Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 6 – भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ में पृथ्वी की सतह को बदलने वाली विभिन्न आंतरिक और बाहरी शक्तियों तथा प्रक्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। इस अध्याय में अंतर्जात बल, बहिर्जात बल, अपक्षय, वृहत् संचलन, अपरदन, परिवहन, निक्षेपण और मृदा निर्माण जैसे महत्वपूर्ण विषयों को समझाया गया है।
भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ पृथ्वी के धरातल को निरंतर बदलती रहती हैं। कुछ शक्तियाँ धरातल पर ऊँचाई और विषमता उत्पन्न करती हैं, जबकि कुछ शक्तियाँ इन विषमताओं को कम करके धरातल को अपेक्षाकृत समतल बनाने का कार्य करती हैं।
भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ क्या हैं?
पृथ्वी के धरातल पर कार्य करने वाली वे प्रक्रियाएँ जिनके कारण भू-आकृतियों का निर्माण, परिवर्तन, क्षरण या विकास होता है, भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ कहलाती हैं। इन प्रक्रियाओं पर पृथ्वी के आंतरिक तथा बाहरी बलों का प्रभाव पड़ता है।
भू-आकृतिक प्रक्रियाओं को मुख्य रूप से दो वर्गों में समझा जाता है:
- अंतर्जनित भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ
- बहिर्जनित भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ
अंतर्जनित एवं बहिर्जनित प्रक्रियाएँ
अंतर्जनित प्रक्रियाएँ
पृथ्वी के आंतरिक भाग से उत्पन्न शक्तियों के कारण होने वाली प्रक्रियाओं को अंतर्जनित प्रक्रियाएँ कहा जाता है। इनसे धरातल पर उत्थान, विकृति और विभिन्न प्रकार की विषमताएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
पटल विरूपण तथा ज्वालामुखीयता अंतर्जनित भू-आकृतिक प्रक्रियाओं के प्रमुख उदाहरण हैं।
बहिर्जनित प्रक्रियाएँ
पृथ्वी की सतह या उसके निकट कार्य करने वाली बाहरी शक्तियों के कारण होने वाली प्रक्रियाओं को बहिर्जनित प्रक्रियाएँ कहा जाता है। इनमें अपक्षय, वृहत् संचलन, अपरदन, परिवहन और निक्षेपण प्रमुख हैं।
इन प्रक्रियाओं के लिए जल, वायु, हिमनद, समुद्री तरंगें तथा भूमिगत जल जैसे कारक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
अंतर्जनित और बहिर्जनित शक्तियों में अंतर
| अंतर्जनित शक्तियाँ | बहिर्जनित शक्तियाँ |
|---|---|
| पृथ्वी के आंतरिक भाग से उत्पन्न होती हैं। | धरातल या उसके निकट बाहरी वातावरण से संबंधित होती हैं। |
| धरातल में उत्थान और विकृति उत्पन्न कर सकती हैं। | धरातल की ऊँचाइयों को कम करने तथा पदार्थों को स्थानांतरित करने में सहायक होती हैं। |
| पटल विरूपण और ज्वालामुखीयता उदाहरण हैं। | अपक्षय, अपरदन और निक्षेपण उदाहरण हैं। |
पृथ्वी भू-आकृतिक प्रक्रियाओं का खेल मैदान क्यों है?
पृथ्वी की सतह पर अंतर्जनित और बहिर्जनित दोनों प्रकार की शक्तियाँ लगातार कार्य करती हैं। अंतर्जनित शक्तियाँ धरातल में ऊँचाई और असमानता पैदा करती हैं, जबकि बहिर्जनित शक्तियाँ इन ऊँचाइयों को काटने, पदार्थों को हटाने और निम्न क्षेत्रों में जमा करने का कार्य करती हैं।
इसी कारण पृथ्वी का धरातल हमेशा परिवर्तनशील रहता है। पर्वतों का निर्माण, उनका अपरदन, घाटियों का विकास तथा मैदानों में अवसादों का निक्षेपण इसी निरंतर प्रक्रिया के उदाहरण हैं।
बहिर्जनित प्रक्रियाओं की ऊर्जा का स्रोत
बहिर्जनित भू-आकृतिक प्रक्रियाओं की ऊर्जा का प्रमुख अंतिम स्रोत सूर्य की ऊष्मा माना जाता है। सूर्य की ऊर्जा वायुमंडलीय परिसंचरण, तापमान और जलचक्र को प्रभावित करती है।
वर्षा, तापमान में परिवर्तन, वाष्पीकरण, हवाएँ तथा जल का प्रवाह जैसे तत्व बाहरी भू-आकृतिक प्रक्रियाओं को प्रभावित करते हैं। इसलिए सूर्य की ऊर्जा अप्रत्यक्ष रूप से अपक्षय, अपरदन, परिवहन और निक्षेपण जैसी प्रक्रियाओं को संचालित करने में योगदान देती है।
अपक्षय क्या है?
धरातल पर या उसके निकट शैलों के अपने स्थान पर ही टूटने, विघटित होने या रासायनिक रूप से परिवर्तित होने की प्रक्रिया को अपक्षय कहते हैं।
अपक्षय को मुख्य रूप से दो प्रकारों में बाँटा जाता है:
- भौतिक अपक्षय
- रासायनिक अपक्षय
जैविक गतिविधियाँ भी शैलों के टूटने और परिवर्तन में योगदान कर सकती हैं।
भौतिक अपक्षय
जब शैलों की रासायनिक संरचना में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए बिना उनके आकार या रूप में टूट-फूट होती है, तो इसे भौतिक अपक्षय कहा जाता है।
तापमान में बार-बार होने वाले परिवर्तन, जल का जमना और पिघलना, दाब में परिवर्तन तथा अन्य भौतिक बल इसके प्रमुख कारण हो सकते हैं।
रासायनिक अपक्षय
जब जल, ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड या अन्य रासायनिक क्रियाओं के कारण शैलों के खनिजों की रासायनिक प्रकृति बदलती है, तो इसे रासायनिक अपक्षय कहते हैं।
रासायनिक अपक्षय की प्रमुख प्रक्रियाओं में विलयन, ऑक्सीकरण, कार्बोनेटीकरण और जलयोजन शामिल हैं।
भौतिक और रासायनिक अपक्षय क्या एक-दूसरे से स्वतंत्र हैं?
भौतिक और रासायनिक अपक्षय को पूरी तरह अलग-अलग प्रक्रियाएँ मानना उचित नहीं है। दोनों प्रक्रियाएँ कई परिस्थितियों में एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं।
भौतिक अपक्षय से चट्टानों का सतह क्षेत्र बढ़ जाता है। इससे जल और वायु को खनिजों के साथ रासायनिक क्रिया करने के लिए अधिक सतह मिलती है। दूसरी ओर रासायनिक परिवर्तन शैल को कमजोर करके उसके भौतिक टूटने को भी आसान बना सकते हैं।
ऑक्सीकरण
जब शैल में उपस्थित कुछ खनिज ऑक्सीजन के साथ रासायनिक प्रतिक्रिया करते हैं, तो इस प्रक्रिया को ऑक्सीकरण कहा जाता है। लौह युक्त खनिजों पर इसका प्रभाव विशेष रूप से देखा जा सकता है।
ऑक्सीकरण के कारण लौह युक्त पदार्थों में लाल, पीले या भूरे रंग के परिवर्तन दिखाई दे सकते हैं।
न्यूनीकरण
न्यूनीकरण ऐसी रासायनिक दशा से संबंधित है जिसमें ऑक्सीजन की उपलब्धता कम होने के कारण खनिजों की रासायनिक अवस्था में परिवर्तन हो सकता है। यह प्रक्रिया विशेष रूप से जल से संतृप्त या कम ऑक्सीजन वाली परिस्थितियों में महत्वपूर्ण हो सकती है।
अपक्षय का महत्व
अपक्षय केवल चट्टानों को तोड़ने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह पृथ्वी की कई प्राकृतिक प्रक्रियाओं का आधार भी है। इसके प्रमुख महत्व निम्नलिखित हैं:
- शैलों को छोटे कणों में बदलता है।
- मृदा निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- अपरदन और वृहत् संचलन के लिए सामग्री उपलब्ध कराता है।
- कुछ खनिज अयस्कों के समृद्धिकरण में योगदान कर सकता है।
- वनस्पति के विकास के लिए आवश्यक मृदा निर्माण में सहायता करता है।
क्या अपक्षय अपरदन के लिए अनिवार्य है?
अपक्षय अपरदन में महत्वपूर्ण योगदान देता है, क्योंकि इससे चट्टानें कमजोर और छोटे कणों में बदलती हैं। लेकिन अपरदन के लिए अपक्षय हमेशा अनिवार्य नहीं है। प्रवाहित जल, हवा, हिमनद और समुद्री तरंगें पहले से मौजूद पदार्थों को सीधे भी परिवहन कर सकती हैं।
वृहत् संचलन क्या है?
गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से शैल, मृदा और मलबे का ढाल की दिशा में नीचे की ओर खिसकना या गिरना वृहत् संचलन कहलाता है। इसमें पदार्थ को स्थानांतरित करने के लिए किसी बाहरी परिवहन माध्यम की आवश्यकता अनिवार्य नहीं होती।
ढाल की तीव्रता, जल की मात्रा, पदार्थों की प्रकृति, वनस्पति की कमी तथा आधार के कमजोर होने जैसी परिस्थितियाँ वृहत् संचलन को प्रभावित कर सकती हैं।
वृहत् संचलन के प्रमुख रूप
- स्खलन
- प्रवाह
- पतन
- अनुप्रस्थ विस्थापन
अवसर्पण और शैल पतन
अवसर्पण
जब ढाल पर स्थित शैल या मलबे का एक भाग किसी सतह के सहारे नीचे की ओर खिसकता है और उसमें घूर्णन जैसी गति भी हो सकती है, तो उसे अवसर्पण कहा जाता है।
शैल पतन
तीव्र ढाल या खड़ी चट्टानी सतह से शैलखंडों का स्वतंत्र रूप से नीचे गिरना शैल पतन कहलाता है।
वृहत् संचलन को प्रभावित करने वाले कारक
वृहत् संचलन के लिए अनेक प्राकृतिक और मानवीय परिस्थितियाँ जिम्मेदार हो सकती हैं। इनमें प्रमुख हैं:
- ढाल की प्रवणता में वृद्धि।
- ढाल के आधार का हटना।
- अधिक वर्षा या जल का प्रवेश।
- चट्टानों की कमजोर संरचना।
- वनस्पति आवरण का कम होना।
- पदार्थों का अतिरिक्त भार।
- मानवीय गतिविधियों के कारण ढाल का अस्थिर होना।
वृहत् संचलन और अपरदन में अंतर
| वृहत् संचलन | अपरदन |
|---|---|
| मुख्य रूप से गुरुत्वाकर्षण के कारण पदार्थ ढाल पर नीचे जाता है। | जल, वायु, हिमनद, तरंग आदि पदार्थों को काटकर हटाते और ले जाते हैं। |
| किसी परिवहन माध्यम की आवश्यकता नहीं होती। | किसी गतिशील भू-आकृतिक कारक की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। |
| भूस्खलन और शैल पतन इसके उदाहरण हैं। | नदी, हवा और हिमनद द्वारा कटाव इसके उदाहरण हैं। |
अपरदन क्या है?
जल, वायु, हिमनद, समुद्री तरंगों आदि के द्वारा धरातलीय पदार्थों को काटकर हटाने और उनका परिवहन करने की प्रक्रिया को अपरदन कहते हैं।
अपरदन के कारण ऊँचे क्षेत्रों का निम्नीकरण होता है और हटाए गए पदार्थ निम्न क्षेत्रों में जाकर जमा हो सकते हैं।
भू-आकृतिक कारक
वे गतिशील प्राकृतिक माध्यम जो धरातल के पदार्थों को हटाने, परिवहन करने और कई परिस्थितियों में उनका निक्षेपण करने में सक्षम होते हैं, भू-आकृतिक कारक कहलाते हैं।
प्रमुख भू-आकृतिक कारकों में निम्न शामिल हैं:
- प्रवाहित जल
- भूमिगत जल
- हिमनद
- वायु
- समुद्री तरंगें
- समुद्री धाराएँ
निक्षेपण क्या है?
जब किसी भू-आकृतिक कारक द्वारा परिवहन किया जा रहा पदार्थ उसकी गति या ऊर्जा में कमी के कारण किसी स्थान पर जमा हो जाता है, तो इस प्रक्रिया को निक्षेपण कहते हैं।
नदियाँ मैदानों में, हिमनद अपनी गति कम होने पर और हवाएँ अपनी वहन क्षमता कम होने पर अवसाद जमा कर सकती हैं।
मृदा निर्माण
मृदा निर्माण एक लंबी और जटिल प्राकृतिक प्रक्रिया है। इसमें अपक्षयित चट्टानी पदार्थ, जलवायु, जैविक गतिविधियाँ, स्थलाकृति, मूल पदार्थ और समय जैसे कारक मिलकर कार्य करते हैं।
मृदा निर्माण के प्रमुख कारक
मृदा निर्माण को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों को निम्न प्रकार समझा जा सकता है:
- जलवायु
- जीव एवं वनस्पति
- स्थलाकृति
- मूल पदार्थ
- समय
जलवायु की भूमिका
जलवायु मृदा निर्माण का महत्वपूर्ण सक्रिय कारक है। तापमान और वर्षा अपक्षय की गति, रासायनिक क्रियाओं तथा जैविक गतिविधियों को प्रभावित करते हैं। पर्याप्त नमी होने पर अनेक रासायनिक प्रक्रियाएँ अधिक प्रभावी हो सकती हैं।
जैविक क्रियाओं की भूमिका
वनस्पति और जीव मृदा निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। मृत वनस्पतियों के अवशेषों से जैव पदार्थ और ह्यूमस बनते हैं। वनस्पति की जड़ें चट्टानों को कमजोर कर सकती हैं तथा सूक्ष्मजीव जैविक पदार्थों के अपघटन में योगदान देते हैं।
केंचुए, चींटियाँ, दीमक और अन्य जीव मृदा को उलट-पलटकर उसकी संरचना तथा वायु और जल के संचरण को प्रभावित कर सकते हैं।
समय की भूमिका
मृदा निर्माण में समय का विशेष महत्व है। किसी मृदा को विकसित होने में लंबा समय लग सकता है। नई जमा हुई मृदा अपेक्षाकृत युवा हो सकती है, जबकि लंबे समय तक विभिन्न मृदा-निर्माण प्रक्रियाओं के प्रभाव में रहने वाली मृदा में अधिक विकसित स्तर दिखाई दे सकते हैं।
मृदा निर्माण प्रक्रिया और मृदा निर्माण कारक में अंतर
| मृदा निर्माण प्रक्रिया | मृदा निर्माण कारक |
|---|---|
| वे प्रक्रियाएँ जिनसे मृदा का विकास होता है। | वे परिस्थितियाँ जो इन प्रक्रियाओं को प्रभावित करती हैं। |
| अपक्षय, जैविक परिवर्तन आदि इसमें शामिल हैं। | जलवायु, जीव, स्थलाकृति, मूल पदार्थ और समय प्रमुख कारक हैं। |
गुरुत्वाकर्षण का भू-आकृतिक प्रक्रियाओं में महत्व
गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी की सतह पर पदार्थों के संचलन को नियंत्रित करने वाली मूलभूत शक्तियों में से एक है। ऊँचाई से निम्न स्तर की ओर पदार्थों का संचलन गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से होता है।
वृहत् संचलन में इसकी भूमिका प्रत्यक्ष दिखाई देती है। इसी कारण शैल, मृदा और मलबा ढाल की दिशा में नीचे की ओर खिसक सकते हैं।
पटल विरूपण (Diastrophism)
पृथ्वी की भूपर्पटी को प्रभावित करने वाली ऐसी अंतर्जनित प्रक्रियाएँ जिनके कारण भूपर्पटी में उत्थान, अवनमन, वलन, भ्रंशन या अन्य प्रकार की विकृति उत्पन्न हो सकती है, पटल विरूपण के अंतर्गत आती हैं।
पर्वत निर्माण, महाद्वीपीय उत्थान-अवनमन, भूकंपीय गतिविधियाँ और प्लेटों की गति से संबंधित कई घटनाएँ भूपर्पटी में परिवर्तन उत्पन्न कर सकती हैं।
पर्वतन और महाद्वीपीय उत्थान
पर्वतन ऐसी प्रक्रियाओं से संबंधित है जिनके कारण पर्वतों का निर्माण होता है। दूसरी ओर, बड़े भू-भाग के व्यापक उत्थान या अवनमन को महाद्वीपीय स्तर की प्रक्रिया के रूप में समझा जाता है।
इन प्रक्रियाओं के कारण पृथ्वी की भूपर्पटी में ऊँचाई और संरचनात्मक परिवर्तन उत्पन्न होते हैं।
भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ और भू-आकृतिक कारक में अंतर
| भू-आकृतिक प्रक्रिया | भू-आकृतिक कारक |
|---|---|
| वह क्रिया या प्रक्रिया जिसके द्वारा धरातल में परिवर्तन होता है। | वह गतिशील माध्यम जो पदार्थ को हटाता, ले जाता या जमा करता है। |
| अपक्षय, अपरदन और निक्षेपण इसके उदाहरण हैं। | जल, वायु, हिमनद और तरंगें इसके उदाहरण हैं। |
महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर
प्रश्न 1. अपक्षय पृथ्वी पर जैव विविधता के लिए किस प्रकार महत्वपूर्ण है?
उत्तर: अपक्षय चट्टानों को छोटे कणों में बदलने तथा मृदा निर्माण के लिए आधार सामग्री उपलब्ध कराने में सहायता करता है। मृदा वनस्पति के विकास के लिए आवश्यक माध्यम है और वनस्पति तथा अन्य जीवों के विकास से जैव विविधता को आधार मिलता है।
प्रश्न 2. वृहत् संचलन के लिए कौन-कौन सी परिस्थितियाँ अनुकूल होती हैं?
उत्तर: तीव्र ढाल, कमजोर या असंगठित पदार्थ, अधिक वर्षा, मूसलाधार वर्षा, वनस्पति का अभाव, ढाल के आधार का कटना और अतिरिक्त भार जैसी परिस्थितियाँ वृहत् संचलन को बढ़ावा दे सकती हैं।
प्रश्न 3. बहिर्जनित भू-आकृतिक कारक कौन-कौन से हैं?
उत्तर: प्रवाहित जल, भूमिगत जल, हिमनद, वायु, समुद्री तरंगें और समुद्री धाराएँ प्रमुख बहिर्जनित भू-आकृतिक कारक हैं। ये अपक्षय, अपरदन, परिवहन और निक्षेपण जैसी प्रक्रियाओं में भाग लेते हैं।
प्रश्न 4. क्या मृदा निर्माण में अपक्षय आवश्यक है?
उत्तर: हाँ, सामान्यतः मृदा निर्माण के लिए अपक्षय अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे चट्टानें छोटे कणों और खनिज पदार्थों में बदलती हैं। यही पदार्थ आगे जैविक गतिविधियों और अन्य प्रक्रियाओं के साथ मिलकर मृदा निर्माण में योगदान देते हैं।
प्रश्न 5. अपक्षय और अपरदन में क्या अंतर है?
उत्तर: अपक्षय में चट्टानें अपने स्थान पर टूटती या रासायनिक रूप से बदलती हैं, जबकि अपरदन में धरातलीय पदार्थों को हटाकर उनका परिवहन किया जाता है। इसलिए अपक्षय मुख्यतः स्थान पर होने वाली प्रक्रिया है, जबकि अपरदन में पदार्थ का स्थानांतरण शामिल होता है।
प्रश्न 6. अंतर्जात और बहिर्जात बल क्या हैं?
उत्तर: पृथ्वी के आंतरिक भाग से उत्पन्न होने वाले बल अंतर्जात बल कहलाते हैं। इसके विपरीत धरातल तथा उसके निकट बाहरी वातावरण से संबंधित शक्तियाँ बहिर्जात बल कहलाती हैं। दोनों मिलकर पृथ्वी के धरातल को निरंतर बदलते हैं।
प्रश्न 7. वृहत् संचलन के तीन रूप कौन-कौन से हैं?
उत्तर: स्रोत में वृहत् संचलन के रूपों में अनुप्रस्थ विस्थापन, प्रवाह और स्खलन का उल्लेख किया गया है। इनके अतिरिक्त शैल पतन जैसी प्रक्रियाएँ भी ढाल पर पदार्थों के गुरुत्वीय संचलन से संबंधित हैं।
प्रश्न 8. मृदा निर्माण में जलवायु की क्या भूमिका है?
उत्तर: तापमान और वर्षा अपक्षय तथा रासायनिक और जैविक प्रक्रियाओं की गति को प्रभावित करते हैं। वर्षा से मृदा में नमी आती है और अनेक रासायनिक क्रियाओं के लिए जल उपलब्ध होता है। इस प्रकार जलवायु मृदा निर्माण की गति और प्रकृति को प्रभावित करती है।
प्रश्न 9. ऑक्सीकरण क्या है?
उत्तर: जब खनिजों में उपस्थित कुछ तत्व, विशेषकर लौह, ऑक्सीजन के साथ प्रतिक्रिया करते हैं तो इसे ऑक्सीकरण कहा जाता है। लौह युक्त खनिजों के ऑक्सीकरण से चट्टानों और मृदा में लाल, पीले या भूरे रंग के परिवर्तन दिखाई दे सकते हैं।
प्रश्न 10. अपक्षय का क्या महत्व है?
उत्तर: अपक्षय चट्टानों को तोड़कर मृदा निर्माण के लिए सामग्री उपलब्ध कराता है। यह अपरदन और वृहत् संचलन के लिए भी सामग्री तैयार करता है तथा कुछ खनिज अयस्कों के समृद्धिकरण में योगदान कर सकता है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. “हमारी पृथ्वी भू-आकृतिक प्रक्रियाओं के दो विरोधात्मक वर्गों का खेल मैदान है।” समझाइए।
उत्तर: पृथ्वी का धरातल दो प्रमुख प्रकार की शक्तियों से निरंतर प्रभावित होता है—अंतर्जनित और बहिर्जनित शक्तियाँ। अंतर्जनित शक्तियों का संबंध पृथ्वी के आंतरिक भाग से है। ये भूपर्पटी में उत्थान, अवनमन, वलन, भ्रंशन और अन्य संरचनात्मक परिवर्तन उत्पन्न कर सकती हैं।
इसके विपरीत बहिर्जनित शक्तियाँ धरातल पर कार्य करती हैं। अपक्षय, वृहत् संचलन, अपरदन, परिवहन और निक्षेपण इनके प्रमुख कार्य हैं। ये ऊँचे क्षेत्रों को काटकर पदार्थों को निम्न क्षेत्रों की ओर ले जाती हैं और वहाँ जमा करती हैं।
इस प्रकार अंतर्जनित शक्तियाँ धरातल में विषमता और ऊँचाई उत्पन्न करती हैं, जबकि बहिर्जनित शक्तियाँ उन विषमताओं को कम करने की दिशा में कार्य करती हैं। इन दोनों के लगातार परस्पर प्रभाव के कारण पृथ्वी की सतह हमेशा परिवर्तनशील रहती है।
प्रश्न 2. “बहिर्जनित भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ अपनी अंतिम ऊर्जा सूर्य की गर्मी से प्राप्त करती हैं।” व्याख्या कीजिए।
उत्तर: बहिर्जनित प्रक्रियाओं के संचालन में सूर्य की ऊर्जा का महत्वपूर्ण योगदान है। सूर्य पृथ्वी की सतह और वायुमंडल को गर्म करता है। तापमान में अंतर के कारण वायुमंडलीय परिसंचरण और जलचक्र सक्रिय रहते हैं। वर्षा, नदियों का प्रवाह, वायु की गति और हिम के बनने-पिघलने जैसी प्रक्रियाएँ इसी ऊर्जा व्यवस्था से जुड़ी हैं।
तापमान और नमी अपक्षय की गति को प्रभावित करते हैं। जल और वायु अपरदन तथा परिवहन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वनस्पति का विकास भी जलवायु और सूर्य की ऊर्जा से प्रभावित होता है और वनस्पति फिर भू-आकृतिक प्रक्रियाओं को प्रभावित करती है। इसलिए बहिर्जनित प्रक्रियाओं की अंतिम ऊर्जा के स्रोत के रूप में सूर्य की ऊष्मा को महत्वपूर्ण माना जाता है।
प्रश्न 3. क्या भौतिक और रासायनिक अपक्षय एक-दूसरे से स्वतंत्र हैं? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर: भौतिक और रासायनिक अपक्षय को पूरी तरह स्वतंत्र प्रक्रियाएँ नहीं माना जा सकता। दोनों एक-दूसरे को प्रभावित कर सकती हैं। भौतिक अपक्षय से चट्टान छोटे टुकड़ों में टूटती है और उसकी सतह का क्षेत्रफल बढ़ जाता है। इससे जल और वायु को खनिजों के साथ रासायनिक प्रतिक्रिया करने का अधिक अवसर मिलता है।
दूसरी ओर रासायनिक अपक्षय चट्टान के खनिजों को कमजोर कर सकता है, जिससे उसका भौतिक टूटना आसान हो जाता है। जलयोजन, ऑक्सीकरण, कार्बोनेटीकरण और विलयन जैसी रासायनिक प्रक्रियाएँ जल की उपस्थिति में अधिक प्रभावी हो सकती हैं। इसलिए दोनों प्रक्रियाएँ कई प्राकृतिक परिस्थितियों में साथ-साथ कार्य करती हैं।
प्रश्न 4. मृदा निर्माण प्रक्रियाओं और मृदा निर्माण कारकों में अंतर बताइए। जलवायु और जैविक क्रियाओं की भूमिका समझाइए।
उत्तर: मृदा निर्माण प्रक्रियाएँ वे प्रक्रियाएँ हैं जिनके द्वारा मूल पदार्थ धीरे-धीरे मृदा में परिवर्तित होते हैं। इसके विपरीत मृदा निर्माण कारक वे परिस्थितियाँ हैं जो इन प्रक्रियाओं की गति और स्वरूप को प्रभावित करती हैं।
मृदा निर्माण में जलवायु, स्थलाकृति, मूल पदार्थ, जीव-जंतु और समय प्रमुख कारक हैं। इनमें जलवायु का विशेष महत्व है। तापमान और वर्षा अपक्षय, रासायनिक क्रियाओं और जैविक गतिविधियों को प्रभावित करते हैं। वर्षा मृदा में नमी उपलब्ध कराती है और कई रासायनिक प्रतिक्रियाओं में सहायता करती है।
जैविक क्रियाएँ भी मृदा निर्माण में महत्वपूर्ण हैं। वनस्पति के अवशेषों से ह्यूमस बनता है। सूक्ष्मजीव जैव पदार्थों के अपघटन में योगदान देते हैं। केंचुए, चींटियाँ और अन्य जीव मृदा को उलट-पलटकर उसकी संरचना को प्रभावित करते हैं। इस प्रकार जलवायु और जीव दोनों मृदा विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)
निम्नलिखित में से कौन-सी एक अनुक्रमिक प्रक्रिया है?
(A) निक्षेपण
(B) ज्वालामुखीयता
(C) पटल विरूपण
(D) अपरदनउत्तर: (D) अपरदन
जलयोजन प्रक्रिया मुख्य रूप से किस प्रकार के पदार्थों को प्रभावित करती है?
(A) ग्रेनाइट
(B) क्वार्ट्ज
(C) क्ले
(D) लवणउत्तर: (D) लवण
मलबा अवधाव की घाटी किससे संबंधित है?
(A) भूस्खलन
(B) तीव्र प्रवाही वृहत् संचलन
(C) मंद प्रवाही वृहत् संचलन
(D) अवतलन/धसकनउत्तर: (B) तीव्र प्रवाही वृहत् संचलन
भू-आकार की घाटी किस क्षेत्र में बनती है?
(A) बाढ़ क्षेत्र में
(B) चूना क्षेत्र में
(C) प्रौढ़ नदी क्षेत्र में
(D) हिमानी नदी क्षेत्र मेंउत्तर: (C) प्रौढ़ नदी क्षेत्र में
अति महत्वपूर्ण एक-पंक्ति प्रश्न
- भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ: वे प्रक्रियाएँ जो पृथ्वी के धरातल की आकृति और संरचना को बदलती हैं।
- अंतर्जात बल: पृथ्वी के आंतरिक भाग से उत्पन्न बल।
- बहिर्जात बल: धरातल पर या उसके निकट बाहरी वातावरण से संबंधित बल।
- अपक्षय: चट्टानों का अपने स्थान पर टूटना या रासायनिक परिवर्तन।
- अपरदन: धरातलीय पदार्थों का हटना और परिवहन।
- वृहत् संचलन: गुरुत्वाकर्षण के कारण ढाल पर पदार्थों का संचलन।
- निक्षेपण: परिवहित पदार्थों का किसी स्थान पर जमा होना।
- पटल विरूपण: भूपर्पटी में संरचनात्मक परिवर्तन उत्पन्न करने वाली अंतर्जनित प्रक्रिया।
- मृदा निर्माण का प्रमुख सक्रिय कारक: जलवायु।
- बहिर्जनित प्रक्रियाओं की अंतिम ऊर्जा: सूर्य की ऊष्मा।
परियोजना कार्य
प्रश्न: अपने आसपास उपस्थित भू-आकृतिक/उच्चावच तथा पदार्थों के आधार पर जलवायु, संभावित अपक्षय प्रक्रियाओं एवं मृदा के तत्वों और विशेषताओं का अध्ययन कीजिए।
उत्तर/परियोजना करने का तरीका: विद्यार्थी अपने क्षेत्र का प्रत्यक्ष निरीक्षण करके परियोजना तैयार कर सकते हैं। इसमें क्षेत्र की स्थलाकृति, प्रमुख चट्टानें, मिट्टी का रंग और बनावट, वर्षा की स्थिति, वनस्पति, ढाल तथा दिखाई देने वाली अपक्षय या अपरदन प्रक्रियाओं को दर्ज किया जा सकता है।
परियोजना में स्थान का नाम, निरीक्षण की तारीख, स्थल का संक्षिप्त विवरण, मिट्टी और चट्टान के नमूने/फोटो तथा निष्कर्ष शामिल करना उपयोगी रहेगा।
अध्याय का सारांश
भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ पृथ्वी के धरातल को निरंतर बदलने वाली प्राकृतिक प्रक्रियाएँ हैं। इन्हें समझने के लिए अंतर्जनित और बहिर्जनित शक्तियों का अध्ययन आवश्यक है। अंतर्जनित शक्तियाँ पृथ्वी के अंदर से उत्पन्न होती हैं और भूपर्पटी में उत्थान तथा विकृति जैसी प्रक्रियाओं को प्रभावित करती हैं। बहिर्जनित प्रक्रियाएँ धरातल पर कार्य करती हैं और अपक्षय, वृहत् संचलन, अपरदन, परिवहन तथा निक्षेपण जैसी प्रक्रियाओं के माध्यम से भू-दृश्य को बदलती हैं।
इस अध्याय में अपक्षय, भौतिक एवं रासायनिक अपक्षय, वृहत् संचलन, अपरदन, गुरुत्वाकर्षण, पटल विरूपण और मृदा निर्माण विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। मृदा निर्माण में जलवायु, जीव, स्थलाकृति, मूल पदार्थ और समय जैसे कारक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
अगला अध्याय
Chapter 7 – भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास
Bihar Board Class 11 Geography के सभी अध्याय
निष्कर्ष
Bihar Board Class 11 Geography Chapter 6 – भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ को अच्छी तरह समझने के लिए अंतर्जात और बहिर्जात शक्तियों के अंतर, अपक्षय और अपरदन में अंतर, वृहत् संचलन, मृदा निर्माण के कारक तथा पटल विरूपण जैसे विषयों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। परीक्षा में परिभाषा, अंतर, कारण और प्रक्रिया आधारित प्रश्न पूछे जा सकते हैं, इसलिए केवल परिभाषाएँ याद करने के बजाय प्रत्येक प्रक्रिया को उदाहरण के साथ समझना अधिक उपयोगी रहेगा।