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Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 7 भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 7 – भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास में पृथ्वी के धरातल पर बनने वाली विभिन्न भू-आकृतियों और उनके विकास की प्रक्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। इस अध्याय में नदियों, हिमनदों, भूमिगत जल, पवन तथा समुद्री तरंगों द्वारा निर्मित स्थलरूपों के साथ-साथ पर्वत, पठार और मैदान जैसी प्रमुख भू-आकृतियों को समझाया गया है।

यह अध्याय परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इसमें V आकार की घाटी, U आकार की घाटी, कैनियन, कार्स्ट स्थलाकृति, लैपिज, सर्क, हिमोढ़, जलोढ़ मैदान, डेल्टा, तटीय मैदान और लोएस मैदान जैसे विषयों से प्रश्न पूछे जा सकते हैं।

Table of Contents

भू-आकृतिक विज्ञान क्या है?

भू-आकृतिक विज्ञान भू-आकृतियों की उत्पत्ति, विकास और उनके स्वरूप का अध्ययन करने वाला विज्ञान है। पृथ्वी की सतह पर दिखाई देने वाले पर्वत, पठार, मैदान, घाटियाँ, झीलें, तटीय स्थलरूप और मरुस्थलीय स्थलरूप सभी भू-आकृतिक अध्ययन के महत्वपूर्ण विषय हैं।

भू-आकृतियों का विकास एक निरंतर प्रक्रिया है। अंतर्जात शक्तियाँ धरातल में उत्थान और संरचनात्मक परिवर्तन उत्पन्न करती हैं, जबकि बहिर्जात कारक अपरदन, परिवहन और निक्षेपण के माध्यम से इन आकृतियों को बदलते रहते हैं।

पृथ्वी की प्रमुख भू-आकृतियाँ

पृथ्वी की उच्चावच संरचना को विभिन्न स्तरों में समझा जाता है। सबसे बड़े स्तर पर महाद्वीप और महासागरीय द्रोणियाँ आती हैं। इसके बाद पर्वत, पठार और मैदान जैसी प्रमुख भू-आकृतियाँ महत्वपूर्ण हैं।

  • पर्वत – आसपास के क्षेत्र से काफी ऊँचे और सामान्यतः अधिक ढाल वाले भू-भाग।
  • पठार – अपेक्षाकृत ऊँचा तथा ऊपर से विस्तृत और सामान्यतः समतल भू-भाग।
  • मैदान – अपेक्षाकृत समतल और कम ढाल वाले विस्तृत भू-भाग।

एकरूपता का नियम

चार्ल्स लायल से संबंधित एकरूपता के नियम के अनुसार प्रकृति में कार्य करने वाले भौतिक और रासायनिक नियम समय के साथ मूल रूप से समान रहते हैं। वर्तमान में दिखाई देने वाली भूगर्भीय प्रक्रियाओं को समझकर अतीत की भूगर्भीय घटनाओं को समझने में सहायता मिलती है।

नदी द्वारा निर्मित भू-आकृतियाँ

प्रवाहित जल पृथ्वी की सतह को बदलने वाला अत्यंत महत्वपूर्ण भू-आकृतिक कारक है। नदी अपने मार्ग में अपरदन, परिवहन और निक्षेपण तीनों कार्य करती है। नदी की ढाल और वेग में परिवर्तन के साथ उसके द्वारा निर्मित भू-आकृतियाँ भी बदलती रहती हैं।

V आकार की घाटी

नदी की ऊपरी या युवा अवस्था में जब नदी का अधोमुखी कटाव अधिक प्रभावी होता है, तब नदी अपनी घाटी को नीचे की ओर काटती है। इससे संकरी और गहरी V आकार की घाटी विकसित हो सकती है।

गॉर्ज और कैनियन

बहुत गहरी और संकरी घाटी, जिसकी दीवारें खड़ी होती हैं, गॉर्ज कहलाती है। यदि गहरी घाटी की दीवारों पर सीढ़ीनुमा खड़े ढाल दिखाई दें, तो उसे कैनियन कहा जाता है।

जलप्रपात

जब नदी के मार्ग में कठोर और मुलायम चट्टानों की संरचना या ऊँचाई में अचानक अंतर होता है, तो नदी का जल ऊँचाई से नीचे गिर सकता है। इस प्रकार जलप्रपात का निर्माण होता है।

विसर्प

नदी के मध्य और निचले भागों में जब पार्श्व अपरदन और निक्षेपण अधिक प्रभावी होते हैं, तो नदी का मार्ग घुमावदार हो जाता है। इन घुमावदार लूपों को विसर्प कहा जाता है।

गोखुर झील

नदी के विसर्प का घुमाव समय के साथ इतना अधिक हो सकता है कि नदी अपने पुराने घुमावदार मार्ग को काटकर अपेक्षाकृत सीधा मार्ग बना ले। पुराने घुमावदार भाग में जल अलग होकर अर्धचंद्राकार झील बना सकता है, जिसे गोखुर झील कहा जाता है।

बाढ़ का मैदान

नदी में बाढ़ आने पर जल नदी की घाटी के आसपास फैल जाता है और अपने साथ लाई गई महीन जलोढ़ सामग्री को जमा करता है। लंबे समय में इन निक्षेपों से बाढ़ के मैदान विकसित होते हैं।

डेल्टा

जब नदी समुद्र या झील में प्रवेश करते समय अपनी गति और वहन क्षमता खो देती है, तो उसके द्वारा लाई गई अवसादी सामग्री का निक्षेपण होने लगता है। इससे नदी के मुहाने पर विकसित त्रिकोणीय या अन्य प्रकार का निक्षेपित भू-भाग डेल्टा कहलाता है।

नदी निक्षेपण

नदी का वेग कम होने पर वह अपने साथ लाए हुए भारी और मोटे कणों को पहले जमा करती है। महीन कण अपेक्षाकृत अधिक दूरी तक परिवहन हो सकते हैं। नदी द्वारा किए गए इस जमाव को नदी निक्षेपण कहा जाता है।

नदी निक्षेपण से जलोढ़ मैदान, बाढ़ मैदान, प्राकृतिक तटबंध, विसर्प, गोखुर झील और डेल्टा जैसी भू-आकृतियों का विकास हो सकता है।

हिमनद द्वारा निर्मित भू-आकृतियाँ

भूमि पर प्राकृतिक रूप से संचित विशाल हिमराशि को हिमानी कहा जाता है। जब हिमराशि गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में धीरे-धीरे ढाल की ओर गतिशील होती है, तो वह हिमनद के रूप में कार्य करती है।

हिमनद अपने भार तथा उसमें फँसे चट्टानी पदार्थों के कारण धरातल का अपरदन करता है। इसके कारण पर्वतीय क्षेत्रों में विशिष्ट हिमानी भू-आकृतियाँ बनती हैं।

U आकार की घाटी

हिमनद जब पहले से मौजूद नदी घाटी में आगे बढ़ता है, तो वह घाटी के तल और किनारों का व्यापक अपरदन करता है। इससे संकरी V आकार की घाटी चौड़ी और गहरी होकर U आकार की घाटी में बदल सकती है।

सर्क

हिमनद के उद्गम क्षेत्र के पास बनने वाले गहरे, विस्तृत और कटोरे या अर्धवृत्ताकार आकार के गर्त को सर्क कहा जाता है। यह हिमानी अपरदन से बनने वाली महत्वपूर्ण भू-आकृति है।

हॉर्न

जब किसी पर्वतीय क्षेत्र में कई ओर से हिमानी अपरदन होता है, तो बीच का कठोर पर्वतीय भाग नुकीली चोटी के रूप में बच सकता है। ऐसी नुकीली पर्वतीय चोटी को हॉर्न कहा जाता है।

हिमोढ़

हिमनद द्वारा लाए गए शैलखंड, मलबे और अन्य अवसादों के निक्षेप से बनने वाले कटक या जमाव को हिमोढ़ कहा जाता है। इनके विभिन्न रूप हिमनद की स्थिति और गति पर निर्भर करते हैं।

एस्कर

हिमनद के नीचे या उसके भीतर बहने वाले जल द्वारा लाए गए बालू, बजरी और अन्य पदार्थों के निक्षेप से लंबी, संकरी तथा घुमावदार कटक जैसी भू-आकृति बन सकती है, जिसे एस्कर कहते हैं।

हिमानी धौत मैदान

हिमनद के पिघलने से निकलने वाले जल द्वारा लाए गए अवसादों के निक्षेप से बने विस्तृत मैदान को हिमानी धौत मैदान या Outwash Plain कहा जाता है।

चूना-पत्थर क्षेत्र और कार्स्ट स्थलाकृति

चूना-पत्थर मुख्य रूप से कैल्शियम कार्बोनेट से संबंधित चट्टान है। आर्द्र परिस्थितियों में जल और कार्बन डाइऑक्साइड से संबंधित रासायनिक क्रियाओं के कारण चूना-पत्थर का घुलना प्रभावी हो सकता है।

चूना-पत्थर या डोलोमाइट वाले क्षेत्रों में भूमिगत जल द्वारा घुलन और निक्षेपण की प्रक्रियाओं से विकसित विशिष्ट स्थलरूपों को कार्स्ट स्थलाकृति कहा जाता है। Source में कार्स्ट स्थलरूपों के उदाहरण के रूप में कुंड, घोलरंध्र, लैपिज और चूना-पत्थर चबूतरे आदि का उल्लेख है।

लैपिज

चूना-पत्थर के क्षेत्रों में घुलन क्रिया के कारण विकसित अनियमित धरातल पर तीखे कटक और खाँच दिखाई दे सकते हैं। इस प्रकार के स्थलरूप को लैपिज कहा जाता है।

घोलरंध्र

भूमिगत जल द्वारा चूना-पत्थर के घुलने से धरातल पर बनने वाले छोटे या बड़े गर्त को घोलरंध्र या Sinkhole कहा जाता है।

युवाला

जब कई घोलरंध्र या डोलाइन आपस में मिलकर अधिक विस्तृत और लंबा अवसाद बनाते हैं, तो उससे युवाला जैसी भू-आकृति विकसित हो सकती है।

कंदराएँ

चूना-पत्थर के अंदर भूमिगत जल द्वारा घुलन क्रिया से विस्तृत भूमिगत मार्ग और कंदराएँ विकसित हो सकती हैं। इनके भीतर बाद में निक्षेपण द्वारा विभिन्न आकृतियाँ बन सकती हैं।

मरुस्थलीय भू-आकृतियाँ

मरुस्थलीय क्षेत्रों में पवन एक महत्वपूर्ण भू-आकृतिक कारक है। पवन अपवाहन, घर्षण और परिवहन के माध्यम से धरातल को प्रभावित करती है। हालांकि मरुस्थल में केवल पवन ही कार्य नहीं करती; वर्षा और सतही बहाव भी अपरदन में योगदान दे सकते हैं। Source भी इस बात पर जोर देता है कि मरुस्थल में वर्षा और वृष्टि-धोवन द्वारा भी पदार्थ का परिवहन हो सकता है।

अपवाहन गर्त

पवन द्वारा महीन कणों के हटाए जाने से धरातल पर बनने वाले उथले गर्तों को अपवाहन गर्त या वातगर्त कहा जाता है।

बालूवात्या

जब हवा द्वारा उड़ाए गए बालू के कण चट्टानों की सतह से टकराते हैं, तो घर्षण के कारण चट्टान का अपरदन होता है। इस प्रक्रिया को बालूवात्या कहा जाता है।

छत्रक शैल

पवन द्वारा उड़ाए गए बालू के कण चट्टान के निचले भाग को अधिक घिस सकते हैं। लंबे समय में इससे चट्टान का ऊपरी भाग अपेक्षाकृत चौड़ा और निचला भाग संकरा दिखाई दे सकता है। ऐसी आकृति को छत्रक शैल कहा जाता है।

बालू के टीले

पवन द्वारा परिवहित बालू के किसी स्थान पर जमा होने से बालू के टीले बनते हैं। ये मरुस्थलीय क्षेत्रों की प्रमुख निक्षेपित भू-आकृतियों में शामिल हैं।

समुद्री तरंगों द्वारा निर्मित भू-आकृतियाँ

समुद्री तरंगें तटों पर अपरदन, परिवहन और निक्षेपण करती हैं। तरंगों की शक्ति, तट की ढाल, चट्टानों की प्रकृति और समुद्री परिस्थितियाँ तटीय भू-आकृतियों के विकास को प्रभावित करती हैं।

समुद्री गुफा

समुद्री तरंगें जब तटीय चट्टानों की कमजोर दरारों और संधियों पर लगातार प्रहार करती हैं, तो अपरदन बढ़ सकता है और धीरे-धीरे समुद्री गुफा विकसित हो सकती है।

समुद्री मेहराब

यदि समुद्री गुफा का अपरदन दोनों ओर से आगे बढ़ता रहे और चट्टानी भाग आर-पार कट जाए, तो समुद्री मेहराब का निर्माण हो सकता है।

समुद्री स्तंभ

समुद्री मेहराब की छत का कोई भाग टूटकर गिरने के बाद अलग खड़ा चट्टानी स्तंभ बच सकता है। इसे समुद्री स्तंभ कहा जाता है।

पुलिन

तट पर नदी या समुद्री तरंगों द्वारा लाए गए रेत और अन्य पदार्थों के जमाव से बनने वाली अस्थायी स्थलाकृति को पुलिन कहा जाता है।

लैगून

जब तट के निकट रोधिका या स्पिट किसी खाड़ी के मुख को आंशिक या पर्याप्त रूप से अवरुद्ध कर देते हैं, तो उसके पीछे अलग जल निकाय विकसित हो सकता है, जिसे लैगून कहा जाता है। Source में भी लैगून के निर्माण को रोधिका और स्पिट द्वारा खाड़ी के मार्ग को अवरुद्ध करने से जोड़ा गया है।

वृहत् संचलन और उसके प्रकार

गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से ढाल पर चट्टान, मृदा और मलबे का नीचे की ओर संचलन वृहत् संचलन कहलाता है। यह धीमी गति से होने वाली मृदा सर्पण प्रक्रिया से लेकर अचानक होने वाले शैलपात और भूस्खलन तक हो सकता है।

मृदा सर्पण

ढाल पर मृदा का बहुत धीमी गति से लंबे समय तक नीचे की ओर खिसकना मृदा सर्पण कहलाता है।

मृदा प्रवाह

जब जल से संतृप्त मृदा और महीन पदार्थ ढाल की दिशा में प्रवाहित होने लगते हैं, तो इसे मृदा प्रवाह कहा जाता है।

पंक प्रवाह

जब जल की मात्रा बहुत अधिक हो और महीन खनिज पदार्थ तेजी से प्रवाहित हों, तो उसे पंक प्रवाह कहा जाता है। यह नदी मार्गों में भी तेजी से आगे बढ़ सकता है।

शैलपात

खड़ी चट्टानी ढाल से चट्टान या शैलखंड का गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में नीचे गिरना शैलपात कहलाता है।

शैल स्खलन

जब शैलखंड ढाल पर नीचे की ओर लुढ़कते या खिसकते हैं, तो इसे शैल स्खलन कहा जाता है।

अवसर्पण

जब कोई शैलखंड घूर्णन या वक्राकार सतह के सहारे नीचे की ओर खिसकता है, तो उसे अवसर्पण कहा जाता है।

V आकार और U आकार की घाटी में अंतर

V आकार की घाटीU आकार की घाटी
मुख्यतः नदी के अधोमुखी कटाव से विकसित होती है।मुख्यतः हिमनद के अपरदन से विकसित होती है।
घाटी अपेक्षाकृत संकरी और गहरी होती है।घाटी अधिक चौड़ी और U जैसी होती है।
नदी घाटियों के ऊपरी भाग में सामान्य है।हिमानी क्षेत्रों में सामान्य है।

यांत्रिक और रासायनिक अपक्षय में अंतर

यांत्रिक अपक्षयरासायनिक अपक्षय
चट्टान का भौतिक रूप से टूटना।चट्टान के खनिजों में रासायनिक परिवर्तन।
रासायनिक संरचना में प्रमुख परिवर्तन आवश्यक नहीं।खनिजों की रासायनिक प्रकृति बदल सकती है।
तापमान परिवर्तन और तुषार-क्रिया महत्वपूर्ण हो सकती है।विलयन, ऑक्सीकरण और कार्बोनेटीकरण महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

जलोढ़ पंख और डेल्टा में अंतर

जलोढ़ पंखडेल्टा
अक्सर पर्वतीय ढाल से मैदान में नदी के निकलने के स्थान पर बनता है।मुख्यतः नदी के समुद्र या झील में प्रवेश करने के निकट बनता है।
पंखाकार आकृति विकसित हो सकती है।अक्सर त्रिकोणीय या शाखायुक्त निक्षेपित क्षेत्र विकसित होता है।
नदी की गति अचानक कम होने पर निक्षेपण महत्वपूर्ण होता है।मुहाने पर नदी की वहन क्षमता कम होने से अवसाद जमा होते हैं।

भू-आकृतियों के विकास में चट्टानों की भूमिका

किसी क्षेत्र की भू-आकृतियों पर वहाँ उपस्थित चट्टानों की प्रकृति का महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। चट्टानों की कठोरता, संधियाँ, पारगम्यता और संरंध्रता यह निर्धारित कर सकती हैं कि अपरदन और अपक्षय किस प्रकार कार्य करेंगे। Source में भी इन चार गुणों को विशेष रूप से महत्वपूर्ण बताया गया है।

उदाहरण के लिए, आर्द्र क्षेत्रों में चूना-पत्थर पर रासायनिक अपक्षय प्रभावी हो सकता है। ठंडे क्षेत्रों में तुषार-क्रिया चट्टानों को तोड़ सकती है। शुष्क क्षेत्रों में कुछ ग्रेनाइट क्षेत्रों में विशिष्ट गुम्बदाकार आकृतियाँ विकसित हो सकती हैं।

पर्वतों के प्रकार

विवर्तनिक संचरण से बनने वाले पर्वतों को सामान्यतः विभिन्न संरचनात्मक प्रकारों में समझा जाता है। Source में विशेष रूप से वलित पर्वत और खंड पर्वत का उल्लेख किया गया है।

वलित पर्वत

भूपर्पटी की चट्टानों पर संपीड़न बलों के प्रभाव से परतों में वलन उत्पन्न होने पर वलित पर्वत विकसित हो सकते हैं। हिमालय, आल्प्स और रॉकी जैसे पर्वत युवा वलित पर्वतों के उदाहरण के रूप में पढ़े जाते हैं।

खंड पर्वत

भूपर्पटी में भ्रंशन के कारण कुछ भू-खंड ऊपर उठ सकते हैं और कुछ नीचे धँस सकते हैं। इस प्रकार की संरचनात्मक प्रक्रिया से खंड पर्वत विकसित हो सकते हैं।

युवा और प्राचीन वलित पर्वत

युवा वलित पर्वतप्राचीन वलित पर्वत
भूगर्भीय दृष्टि से अपेक्षाकृत नए पर्वत।बहुत पुराने पर्वत।
अधिक ऊँचे और तीव्र ढाल वाले हो सकते हैं।लंबे समय के अपरदन से अपेक्षाकृत निम्न हो सकते हैं।
हिमालय, आल्प्स, रॉकी उदाहरण हैं।यूराल और अप्लेशियन उदाहरण हैं।

मैदान क्या हैं?

मैदान अपेक्षाकृत समतल और कम ढाल वाले विस्तृत भू-भाग होते हैं। ये अपरदन, निक्षेपण या पृथ्वी की आंतरिक हलचलों के परिणामस्वरूप विकसित हो सकते हैं। Source में मैदानों को प्रमुख भू-आकृतियों में शामिल किया गया है और इनके निर्माण के तीन प्रमुख आधार—अपरदन, निक्षेपण और पृथ्वी की हलचल—बताए गए हैं।

मैदानों के प्रमुख प्रकार

1. जलोढ़ मैदान

नदियों द्वारा लाई गई जलोढ़ सामग्री के व्यापक निक्षेप से जलोढ़ मैदान बनते हैं। गंगा-सतलुज का मैदान इसका प्रमुख उदाहरण है।

2. अपरदन के मैदान

लंबे समय तक जल, हिम और वायु के अपरदन से ऊँचे भू-भागों का निम्नीकरण होकर अपरदन के मैदान विकसित हो सकते हैं।

3. हिमानी मैदान

हिमनद तथा उसके पिघले हुए जल द्वारा लाए गए अवसादों के निक्षेप से हिमानी मैदान बन सकते हैं।

4. सरोवरीय मैदान

झीलों के भरने, सूखने या उनकी तलछट के जमा होने से विकसित मैदानों को सरोवरीय मैदान कहा जाता है।

5. तटीय मैदान

समुद्र के किनारे तलछट के निक्षेप, समुद्र के पीछे हटने या तटीय भू-भाग के उत्थान जैसी प्रक्रियाओं से तटीय मैदान विकसित हो सकते हैं।

6. लोएस मैदान

पवन द्वारा महीन धूल और गाद जैसे पदार्थों को दूर तक ले जाकर जमा करने से लोएस मैदान विकसित हो सकते हैं। Source में उत्तर-पश्चिमी चीन के शांसी और सैंसी क्षेत्रों को उदाहरण के रूप में दिया गया है।

मैदानों का मानव के लिए महत्व

  • समतल धरातल के कारण आवास के लिए अनुकूल होते हैं।
  • कई मैदानों में उपजाऊ मिट्टी पाई जाती है।
  • कृषि के विकास में सहायता मिलती है।
  • सड़क और रेल जैसे परिवहन साधनों का निर्माण अपेक्षाकृत आसान होता है।
  • बड़े नगर और औद्योगिक केंद्र विकसित हो सकते हैं।
  • कई प्राचीन सभ्यताओं का विकास नदी मैदानों में हुआ है।

महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर

प्रश्न 1. भू-आकृतिक विज्ञान किसे कहते हैं?

उत्तर: भू-आकृतिक विज्ञान भू-आकृतियों की उत्पत्ति, विकास और स्वरूप का अध्ययन करने वाला विज्ञान है। इसमें पर्वत, पठार, मैदान, घाटी और विभिन्न अपरदन एवं निक्षेपण स्थलरूपों का अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 2. ‘U’ आकार की घाटी किस प्रकार बनती है?

उत्तर: हिमनद अपने भार और साथ लाए चट्टानी पदार्थों के कारण घाटी के तल और किनारों का अपरदन करता है। लंबे समय तक हिमानी अपरदन से संकरी नदी घाटी चौड़ी होकर U आकार की घाटी में बदल सकती है।

प्रश्न 3. लैगून कैसे बनता है?

उत्तर: जब रोधिका या स्पिट किसी खाड़ी के मुख को समुद्र से अलग या अवरुद्ध कर देता है, तो उसके पीछे स्थित जल निकाय लैगून के रूप में विकसित हो सकता है।

प्रश्न 4. पुलिन क्या है?

उत्तर: नदी या समुद्री तरंगों द्वारा लाए गए रेत और अन्य अवसादों के तट पर जमा होने से बनने वाली अस्थायी स्थलाकृति को पुलिन कहा जाता है।

प्रश्न 5. तुषार-क्रिया क्या है?

उत्तर: ठंडे और ऊँचाई वाले क्षेत्रों में चट्टानों की दरारों में मौजूद जल बार-बार जमता और पिघलता है। इस प्रक्रिया से दरारें चौड़ी होती हैं और चट्टान टूट सकती है। इसे तुषार-क्रिया कहते हैं।

प्रश्न 6. सॉलीफ्लक्शन क्या है?

उत्तर: ठंडे, वृक्ष-विहीन क्षेत्रों में जल से संतृप्त ऊपरी मृदा का ढाल के सहारे बहुत धीमी गति से नीचे की ओर बहना या खिसकना सॉलीफ्लक्शन कहलाता है।

प्रश्न 7. भू-द्रोणी क्या है?

उत्तर: लंबी, संकरी और अपेक्षाकृत गहरी समुद्री या झील बेसिन जैसी निम्न संरचना को भू-द्रोणी कहा जाता है। ऐसी द्रोणियों में अवसाद जमा हो सकते हैं और भूगर्भीय प्रक्रियाओं से आगे चलकर पर्वत निर्माण से संबंधित हो सकते हैं।

प्रश्न 8. मैदानों का मानव के लिए क्या महत्व है?

उत्तर: मैदानों का समतल धरातल आवास, कृषि, परिवहन, उद्योग और नगर विकास के लिए अनुकूल होता है। नदी द्वारा बने अनेक मैदानों में उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी पाई जाती है। इसलिए मैदान मानव सभ्यता के विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रहे हैं।

प्रश्न 9. नदी निक्षेपण कैसे होता है?

उत्तर: जब नदी का वेग कम होता है, तो उसकी वहन क्षमता घटती है और वह अपने साथ लाए हुए अवसादों को जमा करने लगती है। भारी कण पहले और महीन कण बाद में जमा हो सकते हैं। इस प्रक्रिया से बाढ़ मैदान, डेल्टा और अन्य निक्षेपित स्थलरूप बनते हैं।

प्रश्न 10. कार्स्ट स्थलाकृति क्या है?

उत्तर: चूना-पत्थर या डोलोमाइट वाले क्षेत्रों में भूमिगत जल द्वारा घुलन और निक्षेपण से विकसित विशिष्ट भू-आकृतियों के समूह को कार्स्ट स्थलाकृति कहा जाता है। घोलरंध्र, लैपिज और कंदराएँ इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. विभिन्न प्रकार के वृहत् क्षरण की व्याख्या कीजिए।

उत्तर: गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से ढाल पर शैल, मृदा और मलबे का नीचे की ओर संचलन वृहत् क्षरण या वृहत् संचलन से संबंधित है। इसकी गति बहुत धीमी भी हो सकती है और अचानक बहुत तेज भी।

मृदा सर्पण में मृदा लंबे समय तक बहुत धीमी गति से ढाल की ओर खिसकती है। जल से संतृप्त मृदा और रेगोलिथ जब अधिक तेजी से ढाल की ओर बहते हैं, तो मृदा प्रवाह बन सकता है। जब जल की मात्रा अधिक हो और महीन पदार्थ तेजी से प्रवाहित हों, तो पंक प्रवाह विकसित हो सकता है।

खड़ी चट्टानों से शैलखंडों का गिरना शैलपात तथा शैलखंडों का ढाल पर खिसकना या लुढ़कना शैल स्खलन से संबंधित है। वक्राकार सतह के सहारे शैलखंड के नीचे की ओर खिसकने को अवसर्पण कहा जाता है। इस प्रकार वृहत् क्षरण के अनेक रूप ढाल, जल, चट्टान की प्रकृति और गुरुत्वाकर्षण से प्रभावित होते हैं।

प्रश्न 2. प्रवाहित जल, हिमनद, पवन और समुद्री तरंगों के भू-आकृतिक कार्यों का वर्णन कीजिए।

उत्तर: प्रवाहित जल, हिमनद, पवन और समुद्री तरंगें प्रमुख बहिर्जनित भू-आकृतिक कारक हैं। ये अपरदन, परिवहन और निक्षेपण के माध्यम से पृथ्वी की सतह को बदलते हैं।

प्रवाहित जल धरातल पर परत के रूप में या निश्चित नदी मार्ग में बहता है। यह घाटियों को काटता है तथा आगे चलकर विसर्प, बाढ़ मैदान और डेल्टा जैसी भू-आकृतियाँ बना सकता है।

हिमनद अपने भार और चट्टानी मलबे के कारण पर्वतीय धरातल का प्रभावी अपरदन करते हैं। इनके कारण U आकार की घाटी, सर्क, हॉर्न और हिमोढ़ जैसी आकृतियाँ विकसित होती हैं।

पवन विशेषकर शुष्क क्षेत्रों में अपवाहन और घर्षण द्वारा अपरदन करती है तथा बालू के टीलों और लोएस जैसे निक्षेपित स्थलरूपों का निर्माण कर सकती है।

समुद्री तरंगें तटों का अपरदन करती हैं और समुद्री गुफा, मेहराब तथा अन्य तटीय आकृतियों के निर्माण में योगदान देती हैं। तरंगों द्वारा लाए गए पदार्थों के निक्षेप से पुलिन आदि भी बन सकते हैं।

प्रश्न 3. चूना-पत्थर वाले क्षेत्र आर्द्र और शुष्क जलवायु में अलग-अलग व्यवहार क्यों करते हैं?

उत्तर: चूना-पत्थर कैल्शियम कार्बोनेट से संबंधित चट्टान है और जल की उपस्थिति में घुलनशीलता के कारण आर्द्र क्षेत्रों में रासायनिक अपक्षय से अधिक प्रभावित हो सकता है। जल और कार्बन डाइऑक्साइड से संबंधित रासायनिक क्रियाएँ चूना-पत्थर के घुलने को बढ़ा सकती हैं।

इससे भूमिगत जल का प्रवाह बढ़ता है और घोलरंध्र, लैपिज, कंदराएँ तथा अन्य कार्स्ट स्थलरूप विकसित हो सकते हैं। इसके विपरीत शुष्क क्षेत्रों में जल की कमी के कारण ऐसी रासायनिक घुलन प्रक्रियाएँ अपेक्षाकृत कम प्रभावी हो सकती हैं। इसलिए चूना-पत्थर वाले क्षेत्रों में जलवायु का प्रभाव भू-आकृति विकास पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

प्रश्न 4. हिमनद ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों को निम्न पहाड़ियों और मैदानों में कैसे बदलते हैं?

उत्तर: हिमनद अपने भार और उसमें मौजूद चट्टानी पदार्थों के कारण धरातल का प्रभावी अपरदन करते हैं। चलते हुए हिमनद के नीचे और किनारों पर फँसे शैलखंड चट्टानी सतह को घिसते और काटते हैं। इससे पर्वतीय घाटियाँ चौड़ी और गहरी होती हैं तथा ऊँचे भू-भाग का धीरे-धीरे निम्नीकरण होता है।

लंबे समय तक हिमानी अपरदन जारी रहने पर पर्वतीय विभाजक और ढाल कम हो सकते हैं। हिमनद के पीछे हटने या पिघलने के बाद उसके द्वारा लाया गया मलबा विभिन्न स्थानों पर जमा होता है। हिमानी निक्षेप और पिघले जल द्वारा लाए गए अवसादों से मैदान विकसित हो सकते हैं। इस प्रकार हिमनद अपरदन और निक्षेपण दोनों के माध्यम से पर्वतीय भू-दृश्य को बदलते हैं।

प्रश्न 5. मैदान क्या हैं? मैदानों का वर्गीकरण कीजिए।

उत्तर: मैदान अपेक्षाकृत समतल और कम ढाल वाले विस्तृत भू-भाग होते हैं। इनका निर्माण विभिन्न प्राकृतिक प्रक्रियाओं से हो सकता है। प्रमुख रूप से मैदान अपरदन, निक्षेपण और पृथ्वी की आंतरिक हलचलों से विकसित हो सकते हैं।

रचना और निर्माण प्रक्रिया के आधार पर प्रमुख मैदान हैं—

  1. जलोढ़ मैदान – नदियों द्वारा अवसाद के निक्षेप से।
  2. अपरदन के मैदान – लंबे समय तक अपरदन से ऊँचे भू-भाग के निम्नीकरण से।
  3. हिमानी मैदान – हिमनद और हिमानी जल के निक्षेप से।
  4. सरोवरीय मैदान – झीलों के भरने या सूखने से।
  5. तटीय मैदान – तटीय क्षेत्रों में निक्षेपण या समुद्र के पीछे हटने आदि से।
  6. लोएस मैदान – पवन द्वारा महीन पदार्थों के निक्षेप से।

गंगा-सतलुज का मैदान जलोढ़ मैदान का प्रमुख उदाहरण है, जबकि उत्तर-पश्चिमी चीन में लोएस मैदान पाए जाते हैं।

बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)

  1. स्थलरूप विकास की किस अवस्था में अधोमुख कटाव प्रमुख होता है?

    (A) तरुणावस्था
    (B) प्रथम प्रौढ़ावस्था
    (C) अन्तिम प्रौढ़ावस्था
    (D) वृद्धावस्था

    उत्तर: (A) तरुणावस्था

  2. सीढ़ीनुमा खड़ी ढालों वाली गहरी घाटी को क्या कहा जाता है?

    (A) U-आकार की घाटी
    (B) अंधी घाटी
    (C) गॉर्ज
    (D) कैनियन

    उत्तर: (D) कैनियन

  3. किस प्रदेश में रासायनिक अपक्षय यांत्रिक अपक्षय की अपेक्षा अधिक प्रभावी हो सकता है?

    (A) शुष्क प्रदेश
    (B) हिमनद प्रदेश
    (C) चूना-पत्थर प्रदेश
    (D) अत्यधिक ठंडे प्रदेश

    उत्तर: (C) चूना-पत्थर प्रदेश

  4. लैपिज किसे कहा जाता है?

    (A) छोटे से मध्यम आकार के उथले गर्त
    (B) कीपाकार स्थलरूप
    (C) जल के टपकने से बने स्थलरूप
    (D) तीखे कटक और खाँच वाला अनियमित धरातल

    उत्तर: (A) छोटे से मध्यम आकार के उथले गर्त

  5. गहरे, विस्तृत गर्त या बेसिन, जिनकी दीवारें खड़ी होती हैं, क्या कहलाते हैं?

    (A) सर्क
    (B) पाश्विक हिमोढ़
    (C) घाटी हिमनद
    (D) एस्कर

    उत्तर: (A) सर्क

  6. U आकार की घाटी किससे बनती है?

    (A) बाढ़ क्षेत्र
    (B) चूना क्षेत्र
    (C) प्रौढ़ नदी क्षेत्र
    (D) हिमानी क्षेत्र

    उत्तर: (D) हिमानी क्षेत्र

अति महत्वपूर्ण एक-पंक्ति प्रश्न

  • भू-आकृतिक विज्ञान: भू-आकृतियों की उत्पत्ति और विकास का अध्ययन।
  • V आकार की घाटी: नदी के अधोमुखी अपरदन से विकसित घाटी।
  • U आकार की घाटी: हिमनद के अपरदन से विकसित घाटी।
  • कैनियन: सीढ़ीनुमा खड़ी दीवारों वाली गहरी घाटी।
  • सर्क: हिमानी अपरदन से बना कटोरेनुमा गर्त।
  • लैपिज: चूना-पत्थर क्षेत्र का अनियमित, कटक-खाँच वाला स्थलरूप।
  • लैगून: रोधिका या स्पिट द्वारा अलग हुई तटीय जलराशि।
  • सॉलीफ्लक्शन: ठंडे क्षेत्रों में जलसंतृप्त मृदा का धीमा प्रवाह।
  • डेल्टा: नदी के मुहाने पर अवसाद के निक्षेप से बनने वाली भू-आकृति।
  • जलोढ़ मैदान: नदियों द्वारा लाए गए अवसादों से निर्मित मैदान।
  • लोएस मैदान: पवन द्वारा महीन पदार्थों के निक्षेप से निर्मित मैदान।

परियोजना कार्य

प्रश्न: अपने क्षेत्र के आसपास के स्थलरूप, उनके पदार्थ तथा जिन प्रक्रियाओं से वे निर्मित हुए हैं, उनकी पहचान कीजिए।

परियोजना करने का तरीका: विद्यार्थी अपने आसपास के क्षेत्र का प्रत्यक्ष निरीक्षण करें। किसी नदी, तालाब, पहाड़ी, मैदान, ढाल, मिट्टी या चट्टानी क्षेत्र का चयन करके उसकी स्थिति, प्रमुख पदार्थ, स्थलरूप और संभावित निर्माण प्रक्रिया लिखें। परियोजना में फोटो, स्थान का नाम, निरीक्षण की तारीख और निष्कर्ष शामिल किए जा सकते हैं। Source में भी इस परियोजना को स्वयं क्षेत्र का निरीक्षण करके करने के लिए कहा गया है।

अध्याय का सारांश

भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास अध्याय में पृथ्वी के धरातल पर बनने वाली प्रमुख भू-आकृतियों और उनके निर्माण में कार्य करने वाली प्रक्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। नदियाँ अपरदन, परिवहन और निक्षेपण के माध्यम से V आकार की घाटी, गॉर्ज, कैनियन, विसर्प, बाढ़ मैदान और डेल्टा जैसी भू-आकृतियाँ बनाती हैं।

हिमनद U आकार की घाटी, सर्क, हॉर्न, हिमोढ़ और हिमानी धौत मैदान जैसी भू-आकृतियाँ बनाते हैं। चूना-पत्थर वाले क्षेत्रों में भूमिगत जल की घुलन क्रिया से कार्स्ट स्थलाकृति विकसित होती है। मरुस्थलों में पवन अपरदन और निक्षेपण करती है, जबकि समुद्री तरंगें तटीय भू-आकृतियों के निर्माण और परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

मैदानों को जलोढ़, अपरदन, हिमानी, सरोवरीय, तटीय और लोएस मैदानों के रूप में समझा जाता है। मानव जीवन के लिए मैदान विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यहाँ कृषि, आवास, परिवहन, उद्योग और नगरों का विकास अपेक्षाकृत आसान होता है।

पिछला और अगला अध्याय

Chapter 6 – भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ

Chapter 8 – वायुमंडल का संघटन तथा संरचना

Bihar Board Class 11 Geography के सभी अध्याय

निष्कर्ष

Bihar Board Class 11 Geography Chapter 7 – भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास में भू-आकृतियों के निर्माण और विकास को समझने के लिए नदी, हिमनद, भूमिगत जल, पवन तथा समुद्री तरंगों की भूमिका महत्वपूर्ण है। परीक्षा की तैयारी करते समय विशेष रूप से V और U आकार की घाटी, कैनियन, सर्क, कार्स्ट स्थलाकृति, लैपिज, लैगून, डेल्टा, जलोढ़ मैदान, हिमानी मैदान और लोएस मैदान को अच्छी तरह तैयार करें।

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