कक्षा 12 गृह विज्ञान अध्याय 3 – जनपोषण तथा स्वास्थ्य में जन पोषण, जन स्वास्थ्य, कुपोषण, भारत की प्रमुख पोषण संबंधी समस्याएँ, पोषण समस्याओं से निपटने की कार्यनीतियाँ, सरकारी पोषण कार्यक्रम, स्वास्थ्य देखभाल के विभिन्न स्तर तथा जन पोषण विशेषज्ञ के कार्यक्षेत्र का अध्ययन किया जाता है। यह अध्याय बोर्ड परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इस अध्याय में विशेष रूप से अल्पपोषण, अतिपोषण, सूक्ष्मपोषक तत्वों की कमी, प्रोटीन-ऊर्जा कुपोषण, लौह तत्व की कमी से अरक्तता, विटामिन A की कमी, आयोडीन हीनता विकार, पोषण कार्यक्रम और सार्वजनिक स्वास्थ्य पोषण जैसे विषयों को समझना आवश्यक है।
अध्याय 3 – जनपोषण तथा स्वास्थ्य
जन स्वास्थ्य क्या है?
जन स्वास्थ्य की संकल्पना का अर्थ है—सभी लोगों के स्वास्थ्य की रक्षा और उसे बढ़ावा देने के लिए समाज द्वारा किए गए सामूहिक प्रयास। इसका उद्देश्य केवल किसी एक व्यक्ति का उपचार करना नहीं, बल्कि पूरे समुदाय के स्वास्थ्य को बेहतर बनाना और रोगों की रोकथाम करना है।
जन पोषण क्या है?
जन पोषण पोषण विज्ञान का वह क्षेत्र है जिसमें बड़ी संख्या में लोगों या समुदायों की पोषण संबंधी समस्याओं की पहचान, रोकथाम और समाधान पर ध्यान दिया जाता है। इसमें सरकारी नीतियों, कार्यक्रमों, पोषण शिक्षा तथा विभिन्न सामुदायिक हस्तक्षेपों की सहायता ली जाती है।
जन पोषण का संबंध केवल भोजन से नहीं है। किसी समाज की पोषण स्थिति पर आर्थिक स्थिति, खाद्य उपलब्धता, स्वास्थ्य सेवाएँ, स्वच्छता, सुरक्षित पेयजल, शिक्षा, सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियाँ तथा सरकारी नीतियाँ भी प्रभाव डालती हैं।
जन स्वास्थ्य पोषण क्या है?
जन स्वास्थ्य पोषण अध्ययन का वह क्षेत्र है जो अच्छे स्वास्थ्य को बढ़ावा देने तथा पोषण संबंधी समस्याओं को दूर करने से संबंधित है। इसके लिए सरकारी नीतियों और कार्यक्रमों के माध्यम से समुदाय की पोषण संबंधी समस्याओं का समाधान किया जाता है।
जन स्वास्थ्य पोषण का स्वरूप बहुविषयक होता है। इसमें पोषण विज्ञान के साथ जीवन विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, व्यवहार विज्ञान और प्रबंधन से संबंधित ज्ञान का उपयोग किया जाता है।
जन स्वास्थ्य पोषण का लक्ष्य
जन स्वास्थ्य पोषण का प्रमुख लक्ष्य है—
- अल्पपोषण की रोकथाम करना।
- अतिपोषण की रोकथाम करना।
- लोगों के लिए अनुकूलतम पोषण स्तर बनाए रखना।
- पोषण संबंधी समस्याओं की पहचान और रोकथाम करना।
- समुदाय के स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता में सुधार करना।
कुपोषण क्या है?
कुपोषण का अर्थ है शरीर की आवश्यकता के अनुसार उचित मात्रा और संतुलन में पोषक तत्वों का प्राप्त न होना। इसमें पोषक तत्वों की कमी, अधिकता या असंतुलन जैसी स्थितियाँ शामिल हो सकती हैं।
कुपोषण के प्रमुख रूप
1. अल्पपोषण
जब व्यक्ति को शरीर की आवश्यकता के अनुसार पर्याप्त ऊर्जा और पोषक तत्व प्राप्त नहीं होते हैं, तो इसे अल्पपोषण कहा जाता है। इसका प्रभाव वृद्धि, विकास, कार्यक्षमता और स्वास्थ्य पर पड़ सकता है।
2. अतिपोषण
जब व्यक्ति शरीर की आवश्यकता से अधिक ऊर्जा और पोषक तत्वों का सेवन करता है तथा शारीरिक गतिविधि कम होती है, तो अतिपोषण की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इससे अधिक भार, मोटापा तथा विभिन्न असंक्रामक रोगों का खतरा बढ़ सकता है।
3. सूक्ष्मपोषक तत्वों की कमी
विटामिन और खनिज जैसे पोषक तत्वों की कमी को सूक्ष्मपोषक तत्वों की कमी कहा जाता है। इसे कई बार “छिपी भूख” भी कहा जाता है। लौह तत्व, विटामिन A, आयोडीन और जिंक महत्वपूर्ण सूक्ष्मपोषक तत्वों में शामिल हैं।
जन पोषण तथा स्वास्थ्य का महत्त्व
जन पोषण का महत्त्व इसलिए अधिक है क्योंकि किसी देश की जनसंख्या की पोषण स्थिति उसके स्वास्थ्य, उत्पादकता और सामाजिक-आर्थिक विकास को प्रभावित करती है। कुपोषण का प्रभाव केवल शरीर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि मानसिक और संज्ञानात्मक विकास तथा जीवन की गुणवत्ता पर भी पड़ सकता है।
भारत में पोषण की स्थिति से जुड़ी प्रमुख चिंताएँ
- कम जन्म-भार वाले शिशुओं की समस्या।
- बच्चों में अल्पपोषण।
- सूक्ष्मपोषक तत्वों की कमी।
- लौह तत्व की कमी से अरक्तता।
- विटामिन A की कमी।
- आयोडीन हीनता विकार।
- अतिभार और मोटापा।
- जीवनशैली से जुड़े असंक्रामक रोग।
कुपोषण का दोहरा भार
भारत में एक ओर अल्पपोषण की समस्या मौजूद है, वहीं दूसरी ओर अतिपोषण और मोटापे की समस्या भी बढ़ रही है। जब किसी देश या समाज में ये दोनों प्रकार की पोषण समस्याएँ एक साथ मौजूद हों, तो इसे कुपोषण का दोहरा भार कहा जाता है।
अधिक ऊर्जा वाले तथा अधिक वसा, चीनी और नमक वाले प्रसंस्कृत एवं तले खाद्य पदार्थों का बढ़ता सेवन तथा शारीरिक गतिविधियों में कमी अतिपोषण से जुड़ी समस्या को बढ़ा सकती है। दूसरी ओर, पर्याप्त और विविध पोषणयुक्त भोजन की उपलब्धता न होना अल्पपोषण को बढ़ावा दे सकता है।
इस प्रकार भारत के सामने एक साथ अल्पपोषण और अतिपोषण दोनों से निपटने की चुनौती है।
भारत में प्रमुख पोषण संबंधी समस्याएँ
1. प्रोटीन-ऊर्जा कुपोषण (PEM)
प्रोटीन-ऊर्जा कुपोषण तब होता है जब शरीर की आवश्यकता की तुलना में ऊर्जा और प्रोटीन का पर्याप्त सेवन नहीं होता है। बच्चों में इसकी संभावना अधिक होती है, हालांकि अधिक उम्र के व्यक्ति तथा कुछ रोगों से पीड़ित व्यक्ति भी इससे प्रभावित हो सकते हैं।
इसका आकलन शरीर के भार और ऊँचाई जैसे मानवमितिक मापों के आधार पर किया जा सकता है।
अल्पभार
जब किसी व्यक्ति का शरीर-भार उसकी आयु के अनुरूप अपेक्षित भार से कम होता है, तो उसे अल्पभारी कहा जाता है।
बौनापन
जब किसी व्यक्ति की ऊँचाई उसकी आयु के अनुरूप अपेक्षित ऊँचाई से कम होती है, तो इसे बौनापन कहा जाता है।
क्षयकारी
जब शरीर का भार उसकी ऊँचाई की तुलना में पर्याप्त नहीं होता, तो इस स्थिति को क्षयकारी कहा जाता है।
मरास्मस
ऊर्जा और भोजन की गंभीर कमी से होने वाला गंभीर अल्पपोषण मरास्मस कहलाता है।
क्वाशिओरकोर
मुख्य रूप से प्रोटीन की कमी से संबंधित गंभीर कुपोषण की स्थिति को क्वाशिओरकोर कहा जाता है।
2. सूक्ष्मपोषक तत्वों की कमी
जब भोजन में आवश्यक विटामिन और खनिज पर्याप्त मात्रा में नहीं मिलते हैं, तो सूक्ष्मपोषक तत्वों की कमी हो सकती है। इसे “छिपी भूख” के रूप में भी जाना जाता है।
जन स्वास्थ्य की दृष्टि से प्रमुख सूक्ष्मपोषक तत्वों की कमियों में निम्न शामिल हैं:
- लौह तत्व
- विटामिन A
- आयोडीन
- जिंक
- विटामिन B12
- फॉलिक अम्ल
- कैल्सियम
- विटामिन D
- राइबोफ्लेविन
3. लौह तत्व की कमी से अरक्तता (Iron Deficiency Anaemia – IDA)
लौह तत्व की कमी से अरक्तता तब होती है जब शरीर में हीमोग्लोबिन का निर्माण पर्याप्त मात्रा में नहीं हो पाता और रक्त में हीमोग्लोबिन का स्तर कम हो जाता है।
हीमोग्लोबिन शरीर के विभिन्न भागों तक ऑक्सीजन पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसकी कमी के कारण व्यक्ति को थोड़े शारीरिक परिश्रम पर भी साँस फूलना, थकावट और कमजोरी महसूस हो सकती है।
लौह-अल्पता से अरक्तता के प्रमुख लक्षण
- सामान्य पीलापन।
- आँखों की श्लेष्मा में पीलापन।
- जीभ और नाखूनों में पीलापन।
- थकान और कमजोरी।
- शारीरिक परिश्रम पर साँस फूलना।
- बच्चों में एकाग्रता और स्मरण शक्ति प्रभावित होना।
लौह-अल्पता से अधिक प्रभावित होने वाले समूह
- किशोरियाँ।
- गर्भवती महिलाएँ।
- कम आयु की गर्भधारण करने वाली महिलाएँ।
- विद्यालय जाने वाले बच्चे।
4. विटामिन A की कमी (Vitamin A Deficiency – VAD)
विटामिन A स्वस्थ उपकला, सामान्य दृष्टि, वृद्धि तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए आवश्यक है। इसकी कमी से रतौंधी हो सकती है और उचित उपाय न किए जाने पर स्थिति पूर्ण अंधता तक बढ़ सकती है।
विटामिन A की कमी से संक्रमण के प्रति संवेदनशीलता बढ़ सकती है और बच्चों की वृद्धि भी प्रभावित हो सकती है।
विटामिन A की कमी और संक्रमण का संबंध
विटामिन A की कमी व्यक्ति को संक्रमण के प्रति अधिक संवेदनशील बना सकती है। संक्रमण की स्थिति विटामिन A की कमी से जुड़ी समस्या को और गंभीर कर सकती है। इस प्रकार विटामिन A की कमी और संक्रमण का दुष्चक्र बन सकता है।
5. आयोडीन हीनता विकार (Iodine Deficiency Disorders – IDD)
आयोडीन सामान्य मानसिक और शारीरिक वृद्धि तथा विकास के लिए आवश्यक है। इसकी कमी से थायरॉइड हार्मोन का निर्माण प्रभावित हो सकता है।
आयोडीन की कमी के कारण थायरॉइड ग्रंथि का आकार बढ़ सकता है। थायरॉइड ग्रंथि के इस बढ़े हुए रूप को गलगंड (Goitre) कहा जाता है।
बच्चों में आयोडीन की गंभीर कमी विकास और मानसिक क्षमता को प्रभावित कर सकती है। गर्भावस्था में आयोडीन की कमी भ्रूण के विकास पर गंभीर प्रभाव डाल सकती है।
पोषण समस्याओं के कारण
पोषण समस्याएँ केवल भोजन की कमी के कारण नहीं होती हैं। इनके पीछे कई व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय कारण हो सकते हैं।
पोषण समस्याओं के प्रमुख कारण
- भोजन की अपर्याप्त उपलब्धता।
- अपर्याप्त मातृ एवं शिशु देखभाल।
- अपर्याप्त जल, सफाई और स्वच्छता।
- स्वास्थ्य सेवाओं की अपर्याप्त उपलब्धता।
- स्वास्थ्य सेवाओं तक कम पहुँच।
- उचित पोषण संबंधी जानकारी का अभाव।
- महिलाओं, वृद्धजनों और बालिकाओं के प्रति भेदभाव।
- शिक्षा का निम्न स्तर।
- गरीबी।
- सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियाँ।
- सरकारी नीतियाँ तथा कार्यक्रमों के लिए संसाधनों की उपलब्धता।
- पर्यावरणीय परिस्थितियाँ।
अल्पपोषण से संबंधित कारणों का स्तर
| स्तर | मुख्य कारण |
|---|---|
| व्यक्तिगत स्तर | कुपोषण, रोग या संक्रमण |
| घरेलू/पारिवारिक स्तर | भोजन की अपर्याप्त उपलब्धता, अपर्याप्त देखभाल, खराब स्वच्छता, स्वास्थ्य सेवाओं तक कम पहुँच, जानकारी का अभाव और भेदभाव |
| मूलभूत स्तर | मानव एवं वित्तीय संसाधन, सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था, राजनीतिक परिस्थितियाँ, पर्यावरण और उपलब्ध तकनीक |
पोषण समस्याओं से निपटने के लिए कार्यनीतियाँ
पोषण संबंधी समस्याओं को दूर करने के लिए बहुविषयक दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है। अध्याय में प्रमुख रूप से निम्न कार्यनीतियों का वर्णन किया गया है।
1. आहार अथवा भोजन-आधारित कार्यनीतियाँ
इन कार्यनीतियों में भोजन को पोषण संबंधी कमियों को दूर करने के माध्यम के रूप में उपयोग किया जाता है। इनका उद्देश्य पौष्टिक खाद्य पदार्थों की उपलब्धता और सेवन को बढ़ाना तथा आहार में सुधार करना है।
इसके प्रमुख उदाहरण हैं:
- आहारीय विविधता।
- आहार में परिवर्तन।
- घरेलू बागवानी।
- पोषण एवं स्वास्थ्य शिक्षा।
- भोजन का पुष्टीकरण।
भोजन-आधारित कार्यनीतियों का लाभ यह है कि इनके प्रभाव दीर्घकाल तक रह सकते हैं और ये व्यापक जनसंख्या तक पहुँच सकती हैं।
2. पोषण-आधारित अथवा औषधीय दृष्टिकोण
इस दृष्टिकोण में उन संवेदनशील समूहों को पोषक पूरक दिए जाते हैं जिनमें पोषण की कमी होने का खतरा रहता है या जिनमें कमी पाई जाती है।
भारत में विटामिन A तथा लौह तत्व जैसे पोषकों के लिए इस प्रकार के कार्यक्रमों का उपयोग किया गया है। यह दृष्टिकोण विशेष लक्ष्य समूहों के लिए उपयोगी हो सकता है।
भोजन-आधारित और पोषण-आधारित दृष्टिकोण में अंतर
| आधार | भोजन-आधारित दृष्टिकोण | पोषण-आधारित दृष्टिकोण |
|---|---|---|
| मुख्य उद्देश्य | भोजन के माध्यम से पोषण सुधार | विशिष्ट पोषक तत्व की कमी को दूर करना |
| लाभार्थी | व्यापक जनसंख्या | विशिष्ट संवेदनशील समूह |
| प्रकृति | अधिक व्यापक और दीर्घकालिक | विशिष्ट और अपेक्षाकृत अल्पकालिक |
| उदाहरण | आहार विविधता, भोजन पुष्टीकरण, घरेलू बागवानी | विटामिन A तथा लौह तत्व के पूरक |
पोषण संबंधी कार्यक्रम और हस्तक्षेप
1. एकीकृत बाल विकास सेवाएँ (ICDS)
एकीकृत बाल विकास सेवाएँ प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और विकास से संबंधित कार्यक्रम है। इसमें गर्भवती महिलाएँ, स्तनपान कराने वाली माताएँ, शिशु तथा 6 वर्ष तक के बच्चे शामिल होते हैं।
2. पोषण हीनता नियंत्रण कार्यक्रम
इनमें विटामिन A की कमी के कारण होने वाली अंधता की रोकथाम तथा राष्ट्रीय आयोडीन हीनता विकार नियंत्रण कार्यक्रम जैसे कार्यक्रम शामिल हैं।
3. आहार परक कार्यक्रम
अध्याय में मध्याह्न भोजन कार्यक्रम को आहार परक कार्यक्रम के उदाहरण के रूप में बताया गया है।
4. भोजन सुरक्षा कार्यक्रम
इनमें जन वितरण प्रणाली, अंत्योदय अन्न योजना, अन्नपूर्णा योजना तथा कार्य के बदले अनाज राष्ट्रीय कार्यक्रम जैसे उदाहरण दिए गए हैं।
5. स्वरोजगार और वैतनिक रोजगार योजनाएँ
स्वरोजगार और वैतनिक रोजगार योजनाओं को सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों के रूप में बताया गया है।
पोषण अभियान
अध्याय में पोषण अभियान को पोषण संबंधी योजनाओं के अभिसरण के माध्यम से अल्पपोषण और उससे संबंधित समस्याओं को कम करने के उद्देश्य से वर्णित किया गया है। इसमें स्टंटिंग, कम पोषण, एनीमिया और कम जन्म-भार जैसे मुद्दों पर ध्यान दिया गया है।
पोषण अभियान का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य विभिन्न पोषण संबंधी योजनाओं के बीच तालमेल स्थापित करना तथा आँगनवाड़ी सेवाओं की गुणवत्ता और उपयोग में सुधार करना था।
अध्याय में गर्भवती महिलाओं, स्तनपान कराने वाली माताओं तथा बच्चों के लिए समग्र विकास और पर्याप्त पोषण सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया गया है।
पोषण संबंधी समस्याओं से निपटने के लिए अप्रत्यक्ष नीतियाँ
पोषण सुधार के लिए केवल भोजन उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। खाद्य सुरक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक परिस्थितियों में सुधार भी आवश्यक है।
अध्याय में निम्न प्रकार की दीर्घकालिक नीतियों का उल्लेख है:
- खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना।
- पोषक तत्वों से युक्त खाद्य पदार्थों की उपलब्धता बढ़ाना।
- जन वितरण प्रणाली में सुधार।
- रोजगारपरक योजनाओं को बढ़ावा देना।
- भूमि सुधार लागू करना।
- स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण में सुधार।
- खाद्य पदार्थों में मिलावट रोकना।
- पोषण संबंधी जानकारी का प्रसार करना।
- महिलाओं की शिक्षा और साक्षरता में सुधार।
- समाज की भागीदारी बढ़ाना।
स्वास्थ्य देखभाल
स्वास्थ्य एक मूलभूत मानव अधिकार है। स्वास्थ्य देखभाल केवल रोग के उपचार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें स्वास्थ्य को बढ़ावा देना, स्वास्थ्य को बनाए रखना, निगरानी करना तथा स्वास्थ्य लाभ में सहायता करना भी शामिल है।
भारत में स्वास्थ्य देखभाल को मुख्य रूप से तीन स्तरों में समझाया गया है।
| स्तर | विवरण | उदाहरण |
|---|---|---|
| प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल | व्यक्ति, परिवार या समुदाय का स्वास्थ्य व्यवस्था से प्रथम संपर्क | प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) |
| द्वितीयक स्वास्थ्य देखभाल | अधिक जटिल स्वास्थ्य समस्याओं का उपचार एवं परामर्श | जिला अस्पताल और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र |
| तृतीयक स्वास्थ्य देखभाल | अधिक जटिल समस्याओं के लिए उच्चतम स्तर की विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवाएँ | मेडिकल कॉलेज अस्पताल, क्षेत्रीय और विशिष्ट अस्पताल, AIIMS जैसे संस्थान |
जन पोषण विशेषज्ञ की भूमिका
जन पोषण विशेषज्ञ को सामुदायिक पोषण विशेषज्ञ भी कहा जाता है। वे समुदाय के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने और पोषण संबंधी समस्याओं की रोकथाम के लिए कार्य करते हैं।
उनके कार्यक्षेत्र में निम्न प्रमुख क्षेत्र शामिल हैं:
- पोषण विज्ञान।
- जीवन-चक्र के विभिन्न चरणों की पोषण आवश्यकताएँ।
- पोषण मूल्यांकन।
- पोषण देख-रेख।
- खाद्य विज्ञान।
- शैक्षिक पद्धतियाँ।
- जनसंचार माध्यमों का उपयोग।
- पोषण कार्यक्रमों का प्रबंधन।
सामुदायिक पोषण विशेषज्ञ कहाँ कार्य कर सकता है?
- अस्पतालों के रोकथाम एवं स्वास्थ्य संवर्धन कार्यक्रमों में।
- राष्ट्रीय समेकित बाल विकास सेवाओं में।
- सरकारी स्तर पर परामर्शदाता या सलाहकार के रूप में।
- नीति निर्धारण समितियों में।
- सरकारी विकासात्मक कार्यक्रमों में।
- स्वयंसेवी संस्थाओं और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में।
- बड़े पैमाने पर चलाए जाने वाले पोषण कार्यक्रमों में।
- विद्यालय स्वास्थ्य कार्यक्रमों में।
- खाद्य एवं पोषण सुरक्षा से संबंधित कॉर्पोरेट CSR कार्यक्रमों में।
- शिक्षण और शोध के क्षेत्र में।
- शैक्षिक सामग्री और संचार सामग्री विकसित करने में।
जन पोषण के क्षेत्र में जीविका के अवसर
जन पोषण के क्षेत्र में शिक्षा और विशेषज्ञता प्राप्त व्यक्ति के लिए विभिन्न प्रकार के करियर विकल्प उपलब्ध हो सकते हैं। NCERT में निम्न अवसरों का उल्लेख किया गया है:
- अस्पतालों के PSM विभागों में सामुदायिक विशेषज्ञ।
- सरकार के पोषण कार्यक्रमों में कार्य।
- ICDS और खाद्य एवं पोषण बोर्ड से संबंधित कार्य।
- क्षेत्रीय, राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्वयंसेवी संस्थाओं में पोषण विशेषज्ञ।
- परामर्शदाता के रूप में कार्य।
- विद्यालयों और उद्योगों में आहार विशेषज्ञ या परामर्शदाता।
- शिक्षण एवं शैक्षिक क्षेत्र।
- अनुसंधान के क्षेत्र में कार्य।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण परिभाषाएँ
जन स्वास्थ्य
सभी लोगों के स्वास्थ्य की रक्षा और उसे बढ़ावा देने के लिए समाज द्वारा किए गए सामूहिक प्रयासों को जन स्वास्थ्य कहा जाता है।
जन पोषण
समाज के संगठित प्रयासों द्वारा स्वास्थ्य को उन्नत करने तथा रोगों की रोकथाम करते हुए जीवन अवधि को बढ़ाने की कला और विज्ञान को जन पोषण कहा जाता है।
अल्पपोषण
जब शरीर की आवश्यकता के अनुसार पर्याप्त ऊर्जा और पोषक तत्व प्राप्त नहीं होते हैं, तो इसे अल्पपोषण कहा जाता है।
कुपोषण का दोहरा भार
जब किसी समाज में अल्पपोषण और अतिपोषण दोनों प्रकार की पोषण समस्याएँ एक साथ पाई जाती हैं, तो इसे कुपोषण का दोहरा भार कहा जाता है।
बौनापन
जब व्यक्ति की ऊँचाई उसकी आयु के अनुरूप अपेक्षित ऊँचाई से कम होती है, तो इसे बौनापन कहा जाता है।
क्षयकारी
जब शरीर का भार उसकी ऊँचाई की तुलना में पर्याप्त नहीं होता, तो इसे क्षयकारी कहा जाता है।
समुदाय
ऐसे लोगों के विशिष्ट समूह को समुदाय कहा जाता है जिनमें कुछ सामान्य विशेषताएँ पाई जाती हैं, जैसे समान भाषा, समान प्रशासनिक क्षेत्र या समान स्वास्थ्य समस्याएँ।
पुनरावलोकन प्रश्न और उत्तर
प्रश्न 1. निम्नलिखित शब्दों को समझाइए—बौनापन, जन्म के समय कम भार वाला शिशु, IDD, क्षयकारी, कुपोषण का दोहरा भार, मरास्मस, क्वाशिओरकोर और समुदाय।
उत्तर:
बौनापन: आयु के अनुरूप अपेक्षित ऊँचाई से कम ऊँचाई होने की स्थिति को बौनापन कहते हैं।
जन्म के समय कम भार वाला शिशु: ऐसा शिशु जिसका जन्म के समय भार 2.5 किलोग्राम से कम हो, कम जन्म-भार वाला शिशु कहलाता है।
IDD: IDD का पूरा नाम Iodine Deficiency Disorders अर्थात आयोडीन हीनता विकार है। यह आयोडीन की अपर्याप्तता के कारण होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं को दर्शाता है।
क्षयकारी: जब शरीर का भार उसकी ऊँचाई की तुलना में पर्याप्त नहीं होता, तो इसे क्षयकारी कहा जाता है।
कुपोषण का दोहरा भार: किसी समाज में अल्पपोषण और अतिपोषण दोनों का एक साथ पाया जाना कुपोषण का दोहरा भार कहलाता है।
मरास्मस: ऊर्जा और भोजन की गंभीर कमी से होने वाला गंभीर अल्पपोषण मरास्मस कहलाता है।
क्वाशिओरकोर: मुख्य रूप से प्रोटीन की कमी से संबंधित गंभीर कुपोषण की स्थिति को क्वाशिओरकोर कहा जाता है।
समुदाय: कुछ सामान्य विशेषताओं वाले लोगों के विशिष्ट समूह को समुदाय कहा जाता है।
प्रश्न 2. जन पोषण समस्याओं से जूझने के लिए उपयोग में लाई जा सकने वाली विभिन्न कार्यनीतियों की विवेचना कीजिए।
उत्तर: जन पोषण समस्याओं से निपटने के लिए बहुविषयक दृष्टिकोण अपनाया जाता है। प्रमुख कार्यनीतियाँ हैं:
- आहार अथवा भोजन-आधारित कार्यनीतियाँ: भोजन के माध्यम से पोषण संबंधी समस्याओं को दूर करने का प्रयास किया जाता है। आहार विविधता, घरेलू बागवानी, पोषण शिक्षा और भोजन पुष्टीकरण इसके उदाहरण हैं।
- पोषण-आधारित अथवा औषधीय दृष्टिकोण: संवेदनशील समूहों को आवश्यक पोषक तत्वों के पूरक दिए जाते हैं। विटामिन A और लौह तत्व के पूरक इसके उदाहरण हैं।
- अप्रत्यक्ष नीतियाँ: खाद्य सुरक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, जन वितरण प्रणाली तथा सामाजिक परिस्थितियों में सुधार के माध्यम से पोषण स्थिति सुधारने का प्रयास किया जाता है।
प्रश्न 3. जन स्वास्थ्य पोषण क्या है?
उत्तर: जन स्वास्थ्य पोषण अध्ययन का वह क्षेत्र है जो अच्छे स्वास्थ्य को बढ़ावा देने और पोषण संबंधी समस्याओं का समाधान करने से संबंधित है। इसमें सरकारी नीतियों और कार्यक्रमों के माध्यम से समुदाय की पोषण समस्याओं को दूर करने का प्रयास किया जाता है।
प्रश्न 4. भारत किन सामान्य पोषण समस्याओं का सामना कर रहा है?
उत्तर: भारत में प्रमुख पोषण समस्याओं में प्रोटीन-ऊर्जा कुपोषण, सूक्ष्मपोषक तत्वों की कमी, लौह तत्व की कमी से अरक्तता, विटामिन A की कमी, आयोडीन हीनता विकार, अल्पपोषण, अतिपोषण, अधिक भार और मोटापा शामिल हैं।
प्रश्न 5. IDA और IDD के परिणाम क्या होते हैं?
उत्तर:
IDA: लौह तत्व की कमी से अरक्तता में हीमोग्लोबिन का स्तर कम हो जाता है। इसके कारण थकान, कमजोरी, शारीरिक परिश्रम पर साँस फूलना आदि हो सकते हैं। बच्चों में एकाग्रता, ध्यान और स्मरण शक्ति भी प्रभावित हो सकती है।
IDD: आयोडीन की कमी से थायरॉइड हार्मोन का निर्माण प्रभावित हो सकता है। थायरॉइड ग्रंथि के बढ़ने से गलगंड हो सकता है। बच्चों में मानसिक और शारीरिक विकास प्रभावित हो सकता है तथा गर्भावस्था में भ्रूण के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
प्रश्न 6. सार्वजनिक स्वास्थ्य पोषण का दायरा क्या है? इस क्षेत्र में कैरियर के कुछ विकल्पों को सूचीबद्ध करें।
उत्तर: सार्वजनिक स्वास्थ्य पोषण का दायरा व्यापक है। इसमें समुदाय के पोषण स्तर का मूल्यांकन, पोषण शिक्षा, स्वास्थ्य संवर्धन, रोगों की रोकथाम, पोषण कार्यक्रमों का प्रबंधन और कमजोर समूहों के लिए पोषण संबंधी हस्तक्षेप शामिल हैं।
इस क्षेत्र में अस्पताल, सरकारी पोषण कार्यक्रम, ICDS, स्वयंसेवी संस्थाएँ, विद्यालय, उद्योग, शिक्षण संस्थान तथा अनुसंधान संस्थान जैसे क्षेत्रों में अवसर मिल सकते हैं। व्यक्ति पोषण विशेषज्ञ, परामर्शदाता, आहार विशेषज्ञ, शिक्षक या शोधकर्ता के रूप में कार्य कर सकता है।
अतिरिक्त महत्वपूर्ण लघु उत्तरीय प्रश्न
1. जन पोषण और नैदानिक पोषण में क्या अंतर है?
उत्तर: जन पोषण मुख्य रूप से समुदाय और बड़ी जनसंख्या की पोषण समस्याओं से संबंधित है, जबकि नैदानिक पोषण मुख्यतः रोगी की पोषण स्थिति और चिकित्सीय आवश्यकताओं से संबंधित होता है।
2. सूक्ष्मपोषक तत्व क्या हैं?
उत्तर: ऐसे पोषक तत्व जिनकी शरीर को कम मात्रा में आवश्यकता होती है, जैसे विटामिन और खनिज, सूक्ष्मपोषक तत्व कहलाते हैं।
3. छिपी भूख किसे कहा जाता है?
उत्तर: आहार में आवश्यक सूक्ष्मपोषक तत्वों की कमी को कई बार छिपी भूख कहा जाता है।
4. गलगंड क्या है?
उत्तर: आयोडीन की कमी के कारण थायरॉइड ग्रंथि के बढ़ जाने को गलगंड कहा जाता है।
5. जन पोषण विशेषज्ञ को सामुदायिक पोषण विशेषज्ञ क्यों कहा जाता है?
उत्तर: क्योंकि जन पोषण विशेषज्ञ समुदाय या बड़ी जनसंख्या की पोषण समस्याओं, स्वास्थ्य संवर्धन और रोगों की रोकथाम से संबंधित कार्य करते हैं।
6. भोजन-आधारित कार्यनीति का एक लाभ बताइए।
उत्तर: भोजन-आधारित कार्यनीतियाँ व्यापक जनसंख्या तक पहुँच सकती हैं और इनके लाभ दीर्घकाल तक बने रह सकते हैं।
7. पोषण समस्याओं के मूलभूत कारणों में कौन-कौन से कारक शामिल हैं?
उत्तर: आर्थिक संसाधन, सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था, राजनीतिक परिस्थितियाँ, पर्यावरण, उपलब्ध तकनीक और मानव संसाधन आदि मूलभूत कारणों में शामिल हैं।
8. भारत में स्वास्थ्य देखभाल के कितने स्तर हैं?
उत्तर: भारत में स्वास्थ्य देखभाल के तीन प्रमुख स्तर हैं—प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक।
अतिरिक्त महत्वपूर्ण दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
1. भारत में पोषण संबंधी प्रमुख समस्याओं का विस्तार से वर्णन कीजिए।
उत्तर: भारत में पोषण संबंधी समस्याओं में अल्पपोषण, प्रोटीन-ऊर्जा कुपोषण, सूक्ष्मपोषक तत्वों की कमी, लौह तत्व की कमी से अरक्तता, विटामिन A की कमी और आयोडीन हीनता विकार प्रमुख हैं। इसके साथ ही अतिपोषण, अधिक भार और मोटापा भी महत्वपूर्ण समस्याएँ हैं।
प्रोटीन-ऊर्जा कुपोषण पर्याप्त ऊर्जा और प्रोटीन न मिलने के कारण होता है। सूक्ष्मपोषक तत्वों की कमी में लौह तत्व, विटामिन A, आयोडीन, जिंक आदि की कमी प्रमुख है। लौह तत्व की कमी से अरक्तता में हीमोग्लोबिन का स्तर कम हो जाता है। विटामिन A की कमी दृष्टि और रोग प्रतिरोधकता को प्रभावित कर सकती है। आयोडीन की कमी थायरॉइड हार्मोन के निर्माण को प्रभावित कर सकती है।
दूसरी ओर, अधिक ऊर्जा वाले भोजन और कम शारीरिक गतिविधि से अतिपोषण और मोटापे की समस्या बढ़ सकती है। इसलिए भारत को अल्पपोषण तथा अतिपोषण दोनों समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
2. पोषण समस्याओं को दूर करने के लिए भोजन-आधारित और पोषण-आधारित कार्यनीतियों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर: भोजन-आधारित कार्यनीतियों में भोजन की गुणवत्ता, विविधता और उपलब्धता में सुधार किया जाता है। आहार विविधता, घरेलू बागवानी, पोषण शिक्षा और भोजन पुष्टीकरण इसके उदाहरण हैं। इनका उद्देश्य व्यापक जनसंख्या में पोषण सुधार करना है।
पोषण-आधारित दृष्टिकोण में विशिष्ट पोषक तत्वों की कमी वाले या कमी के जोखिम वाले समूहों को पोषक पूरक दिए जाते हैं। विटामिन A तथा लौह तत्व के पूरक इसके उदाहरण हैं।
दोनों दृष्टिकोण जन पोषण सुधार में उपयोगी हैं, लेकिन उनके लक्ष्य, लाभार्थी समूह और कार्यान्वयन का स्वरूप अलग-अलग हो सकता है।
3. जन पोषण विशेषज्ञ के कार्यक्षेत्र और कैरियर के अवसरों का वर्णन कीजिए।
उत्तर: जन पोषण विशेषज्ञ समुदाय के पोषण और स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए कार्य करता है। उसके कार्यक्षेत्र में पोषण विज्ञान, जीवन-चक्र की पोषण आवश्यकताएँ, पोषण मूल्यांकन, पोषण देख-रेख, खाद्य विज्ञान, शिक्षा, जनसंचार और कार्यक्रम प्रबंधन शामिल हैं।
जन पोषण विशेषज्ञ अस्पतालों, सरकारी पोषण कार्यक्रमों, ICDS, विद्यालयों, स्वयंसेवी संस्थाओं, सरकारी विभागों, उद्योगों तथा शोध एवं शिक्षण संस्थानों में कार्य कर सकता है। वह पोषण विशेषज्ञ, परामर्शदाता, आहार विशेषज्ञ, शिक्षक या शोधकर्ता के रूप में भी कार्य कर सकता है।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)
प्रश्न 1. जन स्वास्थ्य पोषण का प्रमुख लक्ष्य क्या है?
- केवल रोगियों का उपचार
- अल्पपोषण और अतिपोषण की रोकथाम
- केवल दवाओं का वितरण
- केवल अस्पतालों का प्रबंधन
सही उत्तर: B. अल्पपोषण और अतिपोषण की रोकथाम
व्याख्या: जन स्वास्थ्य पोषण का उद्देश्य दोनों प्रकार की पोषण समस्याओं की रोकथाम करके लोगों के अनुकूलतम पोषण स्तर को बनाए रखना है।
प्रश्न 2. “छिपी भूख” किससे संबंधित है?
- पानी की कमी
- सूक्ष्मपोषक तत्वों की कमी
- केवल ऊर्जा की अधिकता
- केवल प्रोटीन की अधिकता
सही उत्तर: B. सूक्ष्मपोषक तत्वों की कमी
व्याख्या: विटामिन और खनिज जैसे सूक्ष्मपोषक तत्वों की कमी को छिपी भूख कहा जाता है।
प्रश्न 3. आयोडीन की कमी से कौन-सी स्थिति हो सकती है?
- गलगंड
- मरास्मस
- अरक्तता
- रतौंधी
सही उत्तर: A. गलगंड
व्याख्या: आयोडीन की कमी से थायरॉइड ग्रंथि बढ़ सकती है, जिसे गलगंड कहा जाता है।
प्रश्न 4. लौह तत्व की कमी से मुख्य रूप से कौन-सी समस्या होती है?
- गलगंड
- अरक्तता
- रतौंधी
- मोटापा
सही उत्तर: B. अरक्तता
व्याख्या: लौह तत्व हीमोग्लोबिन निर्माण के लिए आवश्यक है और इसकी कमी से लौह-अल्पता अरक्तता हो सकती है।
प्रश्न 5. विटामिन A की कमी से कौन-सी समस्या हो सकती है?
- रतौंधी
- गलगंड
- क्वाशिओरकोर
- अल्पभार
सही उत्तर: A. रतौंधी
व्याख्या: विटामिन A सामान्य दृष्टि के लिए आवश्यक है और इसकी कमी से रतौंधी हो सकती है।
प्रश्न 6. भारत में कुपोषण का दोहरा भार किसे कहा जाता है?
- दो प्रकार के संक्रमण
- अल्पपोषण और अतिपोषण का साथ-साथ होना
- केवल विटामिन की कमी
- केवल मोटापा
सही उत्तर: B. अल्पपोषण और अतिपोषण का साथ-साथ होना
व्याख्या: भारत में एक ओर अल्पपोषण है और दूसरी ओर अतिपोषण तथा मोटापे की समस्या भी मौजूद है।
प्रश्न 7. स्वास्थ्य देखभाल का पहला स्तर कौन-सा है?
- तृतीयक
- द्वितीयक
- प्राथमिक
- विशेषज्ञ स्तर
सही उत्तर: C. प्राथमिक
व्याख्या: प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल व्यक्ति, परिवार या समुदाय का स्वास्थ्य व्यवस्था से पहला संपर्क होती है।
प्रश्न 8. प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएँ मुख्य रूप से कहाँ उपलब्ध कराई जाती हैं?
- प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में
- केवल मेडिकल कॉलेजों में
- केवल AIIMS में
- केवल निजी अस्पतालों में
सही उत्तर: A. प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में
व्याख्या: अध्याय के अनुसार प्राथमिक स्तर की सेवाएँ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के नेटवर्क द्वारा उपलब्ध कराई जाती हैं।
प्रश्न 9. प्रोटीन-ऊर्जा कुपोषण में मुख्य रूप से किसकी कमी होती है?
- ऊर्जा और प्रोटीन
- केवल पानी
- केवल आयोडीन
- केवल विटामिन A
सही उत्तर: A. ऊर्जा और प्रोटीन
व्याख्या: शरीर की आवश्यकता की तुलना में ऊर्जा और प्रोटीन का अपर्याप्त सेवन प्रोटीन-ऊर्जा कुपोषण का प्रमुख कारण है।
प्रश्न 10. जन पोषण विशेषज्ञ को और किस नाम से जाना जाता है?
- सामुदायिक पोषण विशेषज्ञ
- सर्जन
- फार्मासिस्ट
- रेडियोलॉजिस्ट
सही उत्तर: A. सामुदायिक पोषण विशेषज्ञ
व्याख्या: अध्याय में जन पोषण विशेषज्ञ को सामुदायिक पोषण विशेषज्ञ भी कहा गया है।
प्रश्न 11. ICDS का संबंध किससे है?
- प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और विकास
- केवल उच्च शिक्षा
- केवल वयस्क रोजगार
- केवल अस्पताल प्रबंधन
सही उत्तर: A. प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और विकास
व्याख्या: ICDS में गर्भवती महिलाएँ, स्तनपान कराने वाली माताएँ, शिशु और 6 वर्ष तक के बच्चे शामिल होते हैं।
प्रश्न 12. भोजन-आधारित कार्यनीति का उदाहरण कौन-सा है?
- घरेलू बागवानी
- केवल दवा देना
- केवल इंजेक्शन देना
- केवल अस्पताल में भर्ती करना
सही उत्तर: A. घरेलू बागवानी
व्याख्या: घरेलू बागवानी भोजन-आधारित पोषण हस्तक्षेप का एक उदाहरण है।
त्वरित पुनरावृत्ति – Quick Revision
- जन पोषण: समुदाय की पोषण समस्याओं से संबंधित क्षेत्र।
- जन स्वास्थ्य पोषण: अच्छे स्वास्थ्य को बढ़ावा देने और पोषण समस्याओं को दूर करने का क्षेत्र।
- कुपोषण: पोषक तत्वों का अपर्याप्त, अधिक या असंतुलित सेवन।
- अल्पपोषण: आवश्यकता से कम पोषण।
- अतिपोषण: आवश्यकता से अधिक पोषण।
- PEM: प्रोटीन-ऊर्जा कुपोषण।
- IDA: लौह तत्व की कमी से अरक्तता।
- VAD: विटामिन A की कमी।
- IDD: आयोडीन हीनता विकार।
- मरास्मस: ऊर्जा की गंभीर कमी से संबंधित गंभीर अल्पपोषण।
- क्वाशिओरकोर: प्रोटीन की कमी से संबंधित गंभीर कुपोषण।
- गलगंड: आयोडीन की कमी से बढ़ी हुई थायरॉइड ग्रंथि।
- कुपोषण का दोहरा भार: अल्पपोषण और अतिपोषण दोनों का होना।
- स्वास्थ्य देखभाल के स्तर: प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक।
- जन पोषण विशेषज्ञ: सामुदायिक पोषण विशेषज्ञ।
अध्याय का सारांश
जनपोषण तथा स्वास्थ्य अध्याय में समुदाय और बड़ी जनसंख्या के पोषण तथा स्वास्थ्य से संबंधित समस्याओं का अध्ययन किया जाता है। जन स्वास्थ्य पोषण का लक्ष्य अल्पपोषण और अतिपोषण दोनों की रोकथाम तथा लोगों के अनुकूलतम पोषण स्तर को बनाए रखना है।
भारत में प्रोटीन-ऊर्जा कुपोषण, सूक्ष्मपोषक तत्वों की कमी, लौह तत्व की कमी से अरक्तता, विटामिन A की कमी और आयोडीन हीनता विकार जैसी समस्याएँ महत्वपूर्ण हैं। साथ ही अतिपोषण, अधिक भार और मोटापा भी चिंता के विषय हैं।
इन समस्याओं से निपटने के लिए भोजन-आधारित कार्यनीतियाँ, पोषण-आधारित दृष्टिकोण, पोषण शिक्षा, खाद्य पुष्टीकरण, पोषण कार्यक्रम और दीर्घकालिक सामाजिक-आर्थिक नीतियों का उपयोग किया जाता है।
भारत में स्वास्थ्य देखभाल को प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक स्तरों में समझा जाता है। जन पोषण विशेषज्ञ इन क्षेत्रों के अतिरिक्त सरकारी कार्यक्रमों, विद्यालयों, स्वयंसेवी संस्थाओं, उद्योगों, शिक्षण और अनुसंधान में भी कार्य कर सकते हैं।
अध्याय 3 के सबसे महत्वपूर्ण परीक्षा प्रश्न
- जन स्वास्थ्य पोषण क्या है? इसके लक्ष्य लिखिए।
- जन पोषण और जन स्वास्थ्य का क्या संबंध है?
- कुपोषण का दोहरा भार क्या है?
- भारत की प्रमुख पोषण संबंधी समस्याओं का वर्णन कीजिए।
- प्रोटीन-ऊर्जा कुपोषण क्या है?
- मरास्मस और क्वाशिओरकोर क्या हैं?
- सूक्ष्मपोषक तत्वों की कमी को “छिपी भूख” क्यों कहा जाता है?
- लौह तत्व की कमी से होने वाली अरक्तता के कारण एवं परिणाम लिखिए।
- विटामिन A की कमी के परिणाम लिखिए।
- आयोडीन हीनता विकार क्या है? इसके परिणाम लिखिए।
- पोषण समस्याओं के प्रमुख कारणों की व्याख्या कीजिए।
- पोषण समस्याओं से निपटने की विभिन्न कार्यनीतियों की विवेचना कीजिए।
- भोजन-आधारित और पोषण-आधारित कार्यनीतियों में अंतर लिखिए।
- भारत में चल रहे प्रमुख पोषण कार्यक्रमों का वर्णन कीजिए।
- भारत में स्वास्थ्य देखभाल के तीन स्तरों की व्याख्या कीजिए।
- जन पोषण विशेषज्ञ की भूमिका एवं कार्यक्षेत्र का वर्णन कीजिए।
- सार्वजनिक स्वास्थ्य पोषण के क्षेत्र में कैरियर के अवसरों की सूची बनाइए।
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