भारतमाता (कविता) – सुमित्रानंदन पंत | गोधूलि भाग 2, कक्षा 10 हिंदी पद्य पाठ 5
प्रस्तावना (गोधूलि भाग 2, पद्य पाठ 5)
“भारतमाता” बिहार बोर्ड कक्षा 10 हिंदी की पाठ्यपुस्तक “गोधूलि भाग 2” के पद्य खंड का पाँचवाँ पाठ है। यह प्रसिद्ध छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित एक अत्यंत मार्मिक कविता है, जो उनके काव्य-संग्रह “ग्राम्या” से ली गई है। इस कविता में कवि ने पराधीन भारत की दुर्दशा को “भारतमाता ग्रामवासिनी” के रूप में चित्रित किया है, जो हिंदी की यथार्थवादी कविता की दिशा में एक नया मोड़ मानी जाती है।
कवि परिचय
सुमित्रानंदन पंत का जन्म 20 मई 1900 ई. को अलमोड़ा जिले के रमणीय स्थल कौसानी (उत्तराखंड) में हुआ था। जन्म के लगभग छह घंटे बाद ही उनकी माता सरस्वती देवी का देहांत हो गया। उनके पिता गंगादत्त पंत कौसानी टी स्टेट में एकाउंटेंट के पद पर कार्यरत थे। पंत जी की प्रारंभिक शिक्षा गाँव में हुई, इसके बाद उन्होंने बनारस से हाईस्कूल की शिक्षा प्राप्त की। कुछ समय तक वे कालाकांकर राज्य में भी रहे, इसके पश्चात आजीवन इलाहाबाद में निवास करते रहे। वे हिंदी छायावाद के चार प्रमुख स्तंभों में से एक माने जाते हैं और प्रकृति-सौंदर्य के कवि के रूप में विख्यात हैं। उनका निधन 28 दिसंबर 1977 ई. को हुआ।
कविता का सारांश (गोधूलि भाग 2, पद्य पाठ 5)
“भारतमाता” कविता में सुमित्रानंदन पंत भारत माता को “ग्रामवासिनी” के रूप में चित्रित करते हैं, अर्थात वे भारत माता को शहरों में नहीं, बल्कि देश के गाँवों में निवास करते हुए दिखाते हैं। कवि के अनुसार यह भारत माता पराधीनता के कारण अपने ही घर में प्रवासिनी बन गई है – अर्थात अपने ही देश में वह पराई-सी हो गई है।
कवि भारत माता का चित्रण अत्यंत करुण रूप में करते हैं – उसकी भृकुटी चिंता से ग्रसित है, उसका संपूर्ण घरातल परतंत्रता रूपी अंधकार से घिरा हुआ है, और उसके नेत्र दैन्य से झुके हुए हैं। भारतवासियों का हृदय-आकाश आँसुओं की वाष्प से भरा हुआ है। चंद्रमा के समान सुंदर और प्रसन्न रहने वाला मुख आज उदासीन होकर घोर चिंता के सागर में डूबा हुआ प्रतीत होता है। यह सारा चित्रण पराधीन भारत की पीड़ा और उसकी करुण दशा को उजागर करता है।
कविता में कवि भारत माता की मिट्टी की प्रतिमा के समान उदासीनता का भी उल्लेख करते हैं, जो स्वर्ण-शस्य (सोने जैसी फसल) पर पद-तल से रौंदी जा रही है और राहु-ग्रसित शरदेंदु के समान म्लान (फीकी) हो गई है। इसके बावजूद कवि आशा व्यक्त करते हैं कि भारत माता ही अज्ञानता को दूर करने वाली, जीवन को विकसित करने वाली शक्ति है। कवि भारत माता के नाम पर संपूर्ण भारतीय भाषावाद, जातिवाद, संप्रदायवाद और राजनीतिक भेदभावों को समाप्त करके संपूर्ण राष्ट्र को एकता के सूत्र में बाँधना चाहते हैं। कविता के अंत में कवि तीस करोड़ भारतवासियों की मनोभिलाषा और उनकी एकता की आवश्यकता पर बल देते हैं।
केंद्रीय भाव (गोधूलि भाग 2, पद्य पाठ 5)
इस कविता का केंद्रीय भाव यह है कि पराधीन भारत की वास्तविक तस्वीर शहरों में नहीं, बल्कि गाँवों में बसी हुई भारत माता के करुण रूप में दिखाई देती है। कवि सुमित्रानंदन पंत भारत माता की इस दुर्दशा को चित्रित करते हुए देशवासियों का आह्वान करते हैं कि वे जाति, भाषा, संप्रदाय और राजनीतिक मतभेदों को त्यागकर एकजुट हों, ताकि भारत माता को उसका खोया हुआ गौरव पुनः प्राप्त हो सके।
शब्दार्थ (Word Meanings)
- ग्रामवासिनी – गाँव में रहने वाली
- प्रवासिनी – परदेशी, अपने घर में भी पराई-सी
- भृकुटी – भौंहें
- दैन्य – दीनता, गरीबी
- शरदेंदु – शरद ऋतु का चंद्रमा
- राहु ग्रसित – राहु द्वारा ग्रस्त, ग्रहण से घिरा हुआ
- स्वर्ण शस्य – सोने के समान लहलहाती फसल
- पद तल लुंठित – पैरों तले रौंदी हुई
व्याख्या (Explanation)
सुमित्रानंदन पंत इस कविता में भारत माता को गाँवों में निवास करने वाली, दीन-हीन और पराधीनता से पीड़ित एक करुण नारी के रूप में चित्रित करते हैं। कवि के अनुसार वास्तविक भारत गाँवों में बसता है, और वहीं भारत माता की सच्ची छवि दिखाई देती है – चिंतित, उदास और परतंत्रता के अंधकार से घिरी हुई। स्वर्ण जैसी लहलहाती फसल के बावजूद वह पैरों तले रौंदी जा रही है, जो देश के आर्थिक शोषण और पराधीनता का प्रतीक है।
कवि की यह कविता केवल दुःख का चित्रण नहीं करती, बल्कि यह आशा और एकता का संदेश भी देती है। वे भारत माता के नाम पर सभी प्रकार के भाषाई, जातीय, सांप्रदायिक और राजनीतिक विभाजनों को समाप्त करके राष्ट्रीय एकता स्थापित करने का आह्वान करते हैं। यह कविता छायावादी कवि पंत की यथार्थवादी दृष्टि का परिचायक है, जिसमें प्रकृति-सौंदर्य के स्थान पर सामाजिक और राष्ट्रीय यथार्थ को प्रमुखता दी गई है।
महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न (गोधूलि भाग 2, पद्य पाठ 5)
- “भारतमाता” कविता के रचयिता कौन हैं?
(a) प्रेमघन (b) सुमित्रानंदन पंत (c) घनानंद (d) रसखान
उत्तर: (b) सुमित्रानंदन पंत
- सुमित्रानंदन पंत का जन्म कहाँ हुआ था?
(a) कौसानी (b) श्यामली (c) चंपारण (d) मेरठ
उत्तर: (a) कौसानी
- सुमित्रानंदन पंत के पिता का नाम क्या था?
(a) गंगादत्त (b) गंगाधर (c) श्रीधर (d) शिवदत्त
उत्तर: (a) गंगादत्त
- “भारतमाता” कविता किस संग्रह से ली गई है?
(a) पल्लव (b) ग्राम्या (c) चिदंबरा (d) उत्तरा
उत्तर: (b) ग्राम्या
- कवि ने “मिट्टी की प्रतिमा उदासिनी” किसे कहा है?
(a) मूर्ति को (b) माता को (c) भारतमाता को (d) विमाता को
उत्तर: (c) भारतमाता को
अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Questions)
- प्रश्न: सुमित्रानंदन पंत का निधन कब हुआ?
उत्तर: उनका निधन 28 दिसंबर 1977 ई. को हुआ।
- प्रश्न: कवि ने भारत माता को कहाँ की निवासिनी बताया है?
उत्तर: कवि ने भारत माता को गाँव की निवासिनी (ग्रामवासिनी) बताया है।
लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)
- प्रश्न: भारत माता अपने ही घर में प्रवासिनी क्यों बनी हुई है?
उत्तर: पराधीनता और शोषण के कारण भारत माता अपने ही देश में उपेक्षित और पराई जैसी हो गई है, इसीलिए कवि ने उसे अपने ही घर में प्रवासिनी बताया है।
- प्रश्न: कवि भारत माता के नाम पर क्या करना चाहते हैं?
उत्तर: कवि भारत माता के नाम पर संपूर्ण भारतीय भाषावाद, जातिवाद, संप्रदायवाद और राजनीतिक भेदभावों को समाप्त करके देश को एकता के सूत्र में पिरोना चाहते हैं।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)
- प्रश्न: “भारतमाता” कविता में चित्रित भारत की दुर्दशा का वर्णन कीजिए।
उत्तर: सुमित्रानंदन पंत ने इस कविता में पराधीन भारत की करुण दशा का मार्मिक चित्रण किया है। भारत माता की भृकुटी चिंता से ग्रसित है, उसका संपूर्ण घरातल परतंत्रता रूपी अंधकार से घिरा हुआ है, और भारतवासियों के नेत्र दीनता से झुके हुए हैं। उनका हृदय-आकाश आँसुओं की वाष्प से भरा हुआ है, और चंद्रमा के समान सुंदर मुख उदासीन होकर चिंता के सागर में डूबा हुआ प्रतीत होता है। स्वर्ण जैसी फसल के बावजूद भारत माता पैरों तले रौंदी जा रही है, जो पराधीनता और आर्थिक शोषण का प्रतीक है। इस प्रकार कवि ने भारत की तत्कालीन दुर्दशा को अत्यंत संवेदनशीलता से प्रस्तुत किया है।
- प्रश्न: “भारतमाता” कविता के माध्यम से कवि ने राष्ट्रीय एकता का क्या संदेश दिया है?
उत्तर: कवि सुमित्रानंदन पंत भारत माता के करुण चित्रण के माध्यम से देशवासियों को एकता का महत्वपूर्ण संदेश देते हैं। वे चाहते हैं कि भारत माता के नाम पर संपूर्ण भारतीय समाज में व्याप्त भाषावाद, जातिवाद, संप्रदायवाद और राजनीतिक मतभेदों को समाप्त कर दिया जाए। कवि के अनुसार जब तक तीस करोड़ भारतवासी अपने आपसी मतभेद भुलाकर एकजुट नहीं होंगे, तब तक भारत माता की पराधीनता और दुर्दशा समाप्त नहीं हो सकती। यह कविता राष्ट्रीय एकता और सामूहिक प्रयास की आवश्यकता पर बल देती है।
महत्वपूर्ण परीक्षा प्रश्न (गोधूलि भाग 2, पद्य पाठ 5)
- सुमित्रानंदन पंत के जीवन परिचय और उनकी प्रमुख रचनाओं पर संक्षिप्त लेख लिखिए।
- “भारतमाता” कविता की यथार्थवादी विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
- कविता में प्रयुक्त प्रतीकों का उल्लेख करते हुए उनका अर्थ स्पष्ट कीजिए।
- छायावादी काव्यधारा में सुमित्रानंदन पंत का क्या स्थान है?
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
- प्रश्न: यह पद्य पाठ किस पुस्तक और पाठ संख्या से संबंधित है?
उत्तर: यह पाठ “गोधूलि भाग 2” पुस्तक के पद्य खंड का पाठ 5 है।
- प्रश्न: सुमित्रानंदन पंत की माता का देहांत कब हुआ?
उत्तर: उनकी माता सरस्वती देवी का देहांत उनके जन्म के लगभग छह घंटे बाद ही हो गया था।
- प्रश्न: इस कविता से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर: इस कविता से हमें यह शिक्षा मिलती है कि राष्ट्रीय एकता और आपसी मतभेदों को भुलाकर एकजुट होना ही देश की उन्नति और गौरव की पुनर्स्थापना का मार्ग है।
निष्कर्ष (गोधूलि भाग 2, पद्य पाठ 5)
“भारतमाता” कविता सुमित्रानंदन पंत की संवेदनशील और यथार्थवादी काव्य-दृष्टि का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह कविता हमें पराधीन भारत की करुण दशा से परिचित कराते हुए राष्ट्रीय एकता और सामूहिक प्रयास की आवश्यकता का महत्वपूर्ण संदेश देती है। यह पाठ छात्रों में देशभक्ति, सामाजिक जागरूकता और राष्ट्रीय एकता के प्रति सजगता उत्पन्न करता है।
यह लेख केवल शैक्षणिक उद्देश्य से BSEB कक्षा 10 पाठ्यक्रम (गोधूलि भाग 2) के आधार पर तैयार किया गया है।
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