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Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 12 कार्बनिक रसायन : कुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 12 कार्बनिक रसायन : कुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें कक्षा 11 रसायन विज्ञान का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। इसमें कार्बनिक यौगिकों की मूल अवधारणाओं, कार्बन की संकरण अवस्था, संरचनात्मक निरूपण, IUPAC नामकरण, समावयवता, कार्बनिक अभिक्रियाओं के मूल सिद्धान्त, इलेक्ट्रॉनिक प्रभाव तथा कार्बनिक यौगिकों के शोधन और विश्लेषण की विधियों का अध्ययन किया जाता है।

इस अध्याय में नाभिकस्नेही और इलेक्ट्रॉनस्नेही, समांश तथा विषमांश बंध-विच्छेदन, कार्बधनायन, कार्बऋणायन एवं मुक्त-मूलक, प्रेरणिक प्रभाव, इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव, अनुनाद, क्रिस्टलन, आसवन, क्रोमैटोग्रैफी, लासेग्ने परीक्षण तथा नाइट्रोजन, सल्फर, हैलोजन और फॉस्फोरस के आकलन जैसे महत्वपूर्ण विषय शामिल हैं।

अगर आपने पिछला अध्याय नहीं पढ़ा है, तो पहले Chapter 11 – p-ब्लॉक तत्त्व पढ़ सकते हैं।

Table of Contents

कार्बनिक रसायन क्या है?

कार्बनिक रसायन रसायन विज्ञान की वह शाखा है जिसमें मुख्य रूप से कार्बन युक्त यौगिकों की संरचना, गुण, नामकरण, अभिक्रियाओं और निर्माण का अध्ययन किया जाता है। कार्बन की अपने ही परमाणुओं के साथ मजबूत बंध बनाने की क्षमता के कारण कार्बनिक यौगिकों की संख्या बहुत अधिक है।

कार्बन की चतुसंयोजकता

कार्बन की संयोजकता चार होती है। इसका कारण इसके संयोजकता कोश में चार इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति है। कार्बन इन इलेक्ट्रॉनों को साझा करके चार सहसंयोजक बंध बना सकता है।

कार्बन की चतुसंयोजकता के कारण वह विभिन्न तत्वों के साथ स्थायी यौगिक बनाने के साथ-साथ कार्बन-कार्बन बंध द्वारा लंबी श्रृंखलाएँ और वलय भी बना सकता है।

कार्बन की संकरण अवस्था

कार्बनिक यौगिकों में कार्बन की ज्यामिति उसके संकरण पर निर्भर करती है। मुख्य रूप से sp3, sp2 और sp संकरण महत्वपूर्ण हैं।

संकरणसामान्य आकृतिबंध कोणउदाहरण
sp3समचतुष्फलकीय109°28′CH4
sp2त्रिकोणीय समतलीयलगभग 120°C2H4
spरैखिक180°C2H2

कार्बनिक यौगिकों के संरचनात्मक निरूपण

कार्बनिक यौगिकों को अलग-अलग तरीकों से प्रदर्शित किया जा सकता है। इनमें आणविक सूत्र, संरचनात्मक सूत्र, संघनित सूत्र तथा आबन्ध-रेखा सूत्र महत्वपूर्ण हैं।

संघनित सूत्र

इसमें समान समूहों को एक साथ लिखकर अणु की संरचना को संक्षिप्त रूप में दिखाया जाता है। उदाहरण के लिए प्रोपेन का संघनित सूत्र CH3CH2CH3 है।

आबन्ध-रेखा सूत्र

आबन्ध-रेखा सूत्र में कार्बन और उससे जुड़े हाइड्रोजन को सामान्यतः रेखाओं और शीर्षों द्वारा दर्शाया जाता है। यह बड़े कार्बनिक अणुओं की संरचना को सरल ढंग से प्रदर्शित करने में उपयोगी होता है।

कार्बनिक यौगिकों का वर्गीकरण

कार्बनिक यौगिकों को उनकी संरचना और क्रियात्मक समूह के आधार पर अलग-अलग वर्गों में बाँटा जाता है। मुख्य रूप से शृंखलाबद्ध, चक्रीय और सुगंधित यौगिकों का अध्ययन किया जाता है।

खुली श्रृंखला वाले यौगिक

जिन कार्बनिक यौगिकों में कार्बन परमाणु खुली श्रृंखला बनाते हैं, उन्हें ऐलिफैटिक या खुली श्रृंखला वाले यौगिक कहा जाता है। ये सीधी या शाखित श्रृंखला वाले हो सकते हैं।

चक्रीय यौगिक

जिन यौगिकों में कार्बन परमाणु या कार्बन तथा अन्य परमाणु मिलकर वलय बनाते हैं, वे चक्रीय यौगिक कहलाते हैं।

सुगंधित यौगिक

बेंजीन जैसे विशेष वलय-युक्त यौगिकों को सुगंधित यौगिक कहा जाता है। इनमें इलेक्ट्रॉनों का विशेष प्रकार का विस्थानीकरण पाया जाता है।

क्रियात्मक समूह

कार्बनिक अणु में उपस्थित वह परमाणु या परमाणुओं का समूह जो उस यौगिक के विशिष्ट रासायनिक गुणों के लिए उत्तरदायी होता है, क्रियात्मक समूह कहलाता है।

क्रियात्मक समूहयौगिक का वर्गउदाहरण
–OHऐल्कोहॉलCH3OH
–CHOऐल्डिहाइडCH3CHO
>C=OकीटोनCH3COCH3
–COOHकार्बोक्सिलिक अम्लCH3COOH
–NH2अमीनCH3NH2
–Xऐल्किल हैलाइडCH3Cl

IUPAC नामकरण

कार्बनिक यौगिकों को व्यवस्थित और सार्वभौमिक नाम देने के लिए IUPAC नामकरण पद्धति का उपयोग किया जाता है। सही नामकरण के लिए मुख्य कार्बन श्रृंखला का चयन, क्रमांकन, प्रतिस्थापियों की पहचान और उचित प्रत्यय का प्रयोग आवश्यक होता है।

IUPAC नामकरण के प्रमुख चरण

  1. सबसे लंबी उपयुक्त कार्बन श्रृंखला का चयन करें।
  2. मुख्य क्रियात्मक समूह को प्राथमिकता के अनुसार पहचानें।
  3. श्रृंखला का सही दिशा में क्रमांकन करें।
  4. प्रतिस्थापियों की स्थिति निर्धारित करें।
  5. प्रतिस्थापियों के नाम लिखें।
  6. उचित मूल नाम और प्रत्यय जोड़कर पूरा IUPAC नाम बनाएं।

उदाहरण

CH3CH2CH3 का IUPAC नाम प्रोपेन है।

CH3CH2OH का IUPAC नाम एथेनॉल है।

CH3COCH3 का IUPAC नाम प्रोपेनोन है।

समावयवता

जब दो या दो से अधिक यौगिकों का आणविक सूत्र समान हो लेकिन उनके परमाणुओं की व्यवस्था या स्थानिक विन्यास अलग हो, तो ऐसे यौगिकों को समावयवी कहा जाता है और इस घटना को समावयवता कहते हैं।

संरचनात्मक समावयवता

जब समान आणविक सूत्र वाले यौगिकों में परमाणुओं की संयोजकता या जुड़ने का तरीका अलग होता है, तो संरचनात्मक समावयवता कहलाती है।

स्थान समावयवता

जब मुख्य श्रृंखला समान रहती है लेकिन क्रियात्मक समूह या प्रतिस्थापी की स्थिति अलग होती है, तो स्थान समावयवता दिखाई देती है।

ज्यामितीय समावयवता

द्विबंध या चक्रीय संरचना के कारण समूहों की स्थानिक व्यवस्था अलग होने पर ज्यामितीय समावयवता हो सकती है। इसे सामान्यतः cis-trans प्रकार के रूपों से समझाया जाता है।

सजातीय श्रेणी

ऐसे कार्बनिक यौगिकों की श्रेणी जिनमें समान क्रियात्मक समूह होता है और क्रमिक सदस्यों में –CH2– का अंतर होता है, सजातीय श्रेणी कहलाती है। इसके सदस्यों के रासायनिक गुणों में समानता तथा भौतिक गुणों में क्रमिक परिवर्तन पाया जाता है।

कार्बनिक अभिक्रियाओं की मूल अवधारणा

कार्बनिक अभिक्रियाओं में पुराने बंध टूटते हैं और नए बंध बनते हैं। इन प्रक्रियाओं को समझने के लिए इलेक्ट्रॉन युग्म के स्थानांतरण तथा अभिक्रिया में भाग लेने वाली प्रजातियों की प्रकृति का अध्ययन किया जाता है।

नाभिकस्नेही और इलेक्ट्रॉनस्नेही

नाभिकस्नेही

वह प्रजाति जो इलेक्ट्रॉन युग्म प्रदान करती है, नाभिकस्नेही (Nucleophile) कहलाती है। इसे Nu: द्वारा दर्शाया जा सकता है।

उदाहरण: OH−, CN− तथा अन्य इलेक्ट्रॉन-समृद्ध प्रजातियाँ।

इलेक्ट्रॉनस्नेही

वह प्रजाति जो इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करती है, इलेक्ट्रॉनस्नेही (Electrophile) कहलाती है। इसे E+ द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है।

कार्बधनायन इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रकृति का उदाहरण है क्योंकि उसके कार्बन परमाणु पर इलेक्ट्रॉन की कमी होती है।

नाभिकस्नेही और इलेक्ट्रॉनस्नेही में अंतर

नाभिकस्नेहीइलेक्ट्रॉनस्नेही
इलेक्ट्रॉन युग्म प्रदान करता है।इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करता है।
इलेक्ट्रॉन-समृद्ध होता है।इलेक्ट्रॉन-न्यून होता है।
उदाहरण: OH−, CN−उदाहरण: कार्बधनायन

कार्बनिक अभिक्रियाओं के प्रमुख प्रकार

1. नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया

इस प्रकार की अभिक्रिया में नाभिकस्नेही किसी इलेक्ट्रॉन-न्यून केंद्र पर आक्रमण करता है और किसी समूह का प्रतिस्थापन कर देता है।

2. इलेक्ट्रॉनस्नेही संकलन अभिक्रिया

असंतृप्त यौगिकों में इलेक्ट्रॉनस्नेही अभिकर्मक का योग होने पर संकलन अभिक्रिया हो सकती है।

3. विलोपन अभिक्रिया

विलोपन अभिक्रिया में अणु से कुछ परमाणु या समूह निकल जाते हैं और प्रायः नया बहु-बंध बनता है।

समांश और विषमांश बंध-विच्छेदन

समांश बंध-विच्छेदन

जब सहसंयोजक बंध के दोनों इलेक्ट्रॉन बंधित परमाणुओं में एक-एक बाँट दिए जाते हैं, तो इसे समांश या होमोलाइटिक बंध-विच्छेदन कहते हैं। इससे मुक्त-मूलक बन सकते हैं।

विषमांश बंध-विच्छेदन

जब बंध के दोनों इलेक्ट्रॉन एक ही परमाणु को प्राप्त होते हैं, तो इसे विषमांश या हेटेरोलाइटिक बंध-विच्छेदन कहते हैं। इससे कार्बधनायन या कार्बऋणायन जैसे आयनिक मध्यवर्ती बन सकते हैं।

कार्बधनायन और कार्बऋणायन

कार्बधनायन

ऐसी कार्बनिक प्रजाति जिसमें कार्बन परमाणु पर धनात्मक आवेश होता है, कार्बधनायन कहलाती है। यह इलेक्ट्रॉन-न्यून होती है और इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण कर सकती है।

कार्बऋणायन

जिस कार्बनिक प्रजाति में कार्बन परमाणु पर ऋणात्मक आवेश होता है, उसे कार्बऋणायन कहा जाता है। इसमें इलेक्ट्रॉन घनत्व अधिक होता है और यह नाभिकस्नेही की तरह व्यवहार कर सकती है।

मुक्त-मूलक

ऐसी प्रजाति जिसमें एक या अधिक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं, मुक्त-मूलक कहलाती है। समांश बंध-विच्छेदन के दौरान मुक्त-मूलक बन सकते हैं।

इलेक्ट्रॉनिक प्रभाव

कार्बनिक अणु में इलेक्ट्रॉनों के वितरण में होने वाले परिवर्तन उसके स्थायित्व और अभिक्रियाशीलता को प्रभावित करते हैं। इस प्रकार के प्रभावों को इलेक्ट्रॉनिक प्रभाव कहा जाता है। इस अध्याय में प्रेरणिक प्रभाव, इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव तथा अनुनाद जैसे प्रभावों का अध्ययन किया जाता है।

प्रेरणिक प्रभाव

विद्युत-ऋणात्मकता के अंतर के कारण किसी सहसंयोजक बंध में इलेक्ट्रॉन घनत्व का विस्थापन होता है। यह प्रभाव σ-बंधों के माध्यम से आगे प्रसारित होता है और दूरी बढ़ने पर कमजोर होता जाता है। इसे प्रेरणिक प्रभाव कहते हैं।

ऋणात्मक प्रेरणिक प्रभाव (−I)

जो समूह इलेक्ट्रॉन घनत्व को अपनी ओर आकर्षित करते हैं, वे −I प्रभाव प्रदर्शित करते हैं। हैलोजन, –NO2, –CN तथा –COOH जैसे समूह इलेक्ट्रॉन-आकर्षी प्रभाव प्रदर्शित कर सकते हैं।

धनात्मक प्रेरणिक प्रभाव (+I)

ऐल्किल समूह जैसे –CH3 और –C2H5 इलेक्ट्रॉन दाता समूह की तरह व्यवहार कर सकते हैं और +I प्रभाव प्रदर्शित करते हैं।

इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव

बहु-बंध वाले कार्बनिक यौगिकों में किसी आक्रमणकारी अभिकर्मक की उपस्थिति में π-इलेक्ट्रॉन युग्म का पूर्ण विस्थापन होने को इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव कहा जाता है। यह अस्थायी प्रभाव है और आक्रमणकारी अभिकर्मक हटने पर समाप्त हो जाता है।

धनात्मक इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव (+E)

इसमें बहु-बंध के π-इलेक्ट्रॉनों का विस्थापन उस परमाणु की ओर होता है जिससे आक्रमणकारी अभिकर्मक जुड़ता है।

ऋणात्मक इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव (−E)

इसमें π-इलेक्ट्रॉनों का विस्थापन उस परमाणु की ओर होता है जिससे आक्रमणकारी अभिकर्मक सीधे नहीं जुड़ता।

अनुनाद

जब किसी अणु या आयन की वास्तविक संरचना को एक ही लुईस संरचना से ठीक प्रकार प्रदर्शित नहीं किया जा सकता और उसे दो या अधिक योगदान देने वाली संरचनाओं द्वारा व्यक्त किया जाता है, तो इसे अनुनाद की अवधारणा से समझाया जाता है।

अनुनादी संरचनाओं में परमाणुओं की स्थिति समान रहती है, लेकिन इलेक्ट्रॉनों के वितरण में अंतर होता है। वास्तविक अणु इन संरचनाओं का अनुनाद संकर होता है।

हाइपरसंयुग्मन

कुछ कार्बनिक अणुओं में σ-बंध के इलेक्ट्रॉनों का निकटवर्ती इलेक्ट्रॉन-न्यून या π-तंत्र के साथ विस्थानीकरण अणु की स्थिरता को प्रभावित कर सकता है। इस प्रकार के इलेक्ट्रॉन विस्थापन को हाइपरसंयुग्मन की अवधारणा से समझाया जाता है।

कार्बनिक यौगिकों का शोधन

कार्बनिक यौगिकों में उपस्थित अशुद्धियों को हटाकर शुद्ध पदार्थ प्राप्त करने के लिए विभिन्न शोधन विधियों का उपयोग किया जाता है। इस अध्याय में क्रिस्टलन, आसवन, भाप आसवन, निम्न दाब पर आसवन और क्रोमैटोग्रैफी जैसी विधियाँ महत्वपूर्ण हैं।

क्रिस्टलन

क्रिस्टलन ठोस कार्बनिक पदार्थों के शोधन की महत्वपूर्ण विधि है। यह यौगिक तथा अशुद्धियों की किसी उपयुक्त विलायक में अलग-अलग विलेयता पर आधारित होती है। पदार्थ को गर्म विलायक में घोलकर विलयन को ठंडा करने पर शुद्ध पदार्थ क्रिस्टल के रूप में अलग किया जा सकता है।

रंगीन अशुद्धियों को हटाने के लिए सक्रियित काष्ठ कोयले का उपयोग किया जा सकता है। आवश्यकता होने पर बार-बार क्रिस्टलन द्वारा अधिक शुद्ध पदार्थ प्राप्त किया जा सकता है।

आसवन

आसवन का उपयोग वाष्पशील द्रवों को अवाष्पशील अशुद्धियों से अलग करने तथा पर्याप्त अलग क्वथनांक वाले द्रवों को पृथक करने में किया जाता है। कम क्वथनांक वाला घटक पहले वाष्पित होता है और संघनित करके अलग एकत्र किया जाता है।

निम्न दाब पर आसवन

कुछ कार्बनिक पदार्थ अपने सामान्य क्वथनांक पर या उससे पहले अपघटित हो सकते हैं। ऐसे पदार्थों के शोधन के लिए निम्न दाब पर आसवन उपयोगी होता है। दाब कम करने से पदार्थ का क्वथनांक कम हो जाता है।

भाप आसवन

भाप आसवन उन पदार्थों के शोधन में उपयोगी है जो भाप के साथ वाष्पशील हों और जल के साथ अमिश्रणीय हों। इस विधि में पदार्थ सामान्य क्वथनांक से कम तापमान पर भी आसुत हो सकता है।

क्रोमैटोग्रैफी

क्रोमैटोग्रैफी मिश्रण के विभिन्न घटकों को अलग करने, पदार्थों का शोधन करने और उनकी शुद्धता की जाँच करने की महत्वपूर्ण तकनीक है। इसमें स्थिर प्रावस्था और गतिशील प्रावस्था के बीच घटकों के अलग-अलग वितरण या अधिशोषण के आधार पर पृथक्करण होता है।

अधिशोषण क्रोमैटोग्रैफी

इसमें विभिन्न पदार्थ किसी अधिशोषक पर अलग-अलग मात्रा में अधिशोषित होते हैं। ऐलुमिना और सिलिका जेल जैसे पदार्थ अधिशोषक के रूप में उपयोग किए जा सकते हैं।

वितरण क्रोमैटोग्रैफी

यह स्थिर तथा गतिशील प्रावस्थाओं के बीच पदार्थों के विभेदी वितरण पर आधारित होती है। पेपर क्रोमैटोग्रैफी इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है।

पेपर क्रोमैटोग्रैफी

पेपर क्रोमैटोग्रैफी में विशेष प्रकार के क्रोमैटोग्राफी पेपर का उपयोग किया जाता है। पेपर पर मिश्रण का नमूना लगाया जाता है और उपयुक्त विलायक को पेपर में ऊपर की ओर चलने दिया जाता है। विभिन्न घटक अलग-अलग दूरी तक पहुँचते हैं और इस प्रकार मिश्रण के घटक अलग हो जाते हैं।

विकसित पट्टी को क्रोमैटोग्राम कहा जाता है। घटकों की पहचान उपयुक्त अभिकर्मक या पराबैंगनी प्रकाश की सहायता से की जा सकती है।

लासेग्ने परीक्षण

कार्बनिक यौगिकों में नाइट्रोजन, सल्फर, हैलोजन और फॉस्फोरस जैसे तत्वों की पहचान के लिए लासेग्ने परीक्षण का उपयोग किया जाता है। कार्बनिक यौगिक को सोडियम के साथ संगलित करने पर सहसंयोजक रूप में उपस्थित तत्वों को आयनिक सोडियम लवणों में परिवर्तित किया जाता है।

सोडियम संगलन से प्राप्त पदार्थ को जल के साथ उपचारित करने पर प्राप्त विलयन को सोडियम संगलन निष्कर्ष (Sodium Fusion Extract) कहा जाता है।

नाइट्रोजन का आकलन – ड्यूमा विधि

ड्यूमा विधि में नाइट्रोजनयुक्त कार्बनिक यौगिक को क्यूप्रिक ऑक्साइड के साथ गर्म किया जाता है। यौगिक के तत्व विभिन्न ऑक्साइडों में परिवर्तित होते हैं और नाइट्रोजन अंततः N2 के रूप में प्राप्त की जाती है। गैसीय मिश्रण से अन्य गैसों को हटाने के बाद नाइट्रोजन का आयतन ज्ञात किया जाता है।

यदि m ग्राम कार्बनिक यौगिक से N.T.P. पर x mL N2 प्राप्त होती है, तो:

N की प्रतिशतता = (28 × x × 100) / (22400 × m)

कैल्डाल विधि

कैल्डाल विधि में नाइट्रोजनयुक्त कार्बनिक यौगिक को सान्द्र H2SO4 और उपयुक्त उत्प्रेरक की उपस्थिति में गर्म किया जाता है। इसमें उपस्थित नाइट्रोजन अमोनियम सल्फेट में परिवर्तित हो जाती है। इसके बाद क्षार की सहायता से अमोनिया मुक्त किया जाता है और मानक अम्ल द्वारा उसका आकलन किया जाता है।

अमोनिया की मात्रा से कार्बनिक यौगिक में नाइट्रोजन की प्रतिशतता निर्धारित की जाती है।

हैलोजन का आकलन – कैरियस विधि

कैरियस विधि में कार्बनिक यौगिक में उपस्थित क्लोरीन, ब्रोमीन या आयोडीन को उपयुक्त ऑक्सीकरण प्रक्रिया के बाद सिल्वर हैलाइड में परिवर्तित किया जाता है। प्राप्त सिल्वर हैलाइड को अलग करके तौला जाता है और उसके भार से संबंधित हैलोजन की प्रतिशतता निकाली जाती है।

उदाहरण के लिए यदि AgCl प्राप्त होता है, तो:

Cl की प्रतिशतता = (35.5 × AgCl का भार × 100) / (143.5 × कार्बनिक यौगिक का भार)

सल्फर का आकलन

सल्फरयुक्त कार्बनिक यौगिक को उपयुक्त ऑक्सीकरण प्रक्रिया से उपचारित करने पर सल्फर सल्फ्यूरिक अम्ल में परिवर्तित हो जाता है। इसके बाद BaCl2 मिलाने पर BaSO4 का अवक्षेप प्राप्त होता है। इसके भार से सल्फर की मात्रा ज्ञात की जाती है।

S की प्रतिशतता = (32 × BaSO4 का भार × 100) / (233 × कार्बनिक यौगिक का भार)

फॉस्फोरस का आकलन

फॉस्फोरसयुक्त कार्बनिक यौगिक को ऑक्सीकरण करने पर फॉस्फोरस फॉस्फोरिक अम्ल में परिवर्तित किया जा सकता है। इसके बाद उपयुक्त अभिकर्मकों की सहायता से अवक्षेप बनाकर फॉस्फोरस की मात्रा का निर्धारण किया जाता है।

सोडियम संगलन निष्कर्ष में नाइट्रिक अम्ल क्यों मिलाया जाता है?

हैलोजन के परीक्षण में सिल्वर नाइट्रेट से पहले नाइट्रिक अम्ल का प्रयोग इसलिए किया जाता है ताकि सोडियम सायनाइड और सोडियम सल्फाइड जैसी प्रजातियाँ हट जाएँ। यदि इन्हें नहीं हटाया जाए तो AgCN या Ag2S के अवक्षेप बनकर हैलोजन के परीक्षण में बाधा उत्पन्न कर सकते हैं।

नाइट्रोजन, सल्फर और फॉस्फोरस के लिए सोडियम संगलन क्यों?

कार्बनिक यौगिक में ये तत्व सामान्यतः सहसंयोजक रूप में उपस्थित होते हैं। सोडियम के साथ संगलन करने पर ये अधिक आसानी से परीक्षण योग्य आयनिक सोडियम लवणों में बदल जाते हैं। इससे गुणात्मक परीक्षण करना सरल हो जाता है।

कैल्शियम सल्फेट और कपूर को कैसे अलग करेंगे?

कैल्शियम सल्फेट और कपूर के मिश्रण को अलग करने के लिए ऊर्ध्वपातन विधि उपयुक्त है। कपूर ऊर्ध्वपातित हो सकता है, जबकि कैल्शियम सल्फेट सामान्य परिस्थितियों में ऊर्ध्वपातित नहीं होता।

CCl4 AgNO3 के साथ AgCl का अवक्षेप क्यों नहीं देता?

CCl4 एक अध्रुवीय सहसंयोजक यौगिक है और जलीय विलयन में मुक्त Cl− आयन उपलब्ध नहीं कराता। इसलिए AgNO3 के साथ AgCl का श्वेत अवक्षेप नहीं बनता।

CO2 को KOH द्वारा क्यों अवशोषित किया जाता है?

KOH एक प्रबल क्षार है और CO2 को अवशोषित करके कार्बोनेट या संबंधित उत्पाद बना सकता है। इसलिए कार्बनिक यौगिक के दहन से उत्पन्न CO2 के आकलन में KOH का उपयोग किया जाता है।

महत्वपूर्ण संख्यात्मक प्रश्न

कार्बन और हाइड्रोजन के दहन से CO2 तथा H2O की मात्रा

किसी कार्बनिक यौगिक में कार्बन और हाइड्रोजन की प्रतिशतता दी हो तो पूर्ण दहन से बनने वाली CO2 और H2O की मात्रा निकाली जा सकती है।

CO2 का द्रव्यमान:

CO2 का द्रव्यमान = (कार्बन का प्रतिशत × यौगिक का द्रव्यमान × 44) / (12 × 100)

H2O का द्रव्यमान:

H2O का द्रव्यमान = (हाइड्रोजन का प्रतिशत × यौगिक का द्रव्यमान × 18) / (2 × 100)

अध्याय 12 के महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर

प्रश्न 1. कार्बन की चतुसंयोजकता क्या है?

उत्तर: कार्बन की संयोजकता चार होती है। यह चार सहसंयोजक बंध बनाकर अनेक स्थायी कार्बनिक यौगिकों का निर्माण कर सकता है।

प्रश्न 2. क्रियात्मक समूह क्या है?

उत्तर: कार्बनिक यौगिक में उपस्थित वह परमाणु या परमाणुओं का समूह जो उसके विशिष्ट रासायनिक गुणों के लिए उत्तरदायी होता है, क्रियात्मक समूह कहलाता है।

प्रश्न 3. नाभिकस्नेही क्या है?

उत्तर: इलेक्ट्रॉन युग्म प्रदान करने वाली प्रजाति नाभिकस्नेही कहलाती है। OH− और CN− इसके उदाहरण हैं।

प्रश्न 4. इलेक्ट्रॉनस्नेही क्या है?

उत्तर: इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करने वाली प्रजाति इलेक्ट्रॉनस्नेही कहलाती है। इलेक्ट्रॉन-न्यून कार्बधनायन इसका उदाहरण है।

प्रश्न 5. प्रेरणिक प्रभाव क्या है?

उत्तर: σ-बंधों में विद्युत-ऋणात्मकता के अंतर के कारण इलेक्ट्रॉन घनत्व के विस्थापन को प्रेरणिक प्रभाव कहते हैं। यह प्रभाव बंधों की श्रृंखला में आगे बढ़ता है और दूरी बढ़ने पर कमजोर होता जाता है।

प्रश्न 6. इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव क्या है?

उत्तर: किसी आक्रमणकारी अभिकर्मक की उपस्थिति में बहु-बंध के π-इलेक्ट्रॉन युग्म का पूर्ण विस्थापन इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव कहलाता है। यह अस्थायी प्रभाव है।

प्रश्न 7. क्रिस्टलन किस सिद्धांत पर आधारित है?

उत्तर: क्रिस्टलन यौगिक और अशुद्धियों की किसी उपयुक्त विलायक में अलग-अलग विलेयता पर आधारित है। गर्म करने पर यौगिक अधिक घुलता है और ठंडा करने पर शुद्ध क्रिस्टल के रूप में अलग हो सकता है।

प्रश्न 8. आसवन का उपयोग कब किया जाता है?

उत्तर: आसवन का उपयोग वाष्पशील द्रवों को अवाष्पशील अशुद्धियों से तथा पर्याप्त अलग क्वथनांक वाले द्रवों को अलग करने में किया जाता है।

प्रश्न 9. क्रोमैटोग्रैफी का क्या उपयोग है?

उत्तर: क्रोमैटोग्रैफी का उपयोग मिश्रण के घटकों को अलग करने, कार्बनिक पदार्थों के शोधन और पदार्थ की शुद्धता की जाँच के लिए किया जाता है।

प्रश्न 10. लासेग्ने परीक्षण का उपयोग किसके लिए होता है?

उत्तर: कार्बनिक यौगिकों में नाइट्रोजन, सल्फर, हैलोजन और फॉस्फोरस जैसे तत्वों की पहचान के लिए लासेग्ने परीक्षण का उपयोग किया जाता है।

प्रश्न 11. ड्यूमा विधि किसके आकलन के लिए है?

उत्तर: ड्यूमा विधि का उपयोग कार्बनिक यौगिक में नाइट्रोजन के मात्रात्मक आकलन के लिए किया जाता है।

प्रश्न 12. कैल्डाल विधि किसके आकलन में उपयोगी है?

उत्तर: कैल्डाल विधि का उपयोग कार्बनिक यौगिकों में नाइट्रोजन के मात्रात्मक निर्धारण के लिए किया जाता है।

प्रश्न 13. कार्बधनायन क्या है?

उत्तर: जिस कार्बनिक आयन में कार्बन परमाणु पर धनात्मक आवेश होता है, उसे कार्बधनायन कहते हैं। यह इलेक्ट्रॉन-न्यून होता है।

प्रश्न 14. कार्बऋणायन क्या है?

उत्तर: जिस कार्बनिक आयन में कार्बन परमाणु पर ऋणात्मक आवेश होता है, उसे कार्बऋणायन कहते हैं। यह इलेक्ट्रॉन-समृद्ध होता है।

प्रश्न 15. समांश बंध-विच्छेदन क्या है?

उत्तर: जब सहसंयोजक बंध टूटने पर बंध के दोनों इलेक्ट्रॉन एक-एक करके दोनों परमाणुओं को मिलते हैं, तो इसे समांश बंध-विच्छेदन कहते हैं। इससे मुक्त-मूलक बनते हैं।

प्रश्न 16. विषमांश बंध-विच्छेदन क्या है?

उत्तर: जब सहसंयोजक बंध के दोनों इलेक्ट्रॉन एक ही परमाणु को प्राप्त होते हैं, तो इसे विषमांश बंध-विच्छेदन कहते हैं। इससे आयनिक मध्यवर्ती बन सकते हैं।

अध्याय 12 के महत्वपूर्ण सूत्र

विषयसूत्र
नाइट्रोजन – ड्यूमा विधिN% = (28 × x × 100) / (22400 × m)
क्लोरीन – कैरियस विधिCl% = (35.5 × AgCl का भार × 100) / (143.5 × यौगिक का भार)
सल्फर का आकलनS% = (32 × BaSO4 का भार × 100) / (233 × यौगिक का भार)
CO2 का द्रव्यमान(C% × यौगिक का भार × 44) / (12 × 100)
H2O का द्रव्यमान(H% × यौगिक का भार × 18) / (2 × 100)

अध्याय 12 के महत्वपूर्ण MCQ

  1. कार्बन की संयोजकता कितनी होती है?

    (A) 1   (B) 2   (C) 3   (D) 4

    उत्तर: (D) 4

  2. sp3 संकरण में आकृति कैसी होती है?

    (A) रैखिक   (B) त्रिकोणीय समतलीय   (C) समचतुष्फलकीय   (D) कोणीय

    उत्तर: (C) समचतुष्फलकीय

  3. sp2 संकरण का बंध कोण लगभग कितना होता है?

    (A) 90°   (B) 109°28′   (C) 120°   (D) 180°

    उत्तर: (C) 120°

  4. इलेक्ट्रॉन युग्म प्रदान करने वाली प्रजाति कहलाती है—

    (A) इलेक्ट्रॉनस्नेही   (B) नाभिकस्नेही   (C) मुक्त-मूलक   (D) अम्ल

    उत्तर: (B) नाभिकस्नेही

  5. इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करने वाली प्रजाति है—

    (A) नाभिकस्नेही   (B) इलेक्ट्रॉनस्नेही   (C) कार्बऋणायन   (D) OH−

    उत्तर: (B) इलेक्ट्रॉनस्नेही

  6. OH− किसका उदाहरण है?

    (A) इलेक्ट्रॉनस्नेही   (B) नाभिकस्नेही   (C) मुक्त-मूलक   (D) कार्बधनायन

    उत्तर: (B) नाभिकस्नेही

  7. लासेग्ने परीक्षण में किस धातु का उपयोग किया जाता है?

    (A) पोटैशियम   (B) सोडियम   (C) कैल्शियम   (D) मैग्नीशियम

    उत्तर: (B) सोडियम

  8. ड्यूमा विधि द्वारा मुख्यतः किस तत्व का आकलन किया जाता है?

    (A) ऑक्सीजन   (B) नाइट्रोजन   (C) क्लोरीन   (D) सल्फर

    उत्तर: (B) नाइट्रोजन

  9. पेपर क्रोमैटोग्रैफी किस प्रकार की क्रोमैटोग्रैफी का उदाहरण है?

    (A) वितरण   (B) केवल गैस   (C) केवल आयन-विनिमय   (D) कोई नहीं

    उत्तर: (A) वितरण

  10. कपूर और CaSO4 के मिश्रण को अलग करने के लिए कौन-सी विधि उपयुक्त है?

    (A) आसवन   (B) क्रिस्टलन   (C) ऊर्ध्वपातन   (D) निस्यंदन

    उत्तर: (C) ऊर्ध्वपातन

अध्याय 12 में याद रखने योग्य महत्वपूर्ण बातें

  • कार्बन की संयोजकता चार होती है।
  • sp3, sp2 और sp संकरण कार्बनिक रसायन में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
  • क्रियात्मक समूह कार्बनिक यौगिकों के विशिष्ट रासायनिक गुणों को निर्धारित करता है।
  • IUPAC नामकरण द्वारा कार्बनिक यौगिकों को व्यवस्थित नाम दिया जाता है।
  • समान आणविक सूत्र लेकिन अलग संरचना वाले यौगिक समावयवी हो सकते हैं।
  • नाभिकस्नेही इलेक्ट्रॉन युग्म देता है।
  • इलेक्ट्रॉनस्नेही इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करता है।
  • समांश बंध-विच्छेदन से मुक्त-मूलक बन सकते हैं।
  • विषमांश बंध-विच्छेदन से कार्बधनायन और कार्बऋणायन जैसे मध्यवर्ती बन सकते हैं।
  • प्रेरणिक प्रभाव σ-बंधों के माध्यम से प्रसारित होता है।
  • इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव बहु-बंध वाले यौगिकों में अस्थायी प्रभाव है।
  • क्रिस्टलन ठोस पदार्थों के शोधन की महत्वपूर्ण विधि है।
  • आसवन क्वथनांक के अंतर पर आधारित पृथक्करण विधि है।
  • क्रोमैटोग्रैफी मिश्रण के घटकों के पृथक्करण और शुद्धता जाँच में उपयोगी है।
  • लासेग्ने परीक्षण द्वारा N, S, हैलोजन और P की पहचान की जा सकती है।
  • ड्यूमा और कैल्डाल विधियाँ नाइट्रोजन के आकलन से संबंधित हैं।
  • कैरियस विधि से हैलोजन का मात्रात्मक आकलन किया जा सकता है।

अध्याय 12 का सारांश

कार्बनिक रसायन : कुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें अध्याय में कार्बनिक यौगिकों की संरचना और नामकरण से लेकर उनकी अभिक्रियाशीलता तथा शोधन और विश्लेषण तक की मूल अवधारणाओं का अध्ययन किया जाता है। कार्बन की चतुसंयोजकता और विभिन्न प्रकार के संकरण कार्बनिक अणुओं की संरचना को समझने का आधार हैं।

IUPAC नामकरण, क्रियात्मक समूह, सजातीय श्रेणी और समावयवता कार्बनिक यौगिकों की पहचान के लिए महत्वपूर्ण हैं। अभिक्रिया तंत्र को समझने के लिए नाभिकस्नेही, इलेक्ट्रॉनस्नेही, कार्बधनायन, कार्बऋणायन और मुक्त-मूलक की अवधारणाएँ आवश्यक हैं।

प्रेरणिक प्रभाव, इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव और अनुनाद कार्बनिक यौगिकों की स्थिरता और अभिक्रियाशीलता को समझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा क्रिस्टलन, आसवन और क्रोमैटोग्रैफी जैसी विधियाँ कार्बनिक पदार्थों के शोधन में उपयोगी हैं।

कार्बनिक यौगिकों में उपस्थित तत्वों की पहचान और मात्रा ज्ञात करने के लिए लासेग्ने परीक्षण, ड्यूमा विधि, कैल्डाल विधि और कैरियस विधि जैसे परीक्षणों का अध्ययन किया जाता है।

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निष्कर्ष

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 12 कार्बनिक रसायन : कुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें परीक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण अध्याय है। इसमें IUPAC नामकरण, संकरण, समावयवता, क्रियात्मक समूह, इलेक्ट्रॉनिक प्रभाव, नाभिकस्नेही और इलेक्ट्रॉनस्नेही, कार्बनिक अभिक्रियाओं के प्रकार तथा शोधन और गुणात्मक एवं मात्रात्मक विश्लेषण की विधियों को अच्छी तरह समझना आवश्यक है। विद्यार्थियों को विशेष रूप से IUPAC नामकरण, अभिक्रिया के प्रकार, इलेक्ट्रॉनिक प्रभाव और प्रतिशतता आधारित संख्यात्मक प्रश्नों का नियमित अभ्यास करना चाहिए।

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