कर्णस्य दानवीरता – कक्षा 10 संस्कृत पाठ 12 सम्पूर्ण व्याख्या, शब्दार्थ एवं प्रश्न-उत्तर

12 August 2026  |  By Ramnivas KT

प्रस्तावना (कक्षा 10 संस्कृत, पाठ 12)

“कर्णस्य दानवीरता” बिहार बोर्ड कक्षा 10 संस्कृत पाठ्यपुस्तक का बारहवाँ पाठ है। इस पाठ के रचयिता संस्कृत के प्रसिद्ध नाटककार भास हैं, जिनके तेरह (त्रयोदश) नाटक प्रसिद्ध हैं। यह पाठ भास द्वारा रचित “कर्णभारम्” नामक नाटक से संकलित है, जो महाभारत की कथा पर आधारित है। इस पाठ में महाभारत के अंगराज कर्ण की असाधारण दानशीलता और वीरता का मार्मिक चित्रण किया गया है।

पाठ का सारांश (Summary)

कर्ण सूर्य और कुंती के पुत्र थे तथा अंग देश के राजा थे। महाभारत के युद्ध में कर्ण कौरव पक्ष से युद्ध करते हैं, जबकि अर्जुन पाण्डव पक्ष से युद्ध करते हैं। कर्ण अपनी असीम दानवीरता के लिए प्रसिद्ध थे — वे सर्वप्रथम आभूषणों से सुसज्जित एक हज़ार गायें (सालङ्कारं गोसहस्रम्) दान में देते हैं।

इसी दानशीलता की परीक्षा लेने के लिए देवराज इन्द्र ब्राह्मण के वेश में कर्ण के पास आकर एक महत्तर भिक्षा (बड़ा दान) माँगते हैं। कर्ण के पास जन्म से ही अभेद्य कवच और कुण्डल थे, जिन्हें भेदना असंभव था। इन्द्र इन्हीं कवच-कुण्डलों की याचना करते हैं। कर्ण के सारथी शल्य उन्हें ऐसा न करने की सलाह देते हुए कहते हैं — “अङ्गराज! न दातव्यं न दातव्यम्” (हे अंगराज! यह मत दो, यह मत दो!)। परंतु कर्ण अपने दानशील स्वभाव और वचन के प्रति निष्ठा के कारण अपने कवच और कुण्डल इन्द्र को दान कर देते हैं। इतना ही नहीं, कर्ण अंत में अपना सिर तक देने की इच्छा प्रकट करते हैं।

कर्ण की इस असाधारण उदारता से प्रसन्न होकर इन्द्र कहते हैं — “सूर्य इव, चन्द्र इव, हिमवान् इव, सागर इव तिष्ठतु ते यशः” अर्थात तुम्हारा यश सूर्य, चंद्र, हिमालय और सागर के समान सदा स्थिर रहे। कथा में यह भी कहा गया है कि समय के बीतने (कालपर्यय) से शिक्षा (विद्या) का भी क्षय हो जाता है, परंतु कर्ण जैसे दानवीर का यश सदैव अक्षुण्ण रहता है।

केंद्रीय भाव (Central Idea)

इस पाठ का केंद्रीय भाव यह है कि सच्चा दान वही है जो अपने प्राणों की परवाह किए बिना, अपने वचन और स्वभाव के प्रति निष्ठा रखते हुए दिया जाए। कर्ण का चरित्र यह सिखाता है कि उदारता, त्याग और वचनबद्धता मनुष्य के यश को शाश्वत बना देती है, भले ही समय के साथ अन्य सभी वस्तुएँ नष्ट क्यों न हो जाएँ।

शब्दार्थ (Word Meanings)

व्याख्या (Explanation)

भास द्वारा रचित “कर्णभारम्” नाटक से लिया गया यह प्रसंग महाभारत के सर्वाधिक उदार और त्यागी पात्र कर्ण की गाथा प्रस्तुत करता है। सूर्यपुत्र कर्ण, जो अंग देश के राजा थे, कौरव पक्ष से युद्ध करते हुए भी अपने दानशील स्वभाव के लिए विख्यात थे। उनकी दानशीलता की परीक्षा लेने के लिए स्वयं देवराज इन्द्र ब्राह्मण का वेश धारण कर उनके पास पहुँचते हैं और उनसे उनके जन्मजात, अभेद्य कवच-कुण्डल माँगते हैं।

यह याचना अत्यंत कठिन थी, क्योंकि यह कवच-कुण्डल कर्ण की रक्षा का एकमात्र साधन थे। कर्ण के सारथी शल्य उन्हें बार-बार चेतावनी देते हुए कहते हैं कि यह दान मत दो, परंतु कर्ण अपने वचन और स्वभाव के प्रति निष्ठावान रहते हुए न केवल कवच-कुण्डल देते हैं, बल्कि अंत में अपना सिर तक अर्पित करने की इच्छा प्रकट करते हैं। यह प्रसंग कर्ण के चरित्र की उच्चतम नैतिकता और आत्म-त्याग को दर्शाता है।

कर्ण की इस असाधारण उदारता से प्रभावित होकर इन्द्र उन्हें आशीर्वाद देते हैं कि उनका यश सूर्य, चंद्र, हिमालय और सागर के समान चिरस्थायी रहेगा। यहाँ कवि यह संदेश देना चाहते हैं कि यद्यपि समय के साथ शिक्षा और अन्य वस्तुएँ क्षीण हो जाती हैं, परंतु सच्चे त्याग और दानवीरता से अर्जित यश कभी नष्ट नहीं होता। इस प्रकार यह पाठ दान, त्याग और वचनबद्धता के शाश्वत मूल्य को स्थापित करता है।

महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Questions)

  1. ‘कर्णस्य दानवीरता’ पाठ के रचयिता कौन हैं?

    (A) भास (B) कालिदास (C) सिद्धेश्वर ओझा (D) मिथिलेश कुमारी मिश्रा

    उत्तर: (A) भास

  2. ‘कर्णस्य दानवीरता’ पाठ किस नाटक से संकलित है?

    (A) पुराण से (B) कर्णभारम् से (C) रामायण से (D) हितोपदेश से

    उत्तर: (B) कर्णभारम् से (जो महाभारत की कथा पर आधारित है)

  3. कर्ण किस पक्ष से युद्ध करते हैं?

    (A) कौरव पक्ष से (B) पाण्डव पक्ष से (C) राम पक्ष से (D) बिहार पक्ष से

    उत्तर: (A) कौरव पक्ष से

  4. सूर्यपुत्र कौन हैं?

    (A) भीम (B) अर्जुन (C) कर्ण (D) युधिष्ठिर

    उत्तर: (C) कर्ण

  5. भास के कितने नाटक हैं?

    (A) दस (B) पंद्रह (C) तेरह (D) बारह

    उत्तर: (C) तेरह (त्रयोदश)

  6. कर्ण सर्वप्रथम क्या दान देते हैं?

    (A) आभूषणयुक्त हज़ार गायें (B) हज़ारों घोड़े (C) हाथियों का समूह (D) अपर्याप्त सुवर्ण

    उत्तर: (A) आभूषणयुक्त हज़ार गायें (सालङ्कारं गोसहस्रम्)

  7. कर्ण अपना कवच और कुण्डल किसे देते हैं?

    (A) इन्द्र को (B) भीष्म को (C) कृष्ण को (D) युधिष्ठिर को

    उत्तर: (A) इन्द्र को

  8. “सूर्य इव, चन्द्र इव, हिमवान् इव, सागर इव तिष्ठतु ते यशः” यह किसने कहा?

    (A) कर्ण ने (B) इन्द्र ने (C) अर्जुन ने (D) युधिष्ठिर ने

    उत्तर: (B) इन्द्र ने

  9. समय बीतने (कालपर्यय) से किसका क्षय होता है?

    (A) शिक्षा का (B) विद्या का (C) धन का (D) पुस्तक का

    उत्तर: (A) शिक्षा का

  10. ‘कर्णभारं नाटकम्’ किसकी रचना है?

    (A) भास की (B) कालिदास की (C) रामस्वरूप शुक्ल की (D) राजेश कुमार की

    उत्तर: (A) भास की

  11. कर्ण किस देश के राजा थे?

    (A) अंग (B) मगध (C) मिथिला (D) काशी

    उत्तर: (A) अंग

  12. कर्ण किसके पुत्र थे?

    (A) कुंती के (B) कौशल्या के (C) केकैयी के (D) शकुन्तला के

    उत्तर: (A) कुंती के

  13. ब्राह्मण के वेश में कर्ण के पास कौन आए?

    (A) इन्द्र (B) विष्णु (C) शिव (D) नारद

    उत्तर: (A) इन्द्र

  14. कर्ण के कवच-कुण्डल की क्या विशेषता थी?

    (A) वे बड़े थे (B) उन्हें भेदा नहीं जा सकता था (C) वे सोने के थे (D) वे अति लघु थे

    उत्तर: (B) उन्हें भेदा नहीं जा सकता था (अभेद्य)

  15. कवच-कुण्डल देने के अतिरिक्त कर्ण ने अंततः क्या देने की इच्छा प्रकट की?

    (A) स्वर्ण (B) कनक (C) पृथ्वी (D) अपना सिर

    उत्तर: (D) अपना सिर

  16. “न दातव्यम्, न दातव्यम्” यह किसने कहा?

    (A) कर्ण ने (B) शक्र (इन्द्र) ने (C) शल्य ने (D) कृष्ण ने

    उत्तर: (C) शल्य ने

  17. महत्तर भिक्षा (बड़ा दान) कौन माँगते हैं?

    (A) कर्ण (B) द्रोण (C) भीम (D) शक्र (इन्द्र)

    उत्तर: (D) शक्र (इन्द्र)

  18. अर्जुन किस पक्ष से युद्ध लड़ते हैं?

    (A) कौरव (B) पांडव (C) राम (D) हनुमान

    उत्तर: (B) पांडव

लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)

  1. प्रश्न: ‘कर्णस्य दानवीरता’ पाठ के रचयिता कौन हैं और यह किस नाटक से लिया गया है?

    उत्तर: इस पाठ के रचयिता भास हैं और यह उनके द्वारा रचित ‘कर्णभारम्’ नाटक से लिया गया है, जो महाभारत की कथा पर आधारित है।

  2. प्रश्न: इन्द्र ने ब्राह्मण के वेश में आकर कर्ण से क्या माँगा?

    उत्तर: इन्द्र ने ब्राह्मण के वेश में आकर कर्ण से उनके जन्मजात, अभेद्य कवच और कुण्डल की याचना की।

  3. प्रश्न: शल्य ने कर्ण को क्या सलाह दी और क्यों?

    उत्तर: शल्य ने कर्ण को कहा — “न दातव्यम्, न दातव्यम्” अर्थात कवच-कुण्डल मत दो, क्योंकि ये कर्ण की सुरक्षा के लिए अनिवार्य थे।

  4. प्रश्न: कर्ण की दानवीरता से प्रसन्न होकर इन्द्र ने क्या आशीर्वाद दिया?

    उत्तर: इन्द्र ने कहा कि कर्ण का यश सूर्य, चंद्र, हिमालय और सागर के समान सदैव स्थिर रहेगा।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)

  1. प्रश्न: ‘कर्णस्य दानवीरता’ पाठ के आधार पर कर्ण के दानशील चरित्र का वर्णन कीजिए।

    उत्तर: कर्ण सूर्य और कुंती के पुत्र तथा अंग देश के राजा थे। महाभारत युद्ध में वे कौरव पक्ष से युद्ध करते हैं। वे अपनी असीम दानशीलता के लिए प्रसिद्ध थे — उन्होंने सर्वप्रथम आभूषणयुक्त एक हज़ार गायें दान कीं। जब देवराज इन्द्र ब्राह्मण का वेश धारण कर उनसे उनके अभेद्य कवच-कुण्डल माँगते हैं, तो सारथी शल्य के मना करने पर भी कर्ण अपने वचन और स्वभाव के प्रति निष्ठा रखते हुए वह दान कर देते हैं और अंत में अपना सिर तक अर्पित करने की इच्छा प्रकट करते हैं। इस प्रकार कर्ण का चरित्र त्याग, उदारता और वचनबद्धता का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है।

  2. प्रश्न: इस पाठ से मिलने वाली नैतिक शिक्षा स्पष्ट कीजिए।

    उत्तर: यह पाठ हमें यह शिक्षा देता है कि सच्चा दान वही है जो अपने प्राणों के मोह से ऊपर उठकर, वचन के प्रति निष्ठा रखते हुए दिया जाए। कर्ण ने अपनी सुरक्षा के साधन कवच-कुण्डल तक का त्याग कर दिया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि उदारता और त्याग मनुष्य को अमर यश प्रदान करते हैं। कथा यह भी बताती है कि समय के साथ शिक्षा और अन्य वस्तुएँ क्षीण हो सकती हैं, परंतु सच्चे त्याग से अर्जित कीर्ति सदैव अक्षुण्ण रहती है।

महत्वपूर्ण परीक्षा प्रश्न (Important Exam Questions)

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

  1. प्रश्न: ‘कर्णस्य दानवीरता’ पाठ किस नाटक से संकलित है?

    उत्तर: यह पाठ भास द्वारा रचित ‘कर्णभारम्’ नाटक से संकलित है, जो महाभारत पर आधारित है।

  2. प्रश्न: कर्ण के माता-पिता कौन थे?

    उत्तर: कर्ण सूर्य और कुंती के पुत्र थे।

  3. प्रश्न: इस पाठ से हमें क्या शिक्षा मिलती है?

    उत्तर: इस पाठ से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सच्चा दान और त्याग वचनबद्धता तथा उदारता से किया जाना चाहिए, जिससे मनुष्य को शाश्वत यश प्राप्त होता है।

निष्कर्ष (Conclusion)

“कर्णस्य दानवीरता” पाठ भास की नाट्य-प्रतिभा और महाभारत के महान पात्र कर्ण के त्यागमय चरित्र का उत्कृष्ट चित्रण प्रस्तुत करता है। कर्ण द्वारा अपने अभेद्य कवच-कुण्डल तक का दान करना उनकी असाधारण उदारता और वचनबद्धता का प्रमाण है। यह पाठ छात्रों में त्याग, ईमानदारी और उदारता जैसे मूल्यों के प्रति सजगता विकसित करने में सहायक है।

नोट: संदर्भ स्रोत में एक आंतरिक विरोधाभास पाया गया — “पाठ किस स्रोत से संकलित है” के उत्तर में एक स्थान पर ‘महाभारतात्’ (सीधे महाभारत से) दिया गया है, जबकि अन्य स्थानों पर (हिन्दी खंड तथा संस्कृत खंड की पुनरावृत्ति में) ‘कर्णभारम्’ नाटक से संकलित होने की पुष्टि हुई है, और यह भी स्पष्ट है कि ‘कर्णभारं नाटकम्’ भास की रचना है। चूँकि बहुसंख्य एवं सुसंगत तथ्य यह दर्शाते हैं कि यह पाठ भास रचित ‘कर्णभारम्’ नाटक से लिया गया है (जो स्वयं महाभारत की कथा पर आधारित है), अतः इसी को इस लेख में मानक उत्तर के रूप में लिया गया है। यह लेख केवल शैक्षणिक उद्देश्य से BSEB कक्षा 10 संस्कृत पाठ्यक्रम के आधार पर तैयार किया गया है।

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