Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 4 – महासागरों और महाद्वीपों का वितरण में पृथ्वी पर वर्तमान महासागरों और महाद्वीपों की स्थिति तथा उनके विकास से संबंधित प्रमुख सिद्धांतों का अध्ययन किया जाता है। इस अध्याय में महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत, पेंजिया, गोंडवानालैंड, सागरीय तल विस्तार और प्लेट विवर्तनिकी जैसी महत्वपूर्ण अवधारणाएँ शामिल हैं।
इस अध्याय को समझने से यह स्पष्ट होता है कि आज अलग-अलग दिखाई देने वाले महाद्वीप हमेशा से इसी स्थिति में नहीं थे। पृथ्वी के भूवैज्ञानिक इतिहास में महाद्वीपीय भू-खंडों और महासागरीय तल में लगातार परिवर्तन होते रहे हैं।
इस पोस्ट में Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 4 के महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर, MCQ, महाद्वीपीय विस्थापन के प्रमाण, प्लेट सीमाएँ, सागरीय तल विस्तार, प्रमुख प्लेटें तथा परीक्षा उपयोगी प्रश्न सरल भाषा में दिए गए हैं।
महासागरों और महाद्वीपों का वितरण – परिचय
पृथ्वी की सतह पर भूमि और जल का वितरण समान नहीं है। विशाल भू-भाग महाद्वीपों के रूप में तथा विस्तृत जलराशियाँ महासागरों के रूप में दिखाई देती हैं। वर्तमान स्थिति करोड़ों वर्षों में हुए भूवैज्ञानिक परिवर्तनों का परिणाम है।
वैज्ञानिकों ने महाद्वीपों की वर्तमान स्थिति को समझाने के लिए अनेक विचार प्रस्तुत किए। इनमें अल्फ्रेड वेगनर का महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। बाद में समुद्र तल के अध्ययन और प्लेटों की गति से संबंधित प्रमाणों ने प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के विकास का आधार तैयार किया।
महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत
जर्मन वैज्ञानिक अल्फ्रेड वेगनर ने 1912 में महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत प्रस्तुत किया। इस सिद्धांत का मूल विचार था कि वर्तमान महाद्वीप पहले एक बड़े संयुक्त भू-खंड का हिस्सा थे और बाद में धीरे-धीरे अलग होकर अपनी वर्तमान स्थिति तक पहुँचे।
वेगनर ने इस विशाल प्राचीन भू-खंड को पेंजिया (Pangaea) कहा। पेंजिया के चारों ओर फैले विशाल महासागर को पैंथालासा (Panthalassa) कहा गया।
पेंजिया और पैंथालासा
पेंजिया का अर्थ सामान्य रूप से सम्पूर्ण पृथ्वी से लिया जाता है। यह एक विशाल संयुक्त महाद्वीपीय भू-खंड था। इसके चारों ओर पैंथालासा नामक विशाल महासागर फैला हुआ था।
बाद में पेंजिया का विभाजन हुआ और इसके बड़े हिस्सों से लॉरेशिया तथा गोंडवानालैंड जैसे भू-खंड विकसित हुए। आगे चलकर इन भू-खंडों का भी विभाजन हुआ और वर्तमान महाद्वीपों की स्थिति विकसित हुई।
गोंडवानालैंड
पेंजिया के दक्षिणी भाग से संबंधित विशाल भू-खंड को गोंडवानालैंड कहा जाता है। इसके विभाजन से दक्षिणी अमेरिका, अफ्रीका, भारत, ऑस्ट्रेलिया, अंटार्कटिका तथा अन्य भू-भागों के विकास को समझाया जाता है।
गोंडवानालैंड का नाम भारत के गोंडवाना क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। इसके प्राचीन भूवैज्ञानिक प्रमाण महाद्वीपीय विस्थापन के अध्ययन में बहुत महत्वपूर्ण हैं।
महाद्वीपीय विस्थापन के प्रमाण
वेगनर ने अपने सिद्धांत को समर्थन देने के लिए कई प्रकार के प्रमाण प्रस्तुत किए। इनमें महाद्वीपों की तटरेखाओं की समानता, चट्टानों की समानता, जीवाश्मों का वितरण, टिलाइट तथा प्लेसर निक्षेप महत्वपूर्ण हैं।
1. महाद्वीपों की तटरेखाओं में समानता
दक्षिणी अमेरिका के पूर्वी तट और अफ्रीका के पश्चिमी तट को देखने पर दोनों के आकार में उल्लेखनीय समानता दिखाई देती है। ऐसा प्रतीत होता है कि दोनों भू-खंड कभी एक-दूसरे से जुड़े हुए रहे होंगे।
2. चट्टानों की समानता
अलग-अलग महाद्वीपों के आमने-सामने वाले भागों में समान आयु और समान प्रकार की चट्टानों का पाया जाना इस विचार को समर्थन देता है कि ये भू-खंड कभी एक साथ जुड़े हुए थे।
3. जीवाश्मों का वितरण
अलग-अलग महाद्वीपों पर समान प्रकार के पौधों और जीवों के जीवाश्म मिलना भी महाद्वीपीय विस्थापन का महत्वपूर्ण प्रमाण है। यदि वर्तमान महासागर पहले से मौजूद थे, तो ऐसे जीवों का इतने दूर-दूर के भू-भागों पर पाया जाना कठिन होता।
ग्लोसोप्टेरिस जैसे पौधों के जीवाश्म दक्षिणी गोलार्द्ध के कई वर्तमान महाद्वीपों में पाए गए हैं। इससे प्राचीन भू-खंडों के आपस में जुड़े होने की संभावना को बल मिला।
4. टिलाइट
टिलाइट हिमानी निक्षेपों से बनने वाली चट्टान है। गोंडवाना क्षेत्र की चट्टानों तथा दक्षिणी गोलार्द्ध के विभिन्न भागों में समान प्रकार के हिमानी निक्षेप मिलने से यह संकेत मिलता है कि इन भू-खंडों की स्थिति अतीत में अलग थी और वहाँ समान जलवायु परिस्थितियाँ मौजूद थीं।
5. प्लेसर निक्षेप
दक्षिणी अमेरिका और अफ्रीका के कुछ तटीय क्षेत्रों में समान प्रकार के खनिज निक्षेपों का मिलना भी महाद्वीपों के पूर्व में जुड़े होने के प्रमाणों में शामिल किया गया है। ऐसे प्रमाणों को चट्टानों और भूवैज्ञानिक संरचनाओं के साथ मिलाकर देखा जाता है।
महाद्वीपीय विस्थापन के लिए वेगनर द्वारा बताए गए बल
वेगनर ने महाद्वीपों की गति को समझाने के लिए दो प्रमुख बलों का उल्लेख किया:
- ध्रुवीय या पोलर फ्लिंग बल
- ज्वारीय बल
ध्रुवीय फ्लिंग बल को पृथ्वी के घूर्णन से संबंधित माना गया था, जबकि ज्वारीय बल को सूर्य और चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण से जोड़ा गया। हालांकि बाद के वैज्ञानिक अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ कि ये बल महाद्वीपों की गति को पूरी तरह समझाने के लिए पर्याप्त नहीं थे।
महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत की सीमाएँ
वेगनर ने महाद्वीपों के विस्थापन के अनेक प्रमाण दिए, लेकिन उस समय वे यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं कर सके कि इतने विशाल महाद्वीपों को गति देने वाली वास्तविक भू-वैज्ञानिक प्रक्रिया क्या थी।
बाद में महासागरीय तल के अध्ययन, भूकंपीय गतिविधियों, चुंबकीय प्रमाणों और प्लेटों की गति से संबंधित खोजों ने महाद्वीपीय विस्थापन की व्याख्या को अधिक वैज्ञानिक आधार दिया।
सागरीय तल विस्तार सिद्धांत
समुद्र के तल के अध्ययन से पता चला कि महासागरीय तल एक सपाट और स्थिर मैदान नहीं है। इसमें मध्य-महासागरीय कटक, गहरी समुद्री खाइयाँ और अन्य उच्चावच पाए जाते हैं।
हैरी हेस ने 1960 के दशक में सागरीय तल विस्तार की अवधारणा को विकसित किया। इसके अनुसार मध्य-महासागरीय कटकों के आसपास पृथ्वी के अंदर से मैग्मा ऊपर आता है और ठंडा होकर नई महासागरीय पर्पटी बनाता है। नई पर्पटी बनने के कारण पुरानी पर्पटी कटक से दोनों ओर दूर होती जाती है।
सागरीय तल विस्तार के प्रमुख प्रमाण
- मध्य-महासागरीय कटकों के आसपास ज्वालामुखीय गतिविधि।
- कटक के दोनों ओर चट्टानों की आयु में क्रमिक परिवर्तन।
- चट्टानों में चुंबकीय धारियों का सममित वितरण।
- महासागरीय पर्पटी का अपेक्षाकृत युवा होना।
- महासागरीय तल पर भूकंपीय गतिविधियों का विशेष वितरण।
प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत
प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत आधुनिक भू-विज्ञान की महत्वपूर्ण अवधारणाओं में से एक है। इसके अनुसार पृथ्वी का कठोर स्थलमंडल कई बड़ी और छोटी प्लेटों में विभाजित है। ये प्लेटें नीचे स्थित अधिक लचीली परत के ऊपर धीरे-धीरे गतिशील रहती हैं।
प्लेटों की गति के कारण पर्वत निर्माण, भूकंप, ज्वालामुखी, महासागरीय कटक और गहरी समुद्री खाइयों जैसी अनेक भू-आकृतिक घटनाएँ होती हैं।
प्लेटों के प्रमुख प्रकार
प्लेटों को उनके ऊपर स्थित भू-भाग के आधार पर सामान्यतः महाद्वीपीय प्लेट और महासागरीय प्लेट के रूप में समझा जाता है। कई प्लेटों में महाद्वीपीय और महासागरीय दोनों प्रकार की पर्पटी शामिल हो सकती है।
उदाहरण के लिए प्रशान्त प्लेट मुख्यतः महासागरीय प्रकृति की है, जबकि यूरेशियन प्लेट में विशाल महाद्वीपीय भू-भाग शामिल है।
प्रमुख प्लेटें
पृथ्वी के स्थलमंडल में कई बड़ी प्लेटें हैं। प्रमुख प्लेटों में निम्नलिखित शामिल हैं:
- प्रशान्त प्लेट
- उत्तर अमेरिकी प्लेट
- दक्षिण अमेरिकी प्लेट
- अफ्रीकी प्लेट
- यूरेशियन प्लेट
- इंडो-ऑस्ट्रेलियन प्लेट
- अंटार्कटिक प्लेट
इसके अतिरिक्त कई छोटी प्लेटें भी हैं, जैसे नाज्का प्लेट, कोकोस प्लेट, अरब प्लेट और फिलीपीन प्लेट।
प्लेट सीमाएँ
जहाँ दो प्लेटें एक-दूसरे से मिलती हैं, उस क्षेत्र को प्लेट सीमा कहा जाता है। प्लेटों की गति के आधार पर तीन प्रमुख प्रकार की सीमाएँ होती हैं:
- अपसारी सीमा (Divergent Boundary)
- अभिसारी सीमा (Convergent Boundary)
- रूपांतर सीमा (Transform Boundary)
अपसारी सीमा
जहाँ दो प्लेटें एक-दूसरे से दूर हटती हैं, वहाँ अपसारी सीमा बनती है। नीचे से मैग्मा ऊपर आकर ठंडा होता है और नई पर्पटी का निर्माण कर सकता है। मध्य-महासागरीय कटक इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
अभिसारी सीमा
जहाँ दो प्लेटें एक-दूसरे की ओर बढ़ती हैं, वहाँ अभिसारी सीमा बनती है। इस प्रकार की सीमा पर एक प्लेट दूसरी के नीचे जा सकती है, जिसे प्रविष्ठन या Subduction कहा जाता है।
अभिसरण मुख्यतः तीन प्रकार का हो सकता है:
- महासागरीय प्लेट और महाद्वीपीय प्लेट का अभिसरण
- दो महासागरीय प्लेटों का अभिसरण
- दो महाद्वीपीय प्लेटों का अभिसरण
रूपांतर सीमा
जहाँ दो प्लेटें एक-दूसरे के समानांतर विपरीत दिशाओं में खिसकती हैं और सामान्यतः न नई पर्पटी बनती है तथा न पुरानी पर्पटी का विनाश होता है, वहाँ रूपांतर सीमा बनती है। इन क्षेत्रों में भूकंप की गतिविधि महत्वपूर्ण हो सकती है।
अपसारी और अभिसारी सीमा में अंतर
| अपसारी सीमा | अभिसारी सीमा |
|---|---|
| प्लेटें एक-दूसरे से दूर जाती हैं। | प्लेटें एक-दूसरे की ओर आती हैं। |
| नई पर्पटी का निर्माण हो सकता है। | पुरानी पर्पटी का विनाश या पुनर्चक्रण हो सकता है। |
| मध्य-महासागरीय कटक प्रमुख उदाहरण हैं। | खाइयाँ और पर्वत निर्माण इसके प्रमुख परिणाम हो सकते हैं। |
प्लेटों की गति का कारण
प्लेटों की गति को समझाने में पृथ्वी के अंदर की ऊष्मा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मैंटल में तापमान और घनत्व के अंतर से संवहन जैसी गतियाँ उत्पन्न हो सकती हैं। इनके साथ-साथ प्लेट सीमा पर होने वाली प्रक्रियाएँ भी प्लेट गति को प्रभावित करती हैं।
इसलिए प्लेटों की गति को केवल एक ही बल से समझाना उचित नहीं है। आधुनिक प्लेट विवर्तनिकी में मध्य-महासागरीय कटक पर फैलाव, सबडक्शन और गुरुत्वीय प्रभाव जैसी प्रक्रियाओं को भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
महासागरीय तल की संरचना
महासागरीय तल पूरी तरह समतल नहीं होता। इसमें अलग-अलग प्रकार के उच्चावच पाए जाते हैं। अध्ययन की सुविधा के लिए इसे प्रमुख रूप से निम्न भागों में समझा जा सकता है:
- महाद्वीपीय सीमा
- गहरे समुद्री बेसिन
- मध्य-महासागरीय कटक
महाद्वीपीय सीमा
महाद्वीपों के किनारों से महासागरीय भाग की ओर जाने वाला क्षेत्र महाद्वीपीय सीमा से संबंधित है। इसमें महाद्वीपीय शेल्फ, महाद्वीपीय ढाल और महाद्वीपीय उत्थान जैसे भाग शामिल किए जाते हैं।
गहरे समुद्री बेसिन
महासागरों के गहरे भागों में विस्तृत बेसिन पाए जाते हैं। इनके अंदर गहरे समुद्री मैदान, पर्वतीय कटक और अन्य समुद्री उच्चावच मौजूद हो सकते हैं।
मध्य-महासागरीय कटक
मध्य-महासागरीय कटक महासागरीय तल पर फैली विशाल जलमग्न पर्वत श्रृंखलाएँ हैं। इन क्षेत्रों में नई महासागरीय पर्पटी बनने की प्रक्रिया से इनका गहरा संबंध है।
ध्रुवीय भ्रमण या Polar Wandering
पुराचुंबकीय अध्ययन से यह पता चलता है कि भूवैज्ञानिक अतीत में चुंबकीय ध्रुवों की स्थिति वर्तमान स्थिति से अलग रही है। पुराने शैलों में संरक्षित चुंबकीय गुणों का अध्ययन करके वैज्ञानिक अतीत की दिशा और स्थिति के बारे में जानकारी प्राप्त करते हैं।
इससे महाद्वीपों की पूर्व स्थिति और उनके संचलन को समझने में भी सहायता मिलती है।
प्रवालों से महाद्वीपीय विस्थापन का प्रमाण
प्रवाल सामान्यतः गर्म उष्णकटिबंधीय समुद्री जल में अच्छी तरह विकसित होते हैं। यदि किसी वर्तमान ठंडे क्षेत्र में ऐसे प्राचीन प्रवालों के प्रमाण मिलते हैं, तो इससे यह संकेत मिल सकता है कि उस भू-भाग की स्थिति अतीत में अधिक गर्म अक्षांशों में रही होगी।
इस प्रकार प्राचीन जलवायु के प्रमाण महाद्वीपीय विस्थापन और भू-खंडों की पुरानी स्थिति समझने में उपयोगी होते हैं।
भारत की प्लेटीय गति और हिमालय
भारतीय प्लेट भूवैज्ञानिक समय में उत्तर की ओर बढ़ी और अंततः यूरेशियन प्लेट से टकराई। इस अभिसरण के परिणामस्वरूप भारतीय और यूरेशियन प्लेटों के बीच संपीड़न हुआ और हिमालय तथा तिब्बती पठार के विकास से जुड़ी पर्वतनिर्माण प्रक्रियाएँ हुईं।
आज भी भारतीय प्लेट की गति जारी है। इसी कारण हिमालय क्षेत्र में भूकंपीय गतिविधि का खतरा बना रहता है।
अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उत्तर
प्रश्न 1. पेंजिया से पृथक होने वाले दक्षिणी महाद्वीपीय भू-खंड का नाम क्या था?
उत्तर: गोंडवानालैंड।
प्रश्न 2. गोंडवानालैंड में शामिल प्रमुख भू-खंड कौन-से थे?
उत्तर: दक्षिणी अमेरिका, अफ्रीका, भारत, ऑस्ट्रेलिया और अंटार्कटिका सहित दक्षिणी गोलार्द्ध के कई भू-खंड गोंडवानालैंड से जुड़े माने जाते हैं।
प्रश्न 3. किस पौधे के जीवाश्मों का वितरण महाद्वीपीय विस्थापन के प्रमाण के रूप में दिया जाता है?
उत्तर: ग्लोसोप्टेरिस के जीवाश्म।
प्रश्न 4. मूल महाद्वीप का नाम क्या था?
उत्तर: पेंजिया।
प्रश्न 5. महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत किसने प्रस्तुत किया?
उत्तर: अल्फ्रेड वेगनर ने 1912 में महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत प्रस्तुत किया।
प्रश्न 6. लैमूरिया से क्या अभिप्राय है?
उत्तर: लैमूरिया एक ऐतिहासिक परिकल्पित भू-खंड का नाम है, जिसे भारत, मेडागास्कर और अफ्रीका के बीच प्राचीन भू-संबंध समझाने के लिए प्रस्तावित किया गया था।
प्रश्न 7. प्लेसर निक्षेप कहाँ पाए जाते हैं?
उत्तर: अध्याय में घाना के तट और ब्राजील के तट के स्वर्ण निक्षेपों को महाद्वीपीय विस्थापन के प्रमाण के रूप में बताया गया है।
प्रश्न 8. टिलाइट क्या है?
उत्तर: हिमानी निक्षेपों से बनने वाली अवसादी चट्टान को टिलाइट कहा जाता है। इसके प्राचीन वितरण से पुराने हिमाच्छादन और महाद्वीपों की पुरानी स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है।
प्रश्न 9. पेंजिया के चारों ओर फैले महासागर का नाम क्या था?
उत्तर: पैंथालासा।
प्रश्न 10. हिमालय के निर्माण में कौन-सी प्लेटें महत्वपूर्ण थीं?
उत्तर: भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट का अभिसरण हिमालय के निर्माण का प्रमुख कारण है।
प्रश्न 11. सबसे बड़ी महासागरीय प्लेट कौन-सी है?
उत्तर: प्रशान्त प्लेट।
प्रश्न 12. संवहन धाराओं से संबंधित सिद्धांत किसने दिया?
उत्तर: आर्थर होम्स ने मैंटल में संवहन धाराओं की अवधारणा को विकसित किया।
प्रश्न 13. सागरीय तल विस्तार क्या है?
उत्तर: मध्य-महासागरीय कटकों के पास नई महासागरीय पर्पटी बनने और पुरानी पर्पटी के दोनों ओर फैलने की प्रक्रिया को सागरीय तल विस्तार कहा जाता है।
प्रश्न 14. प्लेट संचलन का एक प्रमुख कारण क्या है?
उत्तर: पृथ्वी के आंतरिक भाग में ऊष्मा से संबंधित मैंटल की गतियाँ प्लेटों के संचलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
प्रश्न 15. महासागरीय तल के प्रमुख भाग कौन-से हैं?
उत्तर: महाद्वीपीय सीमा, गहरे समुद्री बेसिन और मध्य-महासागरीय कटक इसके प्रमुख भाग हैं।
लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उत्तर
प्रश्न 1. ध्रुवीय भ्रमण से क्या अभिप्राय है?
उत्तर: भूवैज्ञानिक अतीत में चुंबकीय ध्रुवों की स्थिति वर्तमान स्थिति से अलग रही है। पुराने शैलों में मौजूद स्थायी चुंबकत्व का अध्ययन करके वैज्ञानिक उस समय के चुंबकीय क्षेत्र की दिशा का अनुमान लगाते हैं। विभिन्न समयों के इन प्रमाणों से ध्रुवों की बदलती स्थिति का पता चलता है। इसी अवधारणा को ध्रुवीय भ्रमण या Polar Wandering कहा जाता है।
प्रश्न 2. प्रवालों का वितरण महाद्वीपीय विस्थापन को कैसे स्पष्ट करता है?
उत्तर: प्रवालों के विकास के लिए सामान्यतः गर्म समुद्री जल अनुकूल होता है। यदि किसी वर्तमान ठंडे क्षेत्र में पुराने प्रवालों के प्रमाण मिलते हैं, तो इससे संकेत मिलता है कि वह भू-भाग अतीत में गर्म अक्षांशों के निकट रहा होगा। इस प्रकार प्राचीन प्रवालों का वितरण महाद्वीपों की पुरानी स्थिति और उनके बाद के विस्थापन का संकेत देता है।
प्रश्न 3. पेंजिया क्या था? इसके टूटने की प्रक्रिया समझाइए।
उत्तर: पेंजिया एक विशाल संयुक्त महाद्वीपीय भू-खंड था, जिसमें वर्तमान के अनेक महाद्वीपीय भाग जुड़े हुए थे। इसके चारों ओर पैंथालासा महासागर फैला हुआ था। भूवैज्ञानिक समय में पेंजिया का विभाजन हुआ और इसके उत्तरी तथा दक्षिणी बड़े भाग विकसित हुए। आगे चलकर ये भू-खंड कई हिस्सों में टूटे और धीरे-धीरे वर्तमान महाद्वीपों की स्थिति विकसित हुई।
प्रश्न 4. महत्वपूर्ण छोटी प्लेटों का वर्णन कीजिए।
उत्तर: बड़ी प्लेटों के अतिरिक्त पृथ्वी पर कई छोटी प्लेटें भी हैं। कोकोस प्लेट मध्य अमेरिका और प्रशान्त क्षेत्र के बीच स्थित है। नाज्का प्लेट दक्षिण अमेरिका के पश्चिम में स्थित है। अरब प्लेट अरब प्रायद्वीप के बड़े भाग से संबंधित है। फिलीपीन प्लेट पश्चिमी प्रशान्त क्षेत्र में स्थित है। इन छोटी प्लेटों की गति आसपास की बड़ी प्लेटों के साथ मिलकर भूकंप, ज्वालामुखी और अन्य भू-वैज्ञानिक गतिविधियों को प्रभावित करती है।
प्रश्न 5. महासागरीय तल के मानचित्र से क्या निष्कर्ष निकलता है?
उत्तर: महासागरीय तल पूरी तरह समतल नहीं है। इसमें विस्तृत गहरे समुद्री मैदान, मध्य-महासागरीय कटक, समुद्री पर्वत और गहरी खाइयाँ पाई जाती हैं। मध्य-महासागरीय कटकों के आसपास ज्वालामुखीय गतिविधि तथा नई महासागरीय पर्पटी के निर्माण से संबंधित प्रमाण मिलते हैं। समुद्री चट्टानों की आयु और चुंबकीय गुणों का अध्ययन सागरीय तल विस्तार को समझने में भी उपयोगी रहा है।
प्रश्न 6. महाद्वीपों के प्रवाह के लिए वेगनर ने किन बलों का उल्लेख किया?
उत्तर: वेगनर ने महाद्वीपीय विस्थापन के लिए मुख्य रूप से ध्रुवीय फ्लिंग बल और ज्वारीय बल का उल्लेख किया था। ध्रुवीय फ्लिंग बल को पृथ्वी के घूर्णन से तथा ज्वारीय बल को सूर्य और चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण से जोड़ा गया था। बाद में वैज्ञानिकों ने पाया कि ये बल महाद्वीपीय विस्थापन को पूरी तरह समझाने के लिए पर्याप्त नहीं थे।
प्रश्न 7. अपसारी और अभिसारी क्षेत्र में अंतर स्पष्ट कीजिए।
| अपसारी क्षेत्र | अभिसारी क्षेत्र |
|---|---|
| प्लेटें एक-दूसरे से दूर जाती हैं। | प्लेटें एक-दूसरे की ओर बढ़ती हैं। |
| नई पर्पटी का निर्माण हो सकता है। | पर्पटी का विनाश या पुनर्चक्रण हो सकता है। |
| मध्य-महासागरीय कटक प्रमुख उदाहरण है। | सबडक्शन क्षेत्र और पर्वत निर्माण इसके उदाहरण हैं। |
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उत्तर
प्रश्न 1. महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के पक्ष में दिए गए प्रमाणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर: महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के अनुसार वर्तमान महाद्वीप अतीत में एक बड़े संयुक्त भू-खंड का हिस्सा थे। वेगनर ने इस विचार के समर्थन में कई प्रकार के प्रमाण प्रस्तुत किए।
सबसे पहला प्रमाण महाद्वीपों की तटरेखाओं की समानता है। दक्षिणी अमेरिका और अफ्रीका की आमने-सामने की तटरेखाओं में ऐसी समानता दिखाई देती है जिससे उनके पुराने जुड़ाव की संभावना समझ में आती है।
दूसरा प्रमाण अलग-अलग महाद्वीपों पर समान आयु और प्रकृति की चट्टानों का पाया जाना है। तीसरा महत्वपूर्ण प्रमाण जीवाश्मों का वितरण है। ग्लोसोप्टेरिस तथा अन्य जीवों के समान जीवाश्म आज अलग-अलग महाद्वीपों पर मिलते हैं।
टिलाइट के समान निक्षेप भी दक्षिणी गोलार्द्ध के कई वर्तमान भू-खंडों पर पाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त कुछ समान खनिज निक्षेप भी महाद्वीपों के पूर्व संबंध की ओर संकेत करते हैं। इन सभी प्रमाणों को एक साथ देखने पर महाद्वीपीय विस्थापन की अवधारणा को समर्थन मिला।
प्रश्न 2. महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत और प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत में मूलभूत अंतर बताइए।
उत्तर: महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत का मुख्य विचार यह था कि वर्तमान महाद्वीप पहले एक संयुक्त महाद्वीपीय भू-खंड के हिस्से थे और बाद में अलग-अलग दिशाओं में खिसक गए। वेगनर ने पेंजिया और पैंथालासा की अवधारणा के माध्यम से इसकी व्याख्या की।
प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत इससे आगे जाकर पूरी प्रक्रिया की व्यापक व्याख्या करता है। इसके अनुसार केवल महाद्वीप स्वतंत्र रूप से नहीं चलते, बल्कि महाद्वीप और महासागरीय पर्पटी मिलकर कठोर प्लेटों का भाग होते हैं। ये प्लेटें पृथ्वी के स्थलमंडल में गतिशील रहती हैं।
इस प्रकार प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत महाद्वीपों की गति के साथ-साथ महासागरीय तल विस्तार, सबडक्शन, पर्वत निर्माण, भूकंप और ज्वालामुखीय गतिविधियों को भी एक ही व्यापक ढाँचे में समझाता है।
प्रश्न 3. महाद्वीपीय विस्थापन के बाद हुई प्रमुख खोजों ने महासागर वितरण के अध्ययन में रुचि कैसे बढ़ाई?
उत्तर: महासागरीय तल के विस्तृत अध्ययन से वैज्ञानिकों को ऐसी जानकारियाँ प्राप्त हुईं जो वेगनर के समय उपलब्ध नहीं थीं। समुद्र तल के मानचित्रण से मध्य-महासागरीय कटक और गहरी समुद्री खाइयों की जानकारी मिली। कटकों के आसपास ज्वालामुखीय गतिविधि तथा नई चट्टानों के निर्माण के प्रमाण मिले।
महासागरीय चट्टानों की आयु के अध्ययन से पता चला कि कटक के पास की चट्टानें अपेक्षाकृत नई हैं और कटक से दूर जाने पर चट्टानों की आयु बढ़ती जाती है। इसके साथ ही समुद्री चट्टानों में चुंबकीय धारियों का सममित वितरण भी पाया गया।
इन प्रमाणों ने सागरीय तल विस्तार की अवधारणा को समर्थन दिया। आगे चलकर इन विचारों को अन्य भूवैज्ञानिक प्रमाणों के साथ जोड़कर प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत विकसित हुआ।
महाद्वीपीय विस्थापन और प्लेट विवर्तनिकी – तुलना
| महाद्वीपीय विस्थापन | प्लेट विवर्तनिकी |
|---|---|
| महाद्वीपों के स्थान परिवर्तन पर केंद्रित। | पूरे स्थलमंडलीय प्लेट तंत्र की व्याख्या करता है। |
| पेंजिया के टूटने की अवधारणा प्रमुख है। | प्लेटों की गति और उनकी सीमाओं की व्याख्या प्रमुख है। |
| महाद्वीपों को गतिशील माना गया। | महाद्वीप और महासागरीय पर्पटी प्लेटों के साथ गतिशील होते हैं। |
| गति का कारण पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाया। | प्लेट सीमाओं, मैंटल प्रक्रियाओं और अन्य बलों के आधार पर गति को समझाया जाता है। |
प्लेट सीमाओं के तीन प्रकार
- अपसारी सीमा: प्लेटें अलग होती हैं और नई पर्पटी बन सकती है।
- अभिसारी सीमा: प्लेटें एक-दूसरे की ओर बढ़ती हैं और सबडक्शन या पर्वत निर्माण हो सकता है।
- रूपांतर सीमा: प्लेटें एक-दूसरे के समानांतर खिसकती हैं और सामान्यतः पर्पटी का निर्माण या विनाश नहीं होता।
महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न
- महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत किसने प्रस्तुत किया?
उत्तर: अल्फ्रेड वेगनर - वेगनर ने महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत कब प्रस्तुत किया?
उत्तर: 1912 - पेंजिया के चारों ओर फैले महासागर का नाम क्या था?
उत्तर: पैंथालासा - पेंजिया के दक्षिणी बड़े भू-खंड को क्या कहा गया?
उत्तर: गोंडवानालैंड - पेंजिया के उत्तरी बड़े भू-खंड को क्या कहा गया?
उत्तर: लॉरेशिया - महाद्वीपीय विस्थापन के प्रमाणों में किस पौधे का जीवाश्म महत्वपूर्ण है?
उत्तर: ग्लोसोप्टेरिस - सागरीय तल विस्तार की अवधारणा किस वैज्ञानिक से संबंधित है?
उत्तर: हैरी हेस - प्लेटों के अलग होने वाली सीमा को क्या कहते हैं?
उत्तर: अपसारी सीमा - प्लेटों के एक-दूसरे की ओर बढ़ने वाली सीमा को क्या कहते हैं?
उत्तर: अभिसारी सीमा - जहाँ प्लेटें एक-दूसरे के समानांतर खिसकती हैं, उसे क्या कहते हैं?
उत्तर: रूपांतर सीमा - सबडक्शन का अर्थ क्या है?
उत्तर: एक प्लेट का दूसरी प्लेट के नीचे धँसना - भारत और यूरेशिया के अभिसरण से कौन-सी पर्वत श्रृंखला विकसित हुई?
उत्तर: हिमालय - प्रशान्त प्लेट किस प्रकार की प्लेट का प्रमुख उदाहरण है?
उत्तर: मुख्यतः महासागरीय प्लेट - महासागरीय तल का नया निर्माण मुख्यतः कहाँ होता है?
उत्तर: मध्य-महासागरीय कटकों के क्षेत्र में - महासागरीय तल की संरचना का अध्ययन किस सिद्धांत के समर्थन में महत्वपूर्ण रहा?
उत्तर: सागरीय तल विस्तार और प्लेट विवर्तनिकी
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न
- महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत क्या है?
- पेंजिया और पैंथालासा से क्या अभिप्राय है?
- महाद्वीपीय विस्थापन के प्रमुख प्रमाणों की व्याख्या कीजिए।
- गोंडवानालैंड क्या था?
- महाद्वीपों के प्रवाह के लिए वेगनर ने किन बलों का उल्लेख किया?
- सागरीय तल विस्तार सिद्धांत क्या है?
- सागरीय तल विस्तार के प्रमुख प्रमाण बताइए।
- प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत की व्याख्या कीजिए।
- प्लेट सीमाओं के तीन प्रकारों की व्याख्या कीजिए।
- अपसारी और अभिसारी सीमाओं में अंतर बताइए।
- रूपांतर सीमा क्या है?
- हिमालय के निर्माण में प्लेट विवर्तनिकी की भूमिका समझाइए।
- ध्रुवीय भ्रमण से क्या अभिप्राय है?
- महासागरीय तल की प्रमुख स्थलाकृतियों का वर्णन कीजिए।
- महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत और प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत में अंतर बताइए।
परियोजना कार्य
भूकंप से हुई क्षति पर कोलाज
इस अध्याय में भूकंप से हुई क्षति से संबंधित कोलाज बनाने का project work दिया गया है। विद्यार्थी भूकंप से संबंधित समाचार चित्र, मानचित्र, प्रभावित क्षेत्रों की तस्वीरें और अन्य शैक्षणिक सामग्री एकत्र करके विषयवार कोलाज तैयार कर सकते हैं।
कोलाज में भूकंप के कारण होने वाली भवन क्षति, सड़क एवं पुलों की क्षति, भूस्खलन, तटीय प्रभाव तथा राहत एवं बचाव कार्य जैसे पहलुओं को शामिल किया जा सकता है।
Chapter 4 का सारांश
इस अध्याय में पृथ्वी पर महासागरों और महाद्वीपों के वर्तमान वितरण तथा उनके भूवैज्ञानिक विकास का अध्ययन किया गया है। अल्फ्रेड वेगनर के महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के अनुसार वर्तमान महाद्वीप अतीत में पेंजिया नामक विशाल भू-खंड का हिस्सा थे। पेंजिया के विभाजन से लॉरेशिया और गोंडवानालैंड जैसे बड़े भू-खंड विकसित हुए और आगे चलकर वर्तमान महाद्वीप बने।
महाद्वीपों की तटरेखाओं की समानता, चट्टानों की समानता, जीवाश्मों का वितरण, टिलाइट और कुछ खनिज निक्षेप महाद्वीपीय विस्थापन के महत्वपूर्ण प्रमाण हैं। बाद में महासागरीय तल के अध्ययन से सागरीय तल विस्तार की अवधारणा सामने आई।
प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत ने महाद्वीपों और महासागरों की गति को अधिक व्यापक रूप से समझाया। अपसारी, अभिसारी और रूपांतर प्लेट सीमाएँ पृथ्वी की अनेक महत्वपूर्ण भू-वैज्ञानिक घटनाओं से जुड़ी हैं।
अध्याय से जुड़े महत्वपूर्ण लिंक
Chapter 3 – पृथ्वी की आंतरिक संरचना
Bihar Board Class 11 Geography Solutions
निष्कर्ष
Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 4 – महासागरों और महाद्वीपों का वितरण में महाद्वीपों की उत्पत्ति, पेंजिया, गोंडवानालैंड, महाद्वीपीय विस्थापन, सागरीय तल विस्तार और प्लेट विवर्तनिकी जैसे महत्वपूर्ण विषयों को समझाया गया है। परीक्षा की दृष्टि से विद्यार्थियों को विशेष रूप से महाद्वीपीय विस्थापन के प्रमाण, प्लेट सीमाओं के प्रकार, सागरीय तल विस्तार और पेंजिया के विभाजन को अच्छी तरह तैयार करना चाहिए।