भीष्म-प्रतिज्ञा – कक्षा 10 संस्कृत पीयूषम् द्वितीयो भागः, द्रुतपाठाय भाग 2, पाठ 7
प्रस्तावना (कक्षा 10 संस्कृत, पीयूषम् भाग 2, पाठ 7 भीष्म-प्रतिज्ञा)
“भीष्म-प्रतिज्ञा” बिहार बोर्ड कक्षा 10 संस्कृत की अनुपूरक पाठ्यपुस्तक “पीयूषम् द्वितीयो भागः” (पीयूषम् द्रुतपाठाय भाग 2) का सातवाँ पाठ है। यह गद्यांश महाभारत की प्रसिद्ध कथा पर आधारित है, जिसमें हस्तिनापुर के राजा शान्तनु के पुत्र देवव्रत द्वारा ली गई अद्वितीय त्याग और प्रतिज्ञा की गाथा का वर्णन किया गया है। इसी अलौकिक प्रतिज्ञा के कारण देवव्रत आगे चलकर “भीष्म” के नाम से प्रसिद्ध हुए।
पाठ का सारांश (भीष्म-प्रतिज्ञा, कक्षा 10 संस्कृत पीयूषम् भाग 2)
इस पाठ में हस्तिनापुर-नरेश शान्तनु के पुत्र देवव्रत की कथा का वर्णन है। देवव्रत शान्तनु के ज्येष्ठ पुत्र थे और राज्य के स्वाभाविक अधिकारी थे। एक समय राजा शान्तनु दासराज (धीवर) की कन्या सत्यवती के प्रति आकर्षित हुए और उनसे विवाह करना चाहते थे। किंतु दासराज ने विवाह की शर्त रखी कि सत्यवती का ही पुत्र भविष्य में हस्तिनापुर का राज्याधिकारी बनेगा। यह शर्त राजा शान्तनु के मन में गहरी चिंता का कारण बन गई, क्योंकि इससे उनके ज्येष्ठ पुत्र देवव्रत के राज्याधिकार पर प्रश्न खड़ा हो जाता।
अपने पिता की इस चिंता को दूर करने और उन्हें प्रसन्न करने का कर्तव्य पुत्र का ही होता है, यह समझते हुए देवव्रत ने एक अत्यंत कठोर और अद्वितीय प्रतिज्ञा ली। उन्होंने राज्याधिकार का त्याग कर दिया और आजीवन अविवाहित (ब्रह्मचारी) रहने की प्रतिज्ञा कर ली, ताकि सत्यवती और उनके पुत्रों के राज्याधिकार में कोई बाधा न आए। प्राचीन काल में ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करने वाले शिष्यों को “ब्रह्मचारी” कहा जाता था, और देवव्रत ने भी यही व्रत आजीवन धारण किया। देवव्रत के इस असाधारण त्याग और दृढ़ प्रतिज्ञा के कारण ही वे आगे चलकर “भीष्म” कहलाए।
केंद्रीय भाव (भीष्म-प्रतिज्ञा, कक्षा 10 संस्कृत पीयूषम् भाग 2)
इस पाठ का केंद्रीय भाव यह है कि पुत्र का कर्तव्य है कि वह अपने पिता की चिंता को दूर करे और उन्हें प्रसन्न रखे। देवव्रत ने अपने पिता शान्तनु की प्रसन्नता के लिए राज्य और विवाह जैसे व्यक्तिगत सुखों का त्याग कर एक कठोर प्रतिज्ञा ली, जो पितृभक्ति, त्याग और कर्तव्यनिष्ठा के आदर्श का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करती है।
शब्दार्थ (Word Meanings)
- ब्रह्मचारी — ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करने वाला शिष्य
- प्रतिज्ञा — संकल्प, दृढ़ निश्चय
- दुहिता (दुहितृ) — पुत्री, कन्या
- धीवर / दासराज — मछुआरे का राजा, नाविकों का मुखिया
- राज्याधिकारी — राज्य पर अधिकार रखने वाला, उत्तराधिकारी
- ज्येष्ठ पुत्र — सबसे बड़ा पुत्र
- पितुः चिन्ता-अपनयनम् — पिता की चिंता को दूर करना
- प्रसादनम् — प्रसन्न करना, संतुष्ट करना
व्याख्या (Explanation)
इस पाठ में देवव्रत के चरित्र के माध्यम से आदर्श पुत्र-धर्म को दर्शाया गया है। देवव्रत हस्तिनापुर-नरेश शान्तनु के पुत्र और राज्य के स्वाभाविक उत्तराधिकारी थे, किंतु जब उनके पिता सत्यवती से विवाह करना चाहते थे और दासराज ने शर्त रखी कि सत्यवती के पुत्र को ही राज्य प्राप्त होगा, तो देवव्रत ने बिना किसी संकोच के अपने राज्याधिकार का त्याग कर दिया।
पाठ में यह स्पष्ट किया गया है कि पिता की चिंता को दूर करना और उन्हें प्रसन्न करना पुत्र का ही कर्तव्य होता है। इसी कर्तव्यबोध से प्रेरित होकर देवव्रत ने आजीवन अविवाहित रहकर ब्रह्मचर्य-व्रत के पालन की प्रतिज्ञा ली। प्राचीन भारतीय परंपरा में ऐसे व्रतधारी शिष्यों को “ब्रह्मचारी” कहा जाता था। देवव्रत की यह प्रतिज्ञा इतनी कठोर और अद्भुत थी कि इसे सुनकर सभी आश्चर्यचकित रह गए, और इसी असाधारण त्याग के कारण उन्हें “भीष्म” की उपाधि प्राप्त हुई। यह कथा त्याग, पितृभक्ति और कर्तव्यपालन के सर्वोच्च आदर्श को प्रस्तुत करती है।
वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Questions)
हिन्दी में वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर
- प्राचीन काल में शिष्यों को क्या कहा जाता था?
(क) छात्र (ख) ब्रह्मचारी (ग) धनुर्धारी (घ) अन्तेवासी
उत्तर: (ख) ब्रह्मचारी - ब्रह्मचर्य पालन करने की प्रतिज्ञा किसने की?
(क) शान्तनु (ख) युधिष्ठिर (ग) देवव्रत (घ) अर्जुन
उत्तर: (ग) देवव्रत - सत्यवती किसकी कन्या थी?
(क) महामंत्री (ख) धीवर (ग) राजा (घ) कोई नहीं
उत्तर: (ख) धीवर - किसका पुत्र राज्याधिकारी होगा, यह शर्त रखी गई थी?
(क) पार्वती (ख) लक्ष्मी (ग) सत्यवती (घ) कोई नहीं
उत्तर: (ग) सत्यवती - महाराजा (शान्तनु) के ज्येष्ठ पुत्र कौन थे?
(क) भीष्म (ख) युधिष्ठिर (ग) अर्जुन (घ) देवव्रत
उत्तर: (घ) देवव्रत - देवव्रत किसका पुत्र था?
(क) शान्तनु (ख) युधिष्ठिर (ग) कर्ण (घ) अर्जुन
उत्तर: (क) शान्तनु - देवव्रत की प्रतिज्ञा थी—
(क) पांडवों से युद्ध करना (ख) हस्तिनापुर का राजा बनना (ग) पिता की सेवा करना (घ) जीवनभर अविवाहित रहना
उत्तर: (घ) जीवनभर अविवाहित रहना
संस्कृत में वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर
- देवव्रतः कः आसीत्?
(क) कौरवराजः (ख) शान्तनोः पुत्रः (ग) महाबली (घ) विद्वान्
उत्तर: (ख) शान्तनोः पुत्रः - सत्यवती कस्य दुहिता आसीत्?
(क) दासराजस्य धीवरस्य (ख) पांडुराजस्य (ग) पांडुपुत्रस्य (घ) दुर्योधनस्य
उत्तर: (क) दासराजस्य धीवरस्य - दाशराजस्य धीवरस्य दुहिता आसीत्—
(क) परमसुंदरी (ख) सत्यवती (ग) राज्ञी (घ) सत्यवमती
उत्तर: (ख) सत्यवती - पितुः चिन्तायाः अपनयनं तस्य प्रसादनं च कस्य कर्त्तव्यं भवति?
(क) जनाः (ख) राजस्य (ग) पुत्रस्य (घ) मंत्रीस्य
उत्तर: (ग) पुत्रस्य
लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)
- प्रश्न: प्राचीन काल में ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करने वाले शिष्यों को क्या कहा जाता था?
उत्तर: प्राचीन काल में ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करने वाले शिष्यों को “ब्रह्मचारी” कहा जाता था। - प्रश्न: सत्यवती किसकी पुत्री थी?
उत्तर: सत्यवती दासराज (धीवर) की पुत्री थी। - प्रश्न: देवव्रत और शान्तनु का संबंध क्या था?
उत्तर: देवव्रत, राजा शान्तनु के ज्येष्ठ पुत्र थे। - प्रश्न: दासराज ने विवाह की क्या शर्त रखी थी?
उत्तर: दासराज ने यह शर्त रखी थी कि सत्यवती का पुत्र ही भविष्य में राज्याधिकारी बनेगा।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)
- प्रश्न: देवव्रत ने कौन-सी प्रतिज्ञा ली और उसका क्या कारण था?
उत्तर: देवव्रत, हस्तिनापुर-नरेश शान्तनु के ज्येष्ठ पुत्र और राज्य के स्वाभाविक अधिकारी थे। जब राजा शान्तनु दासराज (धीवर) की कन्या सत्यवती से विवाह करना चाहते थे, तो दासराज ने शर्त रखी कि सत्यवती का ही पुत्र भविष्य में हस्तिनापुर का राज्याधिकारी बनेगा। यह शर्त राजा शान्तनु के मन में गहरी चिंता का कारण बनी, क्योंकि इससे देवव्रत का राज्याधिकार प्रभावित होता। पिता की चिंता को दूर करना और उन्हें प्रसन्न करना पुत्र का कर्तव्य समझते हुए देवव्रत ने राज्याधिकार का त्याग कर दिया और आजीवन अविवाहित (ब्रह्मचारी) रहने की कठोर प्रतिज्ञा ली, ताकि सत्यवती के पुत्र राज्याधिकार में उनकी ओर से कोई बाधा न रहे। - प्रश्न: देवव्रत को “भीष्म” की उपाधि क्यों प्राप्त हुई?
उत्तर: देवव्रत ने अपने पिता शान्तनु की प्रसन्नता और उनकी चिंता दूर करने के लिए राज्याधिकार तथा विवाह जैसे व्यक्तिगत सुखों का त्याग कर आजीवन अविवाहित रहने की अत्यंत कठोर प्रतिज्ञा ली। यह प्रतिज्ञा इतनी असाधारण और भीषण थी कि इसे सुनकर सभी लोग चकित रह गए। इसी अद्वितीय त्याग और दृढ़ संकल्प के कारण देवव्रत आगे चलकर “भीष्म” के नाम से प्रसिद्ध हुए।
महत्वपूर्ण परीक्षा प्रश्न (भीष्म-प्रतिज्ञा, कक्षा 10 संस्कृत पीयूषम् भाग 2)
- देवव्रत और सत्यवती के प्रसंग का वर्णन कीजिए।
- पुत्र के कर्तव्य के संदर्भ में इस पाठ का संदेश स्पष्ट कीजिए।
- दासराज द्वारा रखी गई शर्त क्या थी और उसका क्या परिणाम हुआ?
- “भीष्म-प्रतिज्ञा” शीर्षक की सार्थकता पर विचार कीजिए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
- प्रश्न: “भीष्म-प्रतिज्ञा” पाठ किस पुस्तक और पाठ क्रमांक से संबंधित है?
उत्तर: यह पाठ बिहार बोर्ड कक्षा 10 संस्कृत की अनुपूरक पुस्तक “पीयूषम् द्वितीयो भागः” (पीयूषम् द्रुतपाठाय भाग 2) का पाठ 7 है। - प्रश्न: देवव्रत की प्रतिज्ञा क्या थी?
उत्तर: देवव्रत की प्रतिज्ञा थी कि वे जीवनभर अविवाहित (ब्रह्मचारी) रहेंगे और राज्याधिकार का त्याग करेंगे। - प्रश्न: इस पाठ से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर: इस पाठ से हमें पितृभक्ति, त्याग और पुत्र के कर्तव्य की शिक्षा मिलती है — कि पिता की चिंता दूर करना और उन्हें प्रसन्न रखना पुत्र का परम कर्तव्य है।
निष्कर्ष (भीष्म-प्रतिज्ञा, कक्षा 10 संस्कृत पीयूषम् भाग 2)
“भीष्म-प्रतिज्ञा” पाठ देवव्रत के अद्वितीय त्याग, पितृभक्ति और कर्तव्यनिष्ठा की गौरवशाली गाथा प्रस्तुत करता है। अपने पिता की प्रसन्नता के लिए राज्य और विवाह का त्याग कर आजीवन ब्रह्मचर्य-व्रत की प्रतिज्ञा लेने वाले देवव्रत का यह चरित्र छात्रों में त्याग, कर्तव्यपालन और पितृभक्ति जैसे उच्च आदर्शों को विकसित करने में सहायक है।
यह लेख केवल शैक्षणिक उद्देश्य से BSEB कक्षा 10 संस्कृत (पीयूषम् द्वितीयो भागः / द्रुतपाठाय भाग 2) पाठ्यक्रम के आधार पर तैयार किया गया है। इस लेख की संपूर्ण सामग्री मौलिक रूप से लिखी गई है और किसी भी स्रोत से सीधे कॉपी नहीं की गई है।
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