलक (d) शहनाई

    उत्तर: (d) शहनाई

  4. काशी किसकी पाठशाला मानी जाती है?

    (a) संस्कृति की (b) नृत्य की (c) नर्तन की (d) वादन की

    उत्तर: (a) संस्कृति की

अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Questions)

  1. प्रश्न: “नौबतखाने में इबादत” पाठ किसके जीवन पर आधारित है?

    उत्तर: यह पाठ प्रसिद्ध शहनाईवादक उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ के जीवन पर आधारित है।

  2. प्रश्न: यतीन्द्र मिश्र का जन्म कहाँ हुआ था?

    उत्तर: उनका जन्म उत्तर प्रदेश के अयोध्या नगर में हुआ था।

लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)

  1. प्रश्न: बिस्मिल्ला खाँ काशी छोड़ने के प्रश्न पर क्या कहते थे?

    उत्तर: बिस्मिल्ला खाँ कहते थे – “क्या करें मियाँ, काशी छोड़कर कहाँ जाएँ, गंगा मइया यहाँ, बाबा विश्वनाथ यहाँ, बालाजी का मंदिर यहाँ”, जो काशी के प्रति उनके गहरे प्रेम को दर्शाता है।

  2. प्रश्न: संकटमोचन मंदिर में संगीत सभा का आयोजन कब और कैसे होता है?

    उत्तर: हनुमान जयंती के अवसर पर काशी के संकटमोचन मंदिर में पाँच दिनों तक शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत की श्रेष्ठ सभा का आयोजन होता है, जिसमें बिस्मिल्ला खाँ का शहनाई-वादन अवश्य होता था।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)

  1. प्रश्न: “नौबतखाने में इबादत” पाठ के आधार पर उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ के व्यक्तित्व और संगीत-साधना का वर्णन कीजिए।

    उत्तर: उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ एक महान शहनाईवादक थे, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन संगीत-साधना को समर्पित कर दिया। उनके लिए संगीत केवल कला नहीं, बल्कि एक आराधना (इबादत) थी। उन्होंने बचपन के कई वर्ष डुमराँव में बिताए, इसके बाद काशी में बस गए, जहाँ उनका जीवन गंगा, बाबा विश्वनाथ और बालाजी मंदिर से गहराई से जुड़ गया। वे नियमित रूप से संकटमोचन मंदिर में शहनाई बजाते थे, जो उनकी आध्यात्मिकता और संगीत-भक्ति का प्रतीक है। उनका जीवन यह सिखाता है कि सच्ची कला-साधना में समर्पण, अनुशासन और गुरु-शिष्य परंपरा का पालन अनिवार्य है।

  2. प्रश्न: “नौबतखाने में इबादत” शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।

    उत्तर: “नौबतखाने में इबादत” शीर्षक अत्यंत सार्थक है। नौबतखाना वह स्थान है जहाँ मांगलिक अवसरों पर शहनाई और अन्य वाद्ययंत्र बजाए जाते हैं। बिस्मिल्ला खाँ के लिए यह वादन केवल एक कला-प्रदर्शन नहीं था, बल्कि यह उनके लिए इबादत यानी ईश्वर की आराधना के समान था। वे शहनाई बजाते समय पूर्ण तल्लीनता और भक्ति-भाव से भर जाते थे, मानो वे संगीत के माध्यम से ईश्वर से संवाद कर रहे हों। इस प्रकार शीर्षक उनके जीवन-दर्शन और संगीत के प्रति उनकी गहन आस्था को सटीक रूप से व्यक्त करता है।

महत्वपूर्ण परीक्षा प्रश्न (गोधूलि भाग 2, पाठ 11 – नौबतखाने में इबादत)

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

  1. प्रश्न: “नौबतखाने में इबादत” किस पुस्तक और पाठ संख्या से संबंधित है?

    उत्तर: यह पाठ “गोधूलि भाग 2” पुस्तक के गद्य खंड का पाठ 11 है।

  2. प्रश्न: उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ किस वाद्ययंत्र के लिए प्रसिद्ध थे?

    उत्तर: वे शहनाई-वादन के लिए प्रसिद्ध थे और उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया था।

  3. प्रश्न: इस पाठ से हमें क्या शिक्षा मिलती है?

    उत्तर: इस पाठ से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सच्ची कला-साधना में समर्पण, अनुशासन, गुरु के प्रति श्रद्धा और अपनी संस्कृति के प्रति गहरा लगाव आवश्यक है।

निष्कर्ष (गोधूलि भाग 2, पाठ 11 – नौबतखाने में इबादत)

“नौबतखाने में इबादत” व्यक्तिचित्र यतीन्द्र मिश्र की संवेदनशील और रोचक लेखन-शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह पाठ हमें उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ के जीवन के माध्यम से यह सिखाता है कि संगीत केवल कला नहीं, बल्कि आराधना और जीवन-दर्शन का माध्यम भी हो सकता है। यह पाठ छात्रों में भारतीय शास्त्रीय संगीत और सांस्कृतिक परंपरा के प्रति सम्मान तथा जागरूकता उत्पन्न करता है।

यह लेख केवल शैक्षणिक उद्देश्य से BSEB कक्षा 10 पाठ्यक्रम (गोधूलि भाग 2) के आधार पर तैयार किया गया है।

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