Bihar Board Class 11 Geography Chapter 9 – सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान में पृथ्वी को प्राप्त होने वाली सौर ऊर्जा, सूर्यताप, पार्थिव विकिरण, पृथ्वी और वायुमंडल के ऊष्मा संतुलन तथा पृथ्वी पर तापमान के वितरण का अध्ययन किया जाता है। इस अध्याय में यह समझाया गया है कि अलग-अलग अक्षांशों, ऊँचाइयों, स्थल एवं जल क्षेत्रों तथा विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियों के कारण तापमान में अंतर क्यों पाया जाता है।
इस पोस्ट में Bihar Board Class 11 Geography Chapter 9 के महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर, बहुविकल्पीय प्रश्न, अतिलघु उत्तरीय प्रश्न, लघु उत्तरीय प्रश्न, दीर्घ उत्तरीय प्रश्न और परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण बिंदुओं को सरल भाषा में समझाया गया है।
अध्याय 9 : सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान
सौर विकिरण क्या है?
सूर्य से पृथ्वी तक ऊर्जा विद्युत-चुंबकीय विकिरण के रूप में पहुँचती है। सूर्य पृथ्वी के लिए ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है। पृथ्वी की सतह को प्राप्त होने वाली सौर ऊर्जा पृथ्वी के तापमान, वायुमंडलीय परिसंचरण, मौसम तथा जलवायु को प्रभावित करती है।
सूर्यातप क्या है?
पृथ्वी की सतह द्वारा प्राप्त होने वाली सौर विकिरण ऊर्जा को सूर्यातप कहा जाता है। सूर्यातप की मात्रा सभी स्थानों पर समान नहीं होती। अक्षांश, सूर्य की किरणों का कोण, दिन की अवधि, वायुमंडलीय दशाएँ तथा सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी आदि इसके वितरण को प्रभावित करते हैं।
सूर्य की किरणों का कोण और सूर्यातप
जब सूर्य की किरणें धरातल पर लगभग लंबवत पड़ती हैं, तो ऊर्जा अपेक्षाकृत छोटे क्षेत्र में केंद्रित होती है। इसके विपरीत, तिरछी किरणें अधिक बड़े क्षेत्र में फैल जाती हैं। इसलिए समान ऊर्जा बड़े क्षेत्र में वितरित होने के कारण प्रति इकाई क्षेत्र प्राप्त ऊर्जा कम हो जाती है।
इसी कारण सामान्यतः भूमध्यरेखीय क्षेत्रों में सूर्यातप अधिक तथा ध्रुवों की ओर कम पाया जाता है।
वायुमंडल का सूर्यातप पर प्रभाव
सूर्य से आने वाली ऊर्जा को वायुमंडल से होकर पृथ्वी की सतह तक पहुँचना पड़ता है। इस दौरान गैसों, जलवाष्प, धूलकण और बादलों के कारण सौर विकिरण का कुछ भाग अवशोषित, परावर्तित अथवा प्रकीर्णित हो जाता है। इसलिए धरातल तक पहुँचने वाली ऊर्जा की मात्रा में परिवर्तन होता है।
पार्थिव विकिरण
पृथ्वी सूर्य से प्राप्त ऊर्जा को अवशोषित करने के बाद स्वयं भी ऊर्जा का विकिरण करती है। पृथ्वी द्वारा उत्सर्जित यह ऊर्जा मुख्यतः दीर्घ तरंगों के रूप में होती है। इसे पार्थिव या स्थलीय विकिरण कहा जाता है।
पार्थिव विकिरण वायुमंडल के तापमान को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पृथ्वी की सतह द्वारा छोड़ी गई दीर्घ-तरंगीय ऊर्जा का एक भाग वायुमंडल द्वारा अवशोषित किया जाता है। इसी कारण वायुमंडल को मुख्यतः नीचे से गर्म होने वाला माना जाता है।
सूर्यातप और पार्थिव विकिरण में अंतर
| आधार | सूर्यातप | पार्थिव विकिरण |
|---|---|---|
| स्रोत | सूर्य | पृथ्वी की सतह |
| तरंग | मुख्यतः लघु तरंग | मुख्यतः दीर्घ तरंग |
| दिशा | सूर्य से पृथ्वी की ओर | पृथ्वी से वायुमंडल और अंतरिक्ष की ओर |
| महत्त्व | पृथ्वी को ऊर्जा प्रदान करता है | पृथ्वी-वायुमंडल के ताप संतुलन में सहायता करता है |
पृथ्वी का ऊष्मा संतुलन
पृथ्वी लगातार सूर्य से ऊर्जा प्राप्त करती है और दूसरी ओर विकिरण के माध्यम से ऊर्जा अंतरिक्ष में वापस भेजती है। लंबे समय के औसत में प्राप्त और खोई हुई ऊर्जा के बीच संतुलन बना रहता है। इसी को ऊष्मा संतुलन या ऊष्मा बजट कहा जाता है।
पृथ्वी द्वारा प्राप्त सौर ऊर्जा का कुछ भाग धरातल तक पहुँचता है, कुछ वायुमंडल और बादलों द्वारा अवशोषित होता है तथा कुछ भाग परावर्तित या प्रकीर्णित होकर अंतरिक्ष में वापस चला जाता है।
एल्बिडो
किसी सतह पर आने वाले सौर विकिरण के उस भाग को, जो परावर्तित होकर वापस चला जाता है, एल्बिडो से संबंधित किया जाता है। बर्फ, बादल और अन्य चमकीली सतहें सौर ऊर्जा का अपेक्षाकृत अधिक भाग परावर्तित कर सकती हैं।
वायुमंडल कैसे गर्म होता है?
वायुमंडल सूर्य की आने वाली लघु-तरंगीय ऊर्जा को सीधे पूरी तरह अवशोषित करके गर्म नहीं होता। सूर्य की ऊर्जा पृथ्वी की सतह तक पहुँचती है और धरातल को गर्म करती है। गर्म धरातल दीर्घ-तरंगीय विकिरण उत्सर्जित करता है। वायुमंडल इस ऊर्जा के एक भाग को अवशोषित करता है और इस प्रकार वायुमंडल गर्म होता है।
ऊष्मा के स्थानांतरण की प्रमुख विधियाँ
1. चालन
चालन में ऊष्मा का स्थानांतरण संपर्क के माध्यम से होता है। धरातल से लगी वायु धरातल के संपर्क के कारण गर्म हो सकती है। वायुमंडल की निचली परतों के ताप में चालन की भूमिका होती है।
2. संवहन
जब गर्म वायु ऊपर उठती है और ठंडी वायु नीचे आकर उसका स्थान लेती है, तो ऊर्ध्वाधर वायु संचलन के माध्यम से ऊष्मा का स्थानांतरण होता है। इसे संवहन कहा जाता है।
3. अभिवहन
वायु के क्षैतिज संचलन के माध्यम से ऊष्मा का स्थानांतरण अभिवहन कहलाता है। मध्य अक्षांशों में मौसम के तापीय परिवर्तन में इसका विशेष महत्त्व है।
तापमान क्या है?
तापमान किसी वस्तु या स्थान की गर्मी अथवा ठंडक की स्थिति को व्यक्त करने वाली राशि है। भौगोलिक अध्ययन में किसी स्थान के तापमान का वितरण जलवायु और मौसम को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
पृथ्वी पर तापमान का वितरण
पृथ्वी की सतह पर तापमान समान नहीं है। अलग-अलग स्थानों पर तापमान में अंतर के कई कारण हैं। प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं:
- भूमध्य रेखा से दूरी अर्थात् अक्षांश
- समुद्र तल से ऊँचाई
- समुद्र से दूरी
- प्रचलित पवनें
- महासागरीय धाराएँ
- स्थल और जल का विभेदी तापन
- भूतल की प्रकृति
- स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियाँ
तापमान को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक
1. अक्षांश
भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर जाने पर सामान्यतः तापमान कम होता जाता है। इसका प्रमुख कारण सूर्य की किरणों के कोण में परिवर्तन है। निम्न अक्षांशों में सूर्य की किरणें अधिक सीधी पड़ती हैं, जबकि उच्च अक्षांशों में वे अधिक तिरछी होती हैं।
2. समुद्र तल से ऊँचाई
सामान्यतः ऊँचाई बढ़ने के साथ तापमान घटता है। इसका कारण यह है कि वायुमंडल मुख्यतः पृथ्वी की सतह से प्राप्त ऊर्जा के कारण गर्म होता है। इसलिए ऊँचाई पर स्थित पर्वतीय क्षेत्र सामान्यतः मैदानी क्षेत्रों की तुलना में ठंडे होते हैं।
3. समुद्र से दूरी
समुद्र के निकट स्थित क्षेत्रों में तापमान का वार्षिक अंतर सामान्यतः कम होता है। समुद्र से दूर महाद्वीपीय आंतरिक भागों में तापमान का अंतर अधिक पाया जाता है।
4. प्रचलित पवनें
समुद्र से आने वाली पवनें किसी क्षेत्र के तापमान और नमी को प्रभावित कर सकती हैं। स्थल से आने वाली पवनें अलग प्रकार का प्रभाव डालती हैं। इसलिए पवनों की दिशा किसी क्षेत्र की जलवायु को प्रभावित करती है।
5. महासागरीय धाराएँ
गर्म महासागरीय धाराएँ तटीय क्षेत्रों के तापमान को बढ़ाने में सहायक हो सकती हैं, जबकि ठंडी धाराएँ तटीय तापमान को कम कर सकती हैं। इनके ऊपर से गुजरने वाली पवनें भी तटीय जलवायु को प्रभावित करती हैं।
6. स्थल और जल का विभेदी तापन
स्थल और जल समान गति से गर्म और ठंडे नहीं होते। स्थल अपेक्षाकृत जल्दी गर्म और ठंडा होता है, जबकि जल धीरे-धीरे गर्म तथा ठंडा होता है। इसी कारण समुद्र तटीय क्षेत्रों की जलवायु अधिक सम होती है, जबकि महाद्वीपों के आंतरिक भागों में तापमान का अंतर अधिक हो सकता है।
समताप रेखाएँ
समान तापमान वाले स्थानों को मिलाने वाली काल्पनिक रेखाओं को समताप रेखाएँ कहा जाता है। जलवायु मानचित्रों पर तापमान के वितरण को प्रदर्शित करने के लिए इन रेखाओं का उपयोग किया जाता है।
समताप रेखाएँ सामान्यतः अक्षांश रेखाओं के समान दिशा में दिखाई देती हैं, लेकिन स्थल और जल के असमान वितरण तथा अन्य कारकों के कारण इनमें वक्रता उत्पन्न हो सकती है।
समताप रेखाओं की प्रमुख विशेषताएँ
- ये समान तापमान वाले स्थानों को जोड़ती हैं।
- इनकी सामान्य दिशा पूर्व-पश्चिम होती है।
- दक्षिणी गोलार्द्ध में ये अपेक्षाकृत अधिक नियमित दिखाई देती हैं।
- स्थल और जल के अलग-अलग तापीय व्यवहार के कारण इनमें मोड़ आते हैं।
- ऋतुओं के परिवर्तन के साथ इनकी स्थिति भी बदलती है।
- तापमान वितरण के मानचित्रों में इनका विशेष महत्त्व है।
तापमान का क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर वितरण
क्षैतिज वितरण
पृथ्वी की सतह पर अलग-अलग अक्षांशों और स्थानों में तापमान के अंतर को तापमान का क्षैतिज वितरण कहा जाता है। इसे समताप रेखाओं की सहायता से मानचित्र पर दिखाया जाता है।
ऊर्ध्वाधर वितरण
ऊँचाई के साथ तापमान में होने वाले परिवर्तन को तापमान का ऊर्ध्वाधर वितरण कहा जाता है। सामान्य दशाओं में ऊँचाई बढ़ने के साथ तापमान घटता है।
तापमान व्युत्क्रमण
सामान्यतः ऊँचाई बढ़ने पर तापमान घटता है। लेकिन जब इसके विपरीत ऊँचाई बढ़ने के साथ तापमान बढ़ने लगे, तो इस स्थिति को तापमान व्युत्क्रमण कहा जाता है।
तापमान व्युत्क्रमण की अनुकूल परिस्थितियाँ
- लंबी और शांत रातें
- स्वच्छ आकाश
- शांत वायु
- ठंडी और शुष्क वायु
- हिमाच्छादित धरातल
तापमान व्युत्क्रमण के प्रमुख प्रकार
- धरातलीय व्युत्क्रमण
- गत्यात्मक व्युत्क्रमण
- वायु अपवाह से संबंधित व्युत्क्रमण
तापमान व्युत्क्रमण के दौरान निचली वायुमंडलीय परतों में कोहरा और प्रदूषकों का जमाव जैसी स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।
दैनिक तापांतर
किसी स्थान के एक दिन के अधिकतम और न्यूनतम तापमान के बीच के अंतर को दैनिक तापांतर कहते हैं। तटीय क्षेत्रों में यह सामान्यतः कम और महाद्वीपों के आंतरिक तथा शुष्क क्षेत्रों में अधिक हो सकता है।
वार्षिक तापांतर
किसी स्थान के सबसे गर्म और सबसे ठंडे महीनों के औसत तापमान के बीच के अंतर को वार्षिक तापांतर कहा जाता है। महाद्वीपों के आंतरिक भागों में वार्षिक तापांतर सामान्यतः अधिक पाया जाता है।
महासागरीय जल के तापमान को प्रभावित करने वाले कारक
- अक्षांश
- प्रचलित पवनें
- महासागरीय धाराएँ
- लवणता
- जल की गहराई और मिश्रण
अध्याय 9 के महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर
प्रश्न 1. पृथ्वी पर तापमान का असमान वितरण क्यों पाया जाता है?
उत्तर: पृथ्वी की सतह पर सूर्य की किरणें समान कोण से नहीं पड़ती हैं। इसके अतिरिक्त अक्षांश, ऊँचाई, समुद्र से दूरी, स्थल-जल का वितरण, पवनें और महासागरीय धाराएँ तापमान को प्रभावित करती हैं। इसलिए अलग-अलग क्षेत्रों में तापमान समान नहीं पाया जाता।
प्रश्न 2. पृथ्वी पर तापमान के वितरण को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक कौन-कौन से हैं?
उत्तर: प्रमुख कारकों में अक्षांश, समुद्र तल से ऊँचाई, समुद्र से दूरी, प्रचलित पवनें, महासागरीय धाराएँ, स्थल और जल का विभेदी तापन तथा स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियाँ शामिल हैं।
प्रश्न 3. सूर्यताप क्या है?
उत्तर: पृथ्वी की सतह द्वारा प्राप्त होने वाली सौर विकिरण ऊर्जा को सूर्यताप कहा जाता है। इसकी मात्रा सूर्य की किरणों के कोण, दिन की अवधि, अक्षांश और वायुमंडलीय परिस्थितियों से प्रभावित होती है।
प्रश्न 4. समताप रेखाएँ क्या हैं?
उत्तर: समान तापमान वाले स्थानों को जोड़ने वाली काल्पनिक रेखाओं को समताप रेखाएँ कहते हैं। इनका प्रयोग तापमान के भौगोलिक वितरण को मानचित्र पर प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है।
प्रश्न 5. अभिवहन क्या है?
उत्तर: वायु के क्षैतिज संचलन द्वारा ऊष्मा के एक स्थान से दूसरे स्थान तक स्थानांतरण को अभिवहन कहते हैं। यह विशेष रूप से मध्य अक्षांशों के मौसम परिवर्तन में महत्वपूर्ण है।
प्रश्न 6. संवहन क्या है?
उत्तर: गर्म वायु के ऊपर उठने और ठंडी वायु के नीचे आने से ऊष्मा का ऊर्ध्वाधर स्थानांतरण होता है। इस प्रक्रिया को संवहन कहते हैं।
प्रश्न 7. पार्थिव विकिरण क्या है?
उत्तर: पृथ्वी द्वारा अवशोषित सौर ऊर्जा के बाद उत्सर्जित की जाने वाली दीर्घ-तरंगीय ऊर्जा को पार्थिव या स्थलीय विकिरण कहा जाता है।
प्रश्न 8. तापमान व्युत्क्रमण क्या है?
उत्तर: सामान्यतः ऊँचाई बढ़ने पर तापमान घटता है। जब इसके विपरीत ऊँचाई बढ़ने के साथ तापमान बढ़ने लगे, तो इस स्थिति को तापमान व्युत्क्रमण कहा जाता है।
दीर्घ उत्तरीय महत्वपूर्ण प्रश्न
प्रश्न 1. तापमान व्युत्क्रमण की व्याख्या कीजिए तथा इसके जलवायुविक महत्त्व को बताइए।
उत्तर: सामान्य वायुमंडलीय दशाओं में ऊँचाई बढ़ने पर तापमान कम होता है। लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में धरातल के पास की वायु ठंडी और उसके ऊपर की वायु अपेक्षाकृत गर्म हो जाती है। ऐसी स्थिति को तापमान व्युत्क्रमण कहते हैं।
तापमान व्युत्क्रमण के लिए लंबी रातें, स्वच्छ आकाश, शांत वायु, ठंडी एवं शुष्क वायु तथा हिमाच्छादित धरातल अनुकूल परिस्थितियाँ हैं। यह स्थिति पर्वतीय घाटियों तथा उच्च अक्षांशों के कुछ क्षेत्रों में अधिक दिखाई दे सकती है।
इस दौरान वायुमंडल में ऊर्ध्वाधर मिश्रण कम हो जाता है। परिणामस्वरूप निचली परतों में कोहरा और कुछ प्रदूषकों का जमाव हो सकता है। इसलिए तापमान व्युत्क्रमण का मौसम और स्थानीय वायुमंडलीय दशाओं पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है।
प्रश्न 2. तापमान के क्षैतिज वितरण को नियंत्रित करने वाले कारकों की चर्चा कीजिए।
उत्तर: पृथ्वी पर तापमान का क्षैतिज वितरण अनेक भौगोलिक कारकों से नियंत्रित होता है। अक्षांश के कारण सूर्य की किरणों का कोण बदलता है। भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर सामान्यतः तापमान कम होता जाता है। ऊँचाई बढ़ने पर तापमान घटता है। समुद्र के निकट क्षेत्रों में तापमान का वार्षिक अंतर कम रहता है, जबकि महाद्वीपीय आंतरिक भागों में अधिक होता है।
प्रचलित पवनें भी तापमान को प्रभावित करती हैं। गर्म और ठंडी महासागरीय धाराएँ तटीय क्षेत्रों के तापमान में परिवर्तन ला सकती हैं। इसके अतिरिक्त स्थल और जल का विभेदी तापन, भूतल की प्रकृति तथा पर्वतों की स्थिति भी तापमान के वितरण को प्रभावित करती है।
प्रश्न 3. पृथ्वी और वायुमंडल के ऊष्मा संतुलन को समझाइए।
उत्तर: पृथ्वी को लगातार सूर्य से ऊर्जा प्राप्त होती है। आने वाली सौर ऊर्जा का कुछ भाग वायुमंडल और बादलों द्वारा अवशोषित या परावर्तित होता है तथा शेष भाग पृथ्वी की सतह तक पहुँचता है। धरातल इस ऊर्जा को अवशोषित करके गर्म होता है और बाद में दीर्घ-तरंगीय पार्थिव विकिरण के रूप में ऊर्जा छोड़ता है।
पार्थिव विकिरण का कुछ भाग वायुमंडल द्वारा अवशोषित किया जाता है और कुछ भाग अंतरिक्ष में चला जाता है। लंबे समय के औसत में पृथ्वी और वायुमंडल द्वारा प्राप्त ऊर्जा तथा अंतरिक्ष में छोड़ी गई ऊर्जा के बीच संतुलन बना रहता है। यही पृथ्वी का ऊष्मा संतुलन है।
प्रश्न 4. सूर्यातप की मात्रा को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर: सूर्यातप की मात्रा सूर्य की किरणों के कोण, दिन की अवधि, अक्षांश, वायुमंडलीय दशाओं तथा सूर्य-पृथ्वी की दूरी से प्रभावित होती है। सीधी किरणें कम क्षेत्र में केंद्रित होती हैं, इसलिए प्रति इकाई क्षेत्र अधिक ऊर्जा प्राप्त होती है। तिरछी किरणें अधिक क्षेत्र में फैलती हैं और वायुमंडल में अधिक दूरी तय करती हैं।
दिन की लंबाई बढ़ने पर किसी क्षेत्र को अधिक समय तक सौर ऊर्जा प्राप्त हो सकती है। बादल, जलवाष्प और धूलकण सौर विकिरण को अवशोषित, परावर्तित या प्रकीर्णित कर सकते हैं। इसलिए सभी क्षेत्रों में सूर्यातप की मात्रा समान नहीं रहती।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)
प्रश्न 1. 21 जून को दोपहर के समय सूर्य की सीधी किरणें किस अक्षांश पर पड़ती हैं?
(क) भूमध्य रेखा
(ख) 23.5° उत्तरी अक्षांश
(ग) 66.5° दक्षिणी अक्षांश
(घ) 66.5° उत्तरी अक्षांश
उत्तर: (ख) 23.5° उत्तरी अक्षांश
प्रश्न 2. वायुमंडल मुख्यतः किस विकिरण से गर्म होता है?
(क) लघु-तरंगीय सौर विकिरण
(ख) दीर्घ-तरंगीय पार्थिव विकिरण
(ग) परावर्तित विकिरण
(घ) प्रकीर्णित विकिरण
उत्तर: (ख) दीर्घ-तरंगीय पार्थिव विकिरण
प्रश्न 3. समान तापमान वाले स्थानों को जोड़ने वाली रेखा कहलाती है—
(क) समदाब रेखा
(ख) समवर्षा रेखा
(ग) समताप रेखा
(घ) समोच्च रेखा
उत्तर: (ग) समताप रेखा
प्रश्न 4. ऊँचाई के साथ तापमान बढ़ने की स्थिति को क्या कहते हैं?
(क) सामान्य ह्रास
(ख) तापमान व्युत्क्रमण
(ग) अभिवहन
(घ) संवहन
उत्तर: (ख) तापमान व्युत्क्रमण
प्रश्न 5. वायु के क्षैतिज संचलन द्वारा ऊष्मा का स्थानांतरण कहलाता है—
(क) संवहन
(ख) अभिवहन
(ग) चालन
(घ) विकिरण
उत्तर: (ख) अभिवहन
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. तापमान क्या है?
उत्तर: किसी स्थान या वस्तु की गर्मी अथवा ठंडक की स्थिति को व्यक्त करने वाली राशि तापमान कहलाती है।
प्रश्न 2. सूर्य से विकिरित ऊर्जा का स्रोत क्या है?
उत्तर: सूर्य के क्रोड में होने वाली नाभिकीय प्रक्रियाओं से ऊर्जा उत्पन्न होती है।
प्रश्न 3. लघु तरंगें क्या हैं?
उत्तर: सूर्य से पृथ्वी की ओर आने वाली विद्युत-चुंबकीय ऊर्जा का प्रमुख विकिरण लघु-तरंगीय विकिरण कहलाता है।
प्रश्न 4. वायु अपवाह क्या है?
उत्तर: ढाल के सहारे ठंडी और भारी वायु का ऊँचे स्थानों से नीचे की ओर बहना वायु अपवाह कहलाता है।
प्रश्न 5. दैनिक तापांतर क्या है?
उत्तर: किसी दिन के अधिकतम और न्यूनतम तापमान के बीच के अंतर को दैनिक तापांतर कहते हैं।
प्रश्न 6. वार्षिक तापांतर क्या है?
उत्तर: सबसे गर्म और सबसे ठंडे महीनों के औसत तापमान के बीच का अंतर वार्षिक तापांतर कहलाता है।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
- सूर्यातप: पृथ्वी द्वारा प्राप्त सौर ऊर्जा।
- पार्थिव विकिरण: पृथ्वी द्वारा उत्सर्जित दीर्घ-तरंगीय ऊर्जा।
- ऊष्मा संतुलन: प्राप्त और खोई गई ऊर्जा के बीच दीर्घकालीन संतुलन।
- समताप रेखा: समान तापमान वाले स्थानों को जोड़ने वाली रेखा।
- अभिवहन: क्षैतिज वायु संचलन द्वारा ऊष्मा का स्थानांतरण।
- संवहन: ऊर्ध्वाधर वायु संचलन द्वारा ऊष्मा का स्थानांतरण।
- तापमान व्युत्क्रमण: ऊँचाई के साथ तापमान का बढ़ना।
- दैनिक तापांतर: दैनिक अधिकतम और न्यूनतम तापमान का अंतर।
- वार्षिक तापांतर: सबसे गर्म और सबसे ठंडे महीनों के औसत तापमान का अंतर।
परियोजना कार्य
अपने शहर के आसपास स्थित किसी मौसम विज्ञान वेधशाला या मौसम केंद्र से तापमान संबंधी आँकड़े प्राप्त करें। एक महीने के अधिकतम और न्यूनतम तापमान का रिकॉर्ड तैयार करें तथा दैनिक औसत तापमान निकालें। इसके बाद ग्राफ की सहायता से तापमान में होने वाले परिवर्तन को प्रदर्शित करें।
परियोजना में स्थान की ऊँचाई, अक्षांश, अवलोकन अवधि, अधिकतम तापमान, न्यूनतम तापमान और औसत तापमान जैसी जानकारी शामिल की जा सकती है। अंत में उस क्षेत्र के तापमान को प्रभावित करने वाले प्रमुख भौगोलिक कारकों का उल्लेख करें।
अध्याय का सारांश
सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान अध्याय में पृथ्वी के तापीय वातावरण को समझाया गया है। सूर्य पृथ्वी के लिए ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है। पृथ्वी सूर्य से ऊर्जा प्राप्त करती है और पार्थिव विकिरण के माध्यम से ऊर्जा अंतरिक्ष में वापस भेजती है। प्राप्त और खोई गई ऊर्जा के बीच संतुलन पृथ्वी के तापीय संतुलन को बनाए रखने में सहायता करता है।
पृथ्वी के सभी भागों में तापमान समान नहीं होता। अक्षांश, ऊँचाई, समुद्र से दूरी, पवनें, महासागरीय धाराएँ तथा स्थल-जल का विभेदी तापन तापमान के वितरण को प्रभावित करते हैं। समान तापमान वाले स्थानों को जोड़ने वाली रेखाओं को समताप रेखाएँ कहा जाता है। तापमान व्युत्क्रमण सामान्य तापीय वितरण से अलग स्थिति है, जिसमें ऊँचाई के साथ तापमान बढ़ सकता है।
निष्कर्ष
Bihar Board Class 11 Geography का यह अध्याय परीक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। विद्यार्थियों को सूर्यातप, पार्थिव विकिरण, ऊष्मा संतुलन, समताप रेखाएँ, तापमान वितरण, दैनिक एवं वार्षिक तापांतर तथा तापमान व्युत्क्रमण जैसे विषयों को विशेष रूप से तैयार करना चाहिए। परिभाषाओं के साथ-साथ कारण और उदाहरण समझकर पढ़ने से इस अध्याय के वस्तुनिष्ठ तथा वर्णनात्मक दोनों प्रकार के प्रश्नों को आसानी से हल किया जा सकता है।