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Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 2 पृथ्वी की उत्पत्ति एवं विकास

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 2 – पृथ्वी की उत्पत्ति एवं विकास में विद्यार्थियों को ब्रह्मांड, आकाशगंगाओं, तारों, सौरमंडल और पृथ्वी की उत्पत्ति तथा उसके क्रमिक विकास के बारे में जानकारी मिलती है। इस अध्याय में बिग बैंग सिद्धांत, नीहारिका परिकल्पना, ग्रहों की उत्पत्ति, पृथ्वी की प्रारंभिक अवस्था, वायुमंडल एवं महासागरों के विकास और पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति जैसे महत्वपूर्ण विषयों का अध्ययन किया जाता है।

इस पोस्ट में Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 2 के महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर, वस्तुनिष्ठ प्रश्न, लघु उत्तरीय प्रश्न, दीर्घ उत्तरीय प्रश्न, अतिरिक्त महत्वपूर्ण प्रश्न और परीक्षा उपयोगी बिंदुओं को सरल भाषा में समझाया गया है।

Table of Contents

पृथ्वी की उत्पत्ति एवं विकास – अध्याय का परिचय

पृथ्वी आज जिस स्वरूप में दिखाई देती है, वह हमेशा से ऐसी नहीं थी। पृथ्वी और सौरमंडल के निर्माण की प्रक्रिया बहुत लंबे समय में पूरी हुई। वैज्ञानिकों ने ब्रह्मांड तथा पृथ्वी की उत्पत्ति को समझाने के लिए अलग-अलग सिद्धांत और परिकल्पनाएँ प्रस्तुत की हैं।

इस अध्याय में ब्रह्मांड की उत्पत्ति से लेकर तारों और सौरमंडल के निर्माण तथा पृथ्वी पर जीवन के विकास तक की प्रमुख घटनाओं का अध्ययन किया जाता है।

ब्रह्मांड की उत्पत्ति

ब्रह्मांड में असंख्य आकाशगंगाएँ, तारे, ग्रह, उपग्रह, गैस, धूलकण और अन्य खगोलीय पिंड पाए जाते हैं। ब्रह्मांड की उत्पत्ति के संबंध में कई विचार प्रस्तुत किए गए, लेकिन आधुनिक अध्ययन में बिग बैंग सिद्धांत सबसे प्रमुख वैज्ञानिक मॉडल माना जाता है।

बिग बैंग सिद्धांत

बिग बैंग सिद्धांत के अनुसार ब्रह्मांड की शुरुआत अत्यंत सघन और अत्यधिक गर्म अवस्था से हुई। इसके बाद ब्रह्मांड का तीव्र विस्तार शुरू हुआ और समय के साथ पदार्थ तथा ऊर्जा से विभिन्न खगोलीय संरचनाओं का विकास हुआ।

बिग बैंग सिद्धांत की प्रमुख अवस्थाएँ

  1. प्रारंभिक अवस्था में ब्रह्मांड अत्यधिक सघन और गर्म अवस्था में था।
  2. इसके बाद तीव्र विस्तार की प्रक्रिया शुरू हुई।
  3. विस्तार और ठंडा होने के साथ कणों तथा बाद में परमाणुओं का निर्माण हुआ।
  4. समय के साथ गैस के विशाल बादलों से आकाशगंगाओं और तारों के निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई।
  5. आकाशगंगाओं के भीतर तारों तथा उनके आसपास ग्रहों के निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

ब्रह्मांड के विस्तार का अर्थ यह है कि बड़े पैमाने पर आकाशगंगाओं के बीच की दूरियाँ बढ़ रही हैं। अध्याय के source material में हॉयल द्वारा प्रस्तुत स्थिर अवस्था संकल्पना (Steady State Concept) का भी उल्लेख मिलता है।

आकाशगंगा और तारों का निर्माण

आकाशगंगा असंख्य तारों, गैस और धूलकणों का विशाल समूह होती है। हमारी आकाशगंगा को मिल्की वे (आकाशगंगा) कहा जाता है। प्रारंभिक ब्रह्मांड में पदार्थ का वितरण पूरी तरह समान नहीं था। घनत्व में अंतर के कारण गुरुत्वाकर्षण प्रभावों में अंतर आया और पदार्थ का एकत्रण शुरू हुआ।

हाइड्रोजन गैस के विशाल बादलों के संकुचन और घनीभवन से तारों के निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई। इन गैसीय बादलों को सामान्य रूप से नीहारिका (Nebula) कहा जाता है।

नीहारिका क्या है?

गैस और धूलकणों से बना विशाल अंतरिक्षीय बादल, जिसमें तारों के निर्माण की प्रक्रिया हो सकती है, नीहारिका कहलाता है।

तारों के निर्माण की प्रक्रिया

प्रारंभिक ब्रह्मांड में पदार्थ के घनत्व में अंतर के कारण कुछ क्षेत्रों में पदार्थ अधिक मात्रा में एकत्र होने लगा। गुरुत्वाकर्षण के कारण गैस के ये बादल लगातार संकुचित होते गए। संकुचन के साथ उनका घनत्व और तापमान बढ़ता गया। घने और गर्म केंद्र से आदि तारा (Protostar) विकसित हो सकता है। आगे चलकर तारकीय विकास की प्रक्रिया में तारा अपने स्थायी स्वरूप में पहुँचता है।

सौरमंडल का विकास

सौरमंडल में सूर्य, ग्रह, उनके उपग्रह तथा अनेक छोटे खगोलीय पिंड शामिल हैं। पृथ्वी और अन्य ग्रहों की उत्पत्ति सूर्य के निर्माण से जुड़ी हुई मानी जाती है। सौरमंडल के विकास को समझाने के लिए विभिन्न परिकल्पनाएँ प्रस्तुत की गई हैं।

अध्याय में विशेष रूप से नीहारिका परिकल्पना और बाद में इसके संशोधित रूपों का उल्लेख मिलता है।

नीहारिका परिकल्पना

नीहारिका परिकल्पना का प्रारंभिक रूप जर्मन दार्शनिक इमैनुएल कांट ने 1755 में प्रस्तुत किया था। बाद में फ्रांसीसी गणितज्ञ लाप्लास ने 1796 में इससे मिलती-जुलती परिकल्पना प्रस्तुत की।

कांट-लाप्लास की नीहारिका परिकल्पना की मुख्य बातें

  • प्रारंभिक अवस्था में गैस और पदार्थ का एक विशाल बादल मौजूद था।
  • यह पदार्थ गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में संकुचित होने लगा।
  • संकुचन के साथ इसके घूर्णन की गति बढ़ी।
  • घूर्णन करते पदार्थ से छल्ले अलग होने की परिकल्पना की गई।
  • इन छल्लों के संघनन से ग्रहों के निर्माण की कल्पना की गई।
  • केंद्रीय भाग से सूर्य के निर्माण की व्याख्या की गई।

नीहारिका परिकल्पना की आलोचना

इस परिकल्पना ने ग्रहों की उत्पत्ति को समझाने का प्रारंभिक वैज्ञानिक प्रयास किया, लेकिन इसके कुछ पक्षों पर वैज्ञानिकों ने प्रश्न उठाए। विशेष रूप से गतिहीन प्रारंभिक पदार्थ में गति उत्पन्न होने की समस्या इसकी प्रमुख आलोचनाओं में शामिल थी।

चैम्बरलेन और मोल्टन की द्वैतारक परिकल्पना

चैम्बरलेन और मोल्टन ने ग्रहों की उत्पत्ति को समझाने के लिए द्वैतारक परिकल्पना प्रस्तुत की। इस विचार के अनुसार सूर्य के पास से एक अन्य तारा गुजरा और उसके गुरुत्वाकर्षण प्रभाव के कारण सूर्य से पदार्थ बाहर निकला। यह पदार्थ बाद में छोटे पिंडों में बदलकर ग्रहों के निर्माण में सहायक हुआ।

इस प्रकार कांट-लाप्लास की नीहारिका परिकल्पना और चैम्बरलेन-मोल्टन की परिकल्पना में ग्रहों के निर्माण की प्रक्रिया को समझाने का आधार अलग-अलग था।

पार्थिव और बाहरी ग्रह

सूर्य के निकट स्थित चार ग्रह—बुध, शुक्र, पृथ्वी और मंगल—पार्थिव या आंतरिक ग्रह कहलाते हैं। ये अपेक्षाकृत छोटे और चट्टानी ग्रह हैं।

सूर्य से अधिक दूर स्थित ग्रहों को बाहरी ग्रह कहा जाता है। आधुनिक सौरमंडल में बृहस्पति, शनि, अरुण और वरुण बाहरी विशाल ग्रह हैं।

आंतरिक/पार्थिव ग्रहबाहरी ग्रह
बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगलबृहस्पति, शनि, अरुण, वरुण
मुख्यतः चट्टानी एवं धात्विकविशाल गैसीय/बर्फीले ग्रह
आकार अपेक्षाकृत छोटाआकार अपेक्षाकृत बड़ा

पार्थिव ग्रह चट्टानी क्यों हैं?

पार्थिव ग्रह सूर्य के अपेक्षाकृत निकट बने। वहाँ तापमान अधिक होने के कारण हल्की गैसों का संघनन कठिन था। इन ग्रहों का आकार भी बाहरी ग्रहों की तुलना में छोटा है। इसलिए इनके गुरुत्वाकर्षण द्वारा हल्की गैसों को लंबे समय तक रोककर रखना कठिन रहा। परिणामस्वरूप ये मुख्य रूप से चट्टानों और धातुओं से बने ग्रह बने।

पृथ्वी की प्रारंभिक अवस्था

पृथ्वी के निर्माण के शुरुआती समय में उसका तापमान बहुत अधिक था। पदार्थ के लगातार एकत्र होने और गुरुत्वीय संकुचन के कारण ऊष्मा उत्पन्न हुई। परिणामस्वरूप पृथ्वी का पदार्थ लंबे समय तक गर्म और आंशिक रूप से द्रव अवस्था में रहा।

समय के साथ पृथ्वी ठंडी होने लगी और उसके पदार्थ अलग-अलग घनत्व के आधार पर व्यवस्थित होने लगे। इस प्रक्रिया ने पृथ्वी की आंतरिक परतों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

विभेदन प्रक्रिया क्या है?

पृथ्वी के निर्माण के दौरान जब उसका पदार्थ अत्यधिक गर्म और आंशिक रूप से द्रव अवस्था में था, तब अलग-अलग घनत्व वाले पदार्थ अलग होने लगे। भारी पदार्थ, जैसे लोहा, पृथ्वी के केंद्र की ओर चला गया, जबकि अपेक्षाकृत हल्के पदार्थ ऊपरी भाग की ओर चले गए।

भारी और हल्के पदार्थों के घनत्व के आधार पर अलग होने की इस प्रक्रिया को विभेदन (Differentiation) कहा जाता है। इसी प्रक्रिया के कारण पृथ्वी की विभिन्न आंतरिक परतों के निर्माण में सहायता मिली।

पृथ्वी की आंतरिक परतों का निर्माण

विभेदन के परिणामस्वरूप पृथ्वी के पदार्थ अलग-अलग परतों में व्यवस्थित हुए। सामान्य रूप से पृथ्वी की प्रमुख आंतरिक परतें हैं:

  • भूपर्पटी (Crust)
  • प्रवार (Mantle)
  • बाह्य क्रोड (Outer Core)
  • आंतरिक क्रोड (Inner Core)

इन परतों की संरचना, घनत्व और भौतिक अवस्था एक-दूसरे से अलग होती है।

चंद्रमा की उत्पत्ति

चंद्रमा पृथ्वी का प्राकृतिक उपग्रह है। इसकी उत्पत्ति को लेकर कई विचार प्रस्तुत किए गए हैं। अध्याय में जॉर्ज डार्विन के विचार तथा बाद में प्रस्तावित विशाल संघट्ट (Giant Impact) या The Big Splat परिकल्पना का उल्लेख मिलता है।

विशाल संघट्ट परिकल्पना

इस परिकल्पना के अनुसार पृथ्वी के प्रारंभिक इतिहास में एक बड़े पिंड का पृथ्वी से संघट्ट हुआ। इस भीषण टक्कर के कारण पृथ्वी से पदार्थ अंतरिक्ष में निकला और पृथ्वी की कक्षा के आसपास एकत्र होकर चंद्रमा के निर्माण में सहायक हुआ।

पृथ्वी के वायुमंडल का विकास

पृथ्वी के प्रारंभिक वायुमंडल और वर्तमान वायुमंडल में काफी अंतर था। पृथ्वी के ठंडा होने और उसके अंदरूनी भाग से गैसों के बाहर निकलने के कारण वायुमंडल के विकास की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

गैस उत्सर्जन (Degassing)

पृथ्वी के अंदर से गैसों और जलवाष्प का बाहर निकलना गैस उत्सर्जन कहलाता है। पृथ्वी के प्रारंभिक वायुमंडल के निर्माण में इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

वायुमंडल के विकास की प्रमुख अवस्थाएँ

  1. प्रारंभिक वायुमंडलीय गैसों में समय के साथ परिवर्तन हुआ।
  2. पृथ्वी के अंदर से निकली जलवाष्प और अन्य गैसों ने वायुमंडल को विकसित किया।
  3. जीवन के विकास के बाद प्रकाश संश्लेषण जैसी जैविक प्रक्रियाओं ने वायुमंडल की संरचना को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

महासागरों की उत्पत्ति

पृथ्वी के ठंडा होने के साथ वायुमंडल में मौजूद जलवाष्प संघनित होने लगी। लंबे समय तक हुई वर्षा का जल पृथ्वी की सतह के निचले भागों में एकत्रित होता गया। इस प्रकार धीरे-धीरे महासागरों के निर्माण की प्रक्रिया हुई।

पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति

पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति भूगोल और विज्ञान के सबसे महत्वपूर्ण विषयों में से एक है। अध्याय के अनुसार प्रारंभिक पृथ्वी पर रासायनिक प्रक्रियाओं के माध्यम से जटिल कार्बनिक अणुओं के बनने और उनके क्रमिक संगठन से जीवन के विकास की संभावना समझाई जाती है।

जीवन के प्रारंभिक रूपों के प्रमाण प्राचीन चट्टानों में पाए गए जीवाश्मों और सूक्ष्म संरचनाओं से जुड़े हैं। अध्याय में जीवन के विकास को भूवैज्ञानिक कालक्रम के संदर्भ में समझाया गया है।

पृथ्वी पर जीवन के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ

पृथ्वी को जीवन के लिए अनुकूल ग्रह बनाने में कई परिस्थितियों की भूमिका है। इनमें तरल जल की उपलब्धता, उपयुक्त तापमान, वायुमंडल और विभिन्न रासायनिक तत्वों की उपलब्धता महत्वपूर्ण हैं।

समय के साथ पृथ्वी के भौतिक और रासायनिक वातावरण में परिवर्तन हुए और जैविक प्रक्रियाओं ने भी पृथ्वी के वातावरण को प्रभावित किया।

प्रकाश वर्ष क्या है?

प्रकाश वर्ष दूरी की इकाई है, समय की नहीं। एक प्रकाश वर्ष वह दूरी है जिसे प्रकाश निर्वात में एक वर्ष में तय करता है। प्रकाश की गति लगभग 3 लाख किलोमीटर प्रति सेकंड मानी जाती है।

एक प्रकाश वर्ष लगभग 9.46 × 1012 किलोमीटर के बराबर होता है। खगोलीय पिंडों के बीच अत्यधिक बड़ी दूरियों को व्यक्त करने के लिए प्रकाश वर्ष का उपयोग किया जाता है।

आदि तारा (Protostar)

जब गैस और धूल से बने किसी घने बादल का गुरुत्वाकर्षण के कारण संकुचन होता है और उसका केंद्रीय भाग अधिक घना तथा गर्म होता जाता है, तो बनने वाले प्रारंभिक तारकीय पिंड को आदि तारा या Protostar कहा जाता है।

ग्रहाणु (Planetesimals)

ग्रहों के निर्माण से संबंधित कुछ परिकल्पनाओं में छोटे ठोस या पदार्थीय पिंडों को ग्रहाणु कहा गया है। इनके आपसी संघटन और अभिवृद्धि से बड़े पिंडों तथा ग्रहों के निर्माण की प्रक्रिया को समझाया जाता है।

अभिवृद्धि (Accretion)

छोटे-छोटे पदार्थीय कणों और पिंडों का गुरुत्वाकर्षण के कारण एक-दूसरे से जुड़कर बड़े पिंड का निर्माण करना अभिवृद्धि कहलाता है। ग्रहों के निर्माण की प्रक्रिया को समझाने में यह अवधारणा महत्वपूर्ण है।

सौरमंडल से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य

  • सूर्य सौरमंडल का केंद्रीय तारा है।
  • पृथ्वी सूर्य से तीसरा ग्रह है।
  • बुध, शुक्र, पृथ्वी और मंगल आंतरिक/पार्थिव ग्रह हैं।
  • बृहस्पति, शनि, अरुण और वरुण बाहरी विशाल ग्रह हैं।
  • पृथ्वी का एक प्राकृतिक उपग्रह चंद्रमा है।
  • सौरमंडल की उत्पत्ति को समझाने के लिए विभिन्न परिकल्पनाएँ प्रस्तुत की गई हैं।

अति लघु उत्तरीय महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर

प्रश्न 1. सूर्य-केंद्रित सौरमंडल से क्या अभिप्राय है?

उत्तर: जिस सौरमंडल में सूर्य को केंद्र मानकर ग्रह उसके चारों ओर परिक्रमा करते हैं, उसे सूर्य-केंद्रित सौरमंडल कहा जाता है।

प्रश्न 2. भू-केंद्रित परिकल्पना क्या है?

उत्तर: भू-केंद्रित परिकल्पना में पृथ्वी को ब्रह्मांड का केंद्र माना गया और सूर्य तथा अन्य खगोलीय पिंडों की गति को पृथ्वी के संदर्भ में समझाया गया।

प्रश्न 3. पृथ्वी पर जीवन के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधनों में से एक क्या है?

उत्तर: जल जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

प्रश्न 4. The Big Splat से क्या अभिप्राय है?

उत्तर: पृथ्वी के प्रारंभिक इतिहास में किसी बड़े पिंड के पृथ्वी से हुए भीषण संघट्ट की परिकल्पना को The Big Splat कहा जाता है।

प्रश्न 5. आंतरिक ग्रह कौन-से हैं?

उत्तर: बुध, शुक्र, पृथ्वी और मंगल आंतरिक या पार्थिव ग्रह हैं।

प्रश्न 6. बाहरी ग्रह कौन-से हैं?

उत्तर: बृहस्पति, शनि, अरुण और वरुण बाहरी विशाल ग्रह हैं।

प्रश्न 7. नीहारिका किसे कहते हैं?

उत्तर: गैस और धूलकणों से बने विशाल अंतरिक्षीय बादल को नीहारिका कहा जाता है।

प्रश्न 8. ग्रहाणु क्या हैं?

उत्तर: ग्रह निर्माण से संबंधित छोटे पदार्थीय पिंडों को ग्रहाणु कहा जाता है। इनके एकत्रीकरण से बड़े पिंडों के निर्माण की प्रक्रिया समझाई जाती है।

प्रश्न 9. नीहारिका परिकल्पना सबसे पहले किसने प्रस्तुत की?

उत्तर: जर्मन दार्शनिक इमैनुएल कांट ने 1755 में नीहारिका परिकल्पना का प्रारंभिक रूप प्रस्तुत किया।

प्रश्न 10. आदि तारा क्या है?

उत्तर: गैस और धूल के घने बादल के गुरुत्वीय संकुचन से बनने वाले प्रारंभिक गर्म तारकीय पिंड को आदि तारा या Protostar कहा जाता है।

प्रश्न 11. विभेदन किसे कहते हैं?

उत्तर: पृथ्वी के निर्माण के दौरान भारी और हल्के पदार्थों के घनत्व के आधार पर अलग-अलग होने की प्रक्रिया को विभेदन कहते हैं।

प्रश्न 12. प्रकाश वर्ष क्या है?

उत्तर: प्रकाश वर्ष वह दूरी है जिसे प्रकाश एक वर्ष में तय करता है। यह दूरी की इकाई है।

प्रश्न 13. चंद्रमा की उत्पत्ति से संबंधित विशाल संघट्ट परिकल्पना क्या है?

उत्तर: इसके अनुसार पृथ्वी से किसी बड़े पिंड के संघट्ट के कारण निकला पदार्थ पृथ्वी की कक्षा में एकत्र होकर चंद्रमा के निर्माण में सहायक हुआ।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उत्तर

प्रश्न 1. पार्थिव ग्रह चट्टानी क्यों हैं?

उत्तर: पार्थिव ग्रह सूर्य के निकट बने, जहाँ तापमान अधिक था। इस कारण हल्की गैसों का संघनन कठिन था। इसके अलावा इन ग्रहों का आकार अपेक्षाकृत छोटा है, इसलिए इनका गुरुत्वाकर्षण हल्की गैसों को लंबे समय तक रोकने में पर्याप्त नहीं था। परिणामस्वरूप ये मुख्य रूप से चट्टानों और धातुओं से बने ग्रह हैं।

प्रश्न 2. कांट और लाप्लास की परिकल्पना तथा चैम्बरलेन और मोल्टन की परिकल्पना में मूलभूत अंतर बताइए।

उत्तर: कांट और लाप्लास ने ग्रहों के निर्माण को घूमते हुए गैस के विशाल बादल अर्थात नीहारिका के संकुचन और उससे पदार्थ के अलग होने से समझाया। इसके विपरीत चैम्बरलेन और मोल्टन ने सूर्य के पास से किसी दूसरे तारे के गुजरने तथा उसके गुरुत्वाकर्षण प्रभाव से सूर्य से पदार्थ निकलने और उससे ग्रहों के निर्माण की व्याख्या की।

प्रश्न 3. प्रारंभिक काल में पृथ्वी का स्वरूप कैसा था?

उत्तर: प्रारंभिक पृथ्वी अत्यधिक गर्म, चट्टानी और जीवन-विहीन ग्रह थी। उस समय पृथ्वी का पदार्थ गर्म अवस्था में था और उसका प्रारंभिक वायुमंडल वर्तमान वायुमंडल से काफी अलग था। समय के साथ पृथ्वी ठंडी हुई और उसकी संरचना तथा वातावरण में परिवर्तन आया।

प्रश्न 4. पृथ्वी के प्रारंभिक वायुमंडल की प्रमुख गैसें कौन-सी थीं?

उत्तर: पृथ्वी के प्रारंभिक वायुमंडल के विकास में जलवाष्प, नाइट्रोजन, कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और अमोनिया जैसी गैसों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। स्वतंत्र ऑक्सीजन की मात्रा प्रारंभिक अवस्था में बहुत कम थी।

प्रश्न 5. आंतरिक और बाहरी ग्रहों की तुलना कीजिए।

उत्तर: बुध, शुक्र, पृथ्वी और मंगल आंतरिक या पार्थिव ग्रह हैं। ये अपेक्षाकृत छोटे और चट्टानी हैं। बृहस्पति, शनि, अरुण और वरुण बाहरी ग्रह हैं। ये आकार में बड़े हैं और इनमें गैसीय या बर्फीले पदार्थों की प्रधानता है।

प्रश्न 6. ओटो श्मिट द्वारा संशोधित नीहारिका परिकल्पना क्या थी?

उत्तर: source material के अनुसार ओटो श्मिट ने नीहारिका परिकल्पना में संशोधन करते हुए गैस, धूलकण और कणों के आपसी टकराव तथा अभिवृद्धि की प्रक्रिया को ग्रहों के निर्माण से जोड़ा। इस विचार में छोटे कणों के एकत्रीकरण से बड़े पिंडों और फिर ग्रहों के निर्माण की व्याख्या की गई।

प्रश्न 7. तारों के निर्माण की प्रक्रिया समझाइए।

उत्तर: गैस और धूल से बने विशाल बादलों में घनत्व की असमानता के कारण कुछ क्षेत्रों में पदार्थ अधिक मात्रा में एकत्र होने लगा। गुरुत्वाकर्षण के कारण ये क्षेत्र संकुचित हुए और उनका घनत्व तथा तापमान बढ़ता गया। इस प्रक्रिया से घने तारकीय पिंड बने, जिन्हें आदि तारा कहा जाता है। आगे चलकर तारों का विकास हुआ।

चंद्रमा की उत्पत्ति संबंधी विचार

प्रश्न. चंद्रमा की उत्पत्ति संबंधी प्रमुख विचार बताइए।

उत्तर: चंद्रमा की उत्पत्ति को लेकर अलग-अलग विचार प्रस्तुत किए गए। जॉर्ज डार्विन ने प्रारंभिक पृथ्वी और चंद्रमा को एक ही घूमते हुए पिंड से उत्पन्न मानने का विचार दिया था। बाद में विशाल संघट्ट परिकल्पना सामने आई, जिसके अनुसार पृथ्वी के प्रारंभिक इतिहास में एक बड़े पिंड के संघट्ट से निकला पदार्थ पृथ्वी की कक्षा में एकत्र होकर चंद्रमा के निर्माण में सहायक हुआ।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उत्तर

प्रश्न 1. बिग बैंग सिद्धांत का विस्तार से वर्णन कीजिए।

उत्तर: बिग बैंग सिद्धांत ब्रह्मांड की उत्पत्ति और उसके विस्तार को समझाने वाला प्रमुख वैज्ञानिक मॉडल है। इसके अनुसार प्रारंभिक अवस्था में ब्रह्मांड अत्यधिक गर्म और सघन अवस्था में था। इसके बाद ब्रह्मांड का तीव्र विस्तार शुरू हुआ। विस्तार के साथ तापमान कम होता गया और पदार्थ के विभिन्न रूप विकसित होने लगे।

समय के साथ परमाणुओं का निर्माण हुआ। बाद में गुरुत्वाकर्षण के कारण पदार्थ के बड़े-बड़े समूह बनने लगे। इन्हीं से आकाशगंगाओं और तारों के निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ी। ब्रह्मांड के विस्तार के प्रमाणों ने इस सिद्धांत को व्यापक वैज्ञानिक समर्थन दिया है।

प्रश्न 2. पृथ्वी के विकास की विभिन्न अवस्थाओं का वर्णन कीजिए।

उत्तर: पृथ्वी का निर्माण छोटे पदार्थीय पिंडों के एकत्रीकरण और गुरुत्वीय संकुचन से हुआ। इस प्रक्रिया में ऊष्मा उत्पन्न हुई और पृथ्वी का पदार्थ अत्यधिक गर्म हो गया। बाद में पृथ्वी के ठंडा होने के साथ भारी और हल्के पदार्थों का विभेदन हुआ। भारी पदार्थ केंद्र की ओर और हल्के पदार्थ ऊपरी भाग की ओर चले गए।

इसके बाद पृथ्वी की आंतरिक परतों का विकास हुआ। पृथ्वी के अंदर से गैसों और जलवाष्प के बाहर निकलने से वायुमंडल विकसित हुआ। जलवाष्प के संघनन और वर्षा से महासागरों के निर्माण की प्रक्रिया हुई। बाद में जीवन के विकास तथा प्रकाश संश्लेषण जैसी जैविक प्रक्रियाओं ने वायुमंडल की संरचना को प्रभावित किया।

प्रश्न 3. पृथ्वी की उत्पत्ति से संबंधित किसी एक सिद्धांत का वर्णन कीजिए।

उत्तर: नीहारिका परिकल्पना पृथ्वी और ग्रहों की उत्पत्ति को समझाने वाली प्रारंभिक परिकल्पनाओं में से एक है। कांट ने 1755 में इसका प्रारंभिक रूप प्रस्तुत किया और लाप्लास ने 1796 में इससे संबंधित विचार प्रस्तुत किए।

इस परिकल्पना के अनुसार प्रारंभ में गैस और पदार्थ का एक विशाल घूमता हुआ बादल मौजूद था। गुरुत्वाकर्षण के कारण यह पदार्थ संकुचित होने लगा। संकुचन के साथ घूर्णन की गति बढ़ी और केंद्रीय पिंड से पदार्थ के छल्ले अलग होने की परिकल्पना की गई। इन छल्लों के संघनन से ग्रहों के निर्माण की व्याख्या की गई तथा केंद्रीय भाग से सूर्य के निर्माण को समझाया गया।

प्रश्न 4. सौरमंडल के विकास का वर्णन कीजिए।

उत्तर: सौरमंडल के विकास को समझाने के लिए नीहारिका और अन्य परिकल्पनाएँ प्रस्तुत की गई हैं। गैस और धूल से बने बादल के गुरुत्वीय संकुचन से केंद्रीय भाग अधिक घना और गर्म हुआ। इसी केंद्रीय भाग से सूर्य के निर्माण की प्रक्रिया हुई और शेष पदार्थ से ग्रहों तथा अन्य छोटे पिंडों के निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

ग्रहों के निर्माण में छोटे कणों और पिंडों के टकराव तथा अभिवृद्धि की प्रक्रिया महत्वपूर्ण रही। इस प्रकार लंबे समय में सौरमंडल की वर्तमान संरचना विकसित हुई।

प्रश्न 5. पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति कैसे हुई?

उत्तर: पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति को समझाने के लिए वैज्ञानिकों ने विभिन्न वैज्ञानिक विचार प्रस्तुत किए हैं। अध्याय के अनुसार प्रारंभिक पृथ्वी पर रासायनिक प्रक्रियाओं के माध्यम से जटिल कार्बनिक अणुओं के निर्माण और उनके क्रमिक संगठन से जीवन के प्रारंभिक रूप विकसित होने की संभावना मानी जाती है।

प्राचीन चट्टानों में पाए गए जीवाश्म और सूक्ष्म संरचनाएँ पृथ्वी पर प्रारंभिक जीवन के अध्ययन में महत्वपूर्ण प्रमाण प्रदान करते हैं। लंबे भूवैज्ञानिक काल के दौरान जीवन के सरल रूपों से जटिल जीवों तक विकास की प्रक्रिया हुई।

वर्तमान वायुमंडल के विकास की तीन अवस्थाएँ

  1. प्रारंभिक गैसों में परिवर्तन: पृथ्वी के प्रारंभिक वायुमंडल में मौजूद गैसों की संरचना समय के साथ बदली।
  2. गैस उत्सर्जन और जलवाष्प: पृथ्वी के आंतरिक भाग से गैसों और जलवाष्प के निकलने से वायुमंडल का विकास हुआ।
  3. जैविक परिवर्तन: जीवन के विकास के बाद प्रकाश संश्लेषण जैसी प्रक्रियाओं ने वायुमंडल की संरचना को बदलने में योगदान दिया।

महासागरों की उत्पत्ति कैसे हुई?

प्रारंभिक पृथ्वी के ठंडा होने के साथ वायुमंडल में मौजूद जलवाष्प संघनित हुई। इसके बाद वर्षा का जल पृथ्वी की सतह के निचले भागों में एकत्र होने लगा। लंबे समय तक जल के संचय से महासागरों के निर्माण की प्रक्रिया हुई।

परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण MCQ

  1. पृथ्वी की आयु लगभग कितनी मानी जाती है?
    उत्तर: लगभग 4600 मिलियन वर्ष
  2. सबसे लंबी भूवैज्ञानिक समय इकाई कौन-सी है?
    उत्तर: इओन (Eon)
  3. वर्तमान वायुमंडल के निर्माण एवं संशोधन में कौन-सी प्रक्रिया महत्वपूर्ण रही?
    उत्तर: प्रकाश संश्लेषण
  4. आंतरिक ग्रह कौन-से हैं?
    उत्तर: बुध, शुक्र, पृथ्वी और मंगल
  5. पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत लगभग कब मानी जाती है?
    उत्तर: लगभग 3.8 अरब वर्ष पहले
  6. नीहारिका परिकल्पना का प्रारंभिक रूप किसने प्रस्तुत किया?
    उत्तर: इमैनुएल कांट
  7. कांट ने नीहारिका परिकल्पना कब प्रस्तुत की?
    उत्तर: 1755
  8. लाप्लास ने संबंधित परिकल्पना कब प्रस्तुत की?
    उत्तर: 1796
  9. पृथ्वी की आंतरिक परतों के निर्माण में कौन-सी प्रक्रिया महत्वपूर्ण थी?
    उत्तर: विभेदन
  10. गैस और धूल के विशाल अंतरिक्षीय बादल को क्या कहते हैं?
    उत्तर: नीहारिका
  11. प्रारंभिक तारकीय पिंड को क्या कहते हैं?
    उत्तर: आदि तारा
  12. पृथ्वी का प्राकृतिक उपग्रह कौन है?
    उत्तर: चंद्रमा
  13. The Big Splat किससे संबंधित है?
    उत्तर: चंद्रमा की उत्पत्ति की विशाल संघट्ट परिकल्पना से
  14. प्रकाश वर्ष किसकी इकाई है?
    उत्तर: दूरी की
  15. पृथ्वी की वर्तमान वायुमंडलीय संरचना में ऑक्सीजन बढ़ने की महत्वपूर्ण प्रक्रिया कौन-सी है?
    उत्तर: प्रकाश संश्लेषण

अध्याय के 20 अति महत्वपूर्ण प्रश्न

  1. बिग बैंग सिद्धांत क्या है?
  2. बिग बैंग सिद्धांत की प्रमुख अवस्थाएँ बताइए।
  3. नीहारिका से क्या अभिप्राय है?
  4. नीहारिका परिकल्पना किसने प्रस्तुत की?
  5. कांट और लाप्लास के विचारों की व्याख्या कीजिए।
  6. चैम्बरलेन और मोल्टन की परिकल्पना क्या थी?
  7. पार्थिव ग्रहों को चट्टानी ग्रह क्यों कहा जाता है?
  8. आंतरिक और बाहरी ग्रहों में अंतर बताइए।
  9. विभेदन प्रक्रिया क्या है?
  10. पृथ्वी की प्रारंभिक अवस्था का वर्णन कीजिए।
  11. पृथ्वी की आंतरिक परतों का निर्माण कैसे हुआ?
  12. चंद्रमा की उत्पत्ति संबंधी विचारों का वर्णन कीजिए।
  13. The Big Splat से क्या अभिप्राय है?
  14. पृथ्वी के वायुमंडल का विकास कैसे हुआ?
  15. गैस उत्सर्जन क्या है?
  16. महासागरों की उत्पत्ति कैसे हुई?
  17. पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति कैसे हुई?
  18. तारों के निर्माण की प्रक्रिया समझाइए।
  19. आदि तारा क्या है?
  20. प्रकाश वर्ष से क्या अभिप्राय है?

अध्याय के महत्वपूर्ण शब्द

शब्दअर्थ
बिग बैंगब्रह्मांड के प्रारंभिक विस्तार से संबंधित सिद्धांत
नीहारिकागैस और धूल से बना विशाल अंतरिक्षीय बादल
आदि तारातारे के निर्माण की प्रारंभिक अवस्था का घना पिंड
विभेदनघनत्व के आधार पर भारी और हल्के पदार्थों का अलग होना
गैस उत्सर्जनपृथ्वी के आंतरिक भाग से गैसों का बाहर निकलना
अभिवृद्धिछोटे पदार्थीय पिंडों के एकत्र होकर बड़े पिंड बनाना
ग्रहाणुग्रह निर्माण से संबंधित छोटे पदार्थीय पिंड
प्रकाश वर्षप्रकाश द्वारा एक वर्ष में तय की गई दूरी

Chapter 2 का सारांश

पृथ्वी की उत्पत्ति एवं विकास का अध्ययन ब्रह्मांड और सौरमंडल की उत्पत्ति को समझने से शुरू होता है। बिग बैंग सिद्धांत ब्रह्मांड के प्रारंभिक विस्तार की व्याख्या करता है। गैस और धूल के विशाल बादलों से तारों तथा सौरमंडल के निर्माण की प्रक्रिया को विभिन्न परिकल्पनाओं के माध्यम से समझाया गया है।

नीहारिका परिकल्पना में कांट और लाप्लास के विचार महत्वपूर्ण हैं। पृथ्वी के निर्माण के बाद अत्यधिक तापमान, विभेदन और ठंडा होने की प्रक्रियाओं से इसकी आंतरिक संरचना विकसित हुई। पृथ्वी के अंदर से गैसों के उत्सर्जन, जलवाष्प के संघनन तथा जैविक प्रक्रियाओं ने वायुमंडल और महासागरों के विकास में योगदान दिया। अंततः पृथ्वी पर जीवन के प्रारंभिक रूप विकसित हुए और लंबे भूवैज्ञानिक काल में जीवन का विकास आगे बढ़ा।

अध्याय से जुड़े महत्वपूर्ण लिंक

Chapter 1 – भूगोल एक विषय के रूप में

Chapter 3 – पृथ्वी की आंतरिक संरचना

Bihar Board Class 11 Geography Solutions

निष्कर्ष

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 2 – पृथ्वी की उत्पत्ति एवं विकास भूगोल का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। इसमें ब्रह्मांड की उत्पत्ति, बिग बैंग सिद्धांत, नीहारिका परिकल्पना, सौरमंडल एवं ग्रहों का निर्माण, पृथ्वी की प्रारंभिक अवस्था, विभेदन, चंद्रमा की उत्पत्ति, वायुमंडल और महासागरों के विकास तथा पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति जैसे महत्वपूर्ण विषय शामिल हैं। परीक्षा की दृष्टि से विद्यार्थियों को विशेष रूप से बिग बैंग सिद्धांत, नीहारिका परिकल्पना, आंतरिक-बाहरी ग्रह, विभेदन प्रक्रिया और पृथ्वी के विकास की अवस्थाओं को अच्छी तरह तैयार करना चाहिए।

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